मंगलवार, 9 जुलाई 2013

दोहे- रिश्तों पर




रिश्तों में शामिल हुए, जब से ये इनलाज |
चिंदी-चिंदी हो गया,  जकड़ा हुआ   समाज |

रिश्तों की कड़वाहटें, देती रहीं दलील |
हम ही रौशन कर रहे, रिश्तों की कंदील |

बिना क्रांति या युद्ध के, रिश्ते हुए तमाम |
देते रहो दलील कुछ, थोपो   जो  इल्जाम |

रिश्तों में अहसास का, खत्म हुआ हर झोल |
कौड़ी-कौड़ी हो गया,  हर रिश्ते का    मोल |

श्री स्वार्थ जब से हुए, रिश्तों के सरपंच |
रिश्तों में आने लगे, तिकडम और प्रपंच |

दादी जी आया बनीं, दादा जी सर्वेंट |
इस पीढ़ी की भावना, यही सेंट परसेंट |

बूढों से जब से हुए, बंद वाक्संवाद |
हुई भावना मोंथरी, निष्फल आशीर्वाद |

बिकती अब संवेदना, बंट जाती है याद |
टुकड़े-टुकड़े हो गया, आपस का संवाद |

रिश्तों में अब स्नेह का, फैशन हुआ समाप्त |
हर रिश्ते में स्वार्थ का, कीटाणु है व्याप्त |

रिश्ते जर्जर हो गए, टीस  गई हर रीत |
जाने कब से खो गई, वह पहली सी रीत |

मुद्रा से बिकने लगे, जब से सब अहसास |
माँ से प्यारी हो गई, सब को अपनी सास |

कितने बौने हो गए, रिश्तों के उत्कर्ष |
पल-पल बनते टूटते, न विषाद न हर्ष |

रिश्तों की गरमाहटे, कितनी हैं मोहताज |
स्वार्थ सिद्दि की नीव पर, उठती गिरतीं आज |

नई नस्ल को मिल रही, नई संस्कृति आज |
श्रेष्ठजनों का आँख में, बिलकुल नहीं लिहाज |

पापा-मम्मी-सन्तति, पिएं बार में संग |


संस्कृति बौनी हो गई, देख आधुनिक रंग |

5 टिप्‍पणियां:

  1. रिश्तों पर दोहों की सुन्दर प्रस्तुति!
    साझा करने के लिए आभार!

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  2. बेहद सुन्दर प्रस्तुतीकरण ....!
    आपको सूचित करते हुए हर्ष हो रहा है कि आपकी इस प्रविष्टि की चर्चा कल बुधवार (10-07-2013) के .. !! निकलना होगा विजेता बनकर ......रिश्तो के मकडजाल से ....!१३०२ ,बुधवारीय चर्चा मंच अंक-१३०२ पर भी होगी!
    सादर...!
    शशि पुरवार

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    1. बहुत बहुत धन्यवाद रश्मि जी आशा है आप स्नेह बनाए रखेंगी

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