रविवार, 21 जुलाई 2013

क्रान्ति-उदघोष


 
                             
लेखनी में अग्नि भर कर,  लिख अनल कविता नवल |
देश  ने  तुझको  पुकारा  , युद्ध को  कवि-वर निकल |
               ये शिखण्डी कब न जाने ,
               भेंट कर दें  देश     को |
               पीढियां रह जायं  तकती ,
               शून्य से    अवशेष  को |
लौह सम दीवार  में ढल ,हो  खड़ा   आगे  अटल |
देश  ने तुझको  पुकारा - युद्ध  को  कवि-वर निकल |
                मौन  है   नेतृत्व    अब, -
                कर रहा  है  अतिक्रमण |
                ढक लिया चहुंओर उसने ,
                एक  कलुषित  आवरण |
दे नया नेतृत्व  सब  को, तुष्ट  हो जन मन विकल |
देश  ने तुझको  पुकारा  - युद्ध को  कवि-वर निकल |
                रूप  निर्मल  शारदे  का ,
                अब बदल  निर्मम  बना |
                रूप   दुर्गा   का   उसे  दे,-
          न्याय   का  सरगम बना |
गीत में, संगीत मे  रख ,  धार   खांडे  सी  विरल |
देश ने तुझको  पुकारा  - युद्ध को  कवि-वर निकल |

2 टिप्‍पणियां:

  1. बहुत सुन्दर प्रस्तुति...!
    आपको सूचित करते हुए हर्ष हो रहा है कि आपकी इस प्रविष्टि की चर्चा आज रविवार (21-07-2013) को चन्द्रमा सा रूप मेरा : चर्चामंच - 1313 पर "मयंक का कोना" में भी है!
    सादर...!
    डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'

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