बुधवार, 17 जुलाई 2013

माँ



माँ के ऋण से कब हुई,उऋण कभी सन्तान |
माँ के कारण ही मिली, हमको हर  पहचान |
हमको हर  पहचान, ऋणी  हर रोम हमारा ,
इसके कण-कण से बनता यह तनमन  सारा |
कहे 'राज'  कवि,  करें हितों की रक्षा माँ के ,
तन-मन-धन ,सब अर्पण करदें अपनी माँ के |
-०-       
रिश्ते सारे स्वार्थ के,  माँ का है  नि:स्वार्थ  |
कोई भी इसमें कभी, मिला नहीं निहितार्थ |
मिला नहीं निहितार्थ, प्रेम पर यह आधारित,
यही सनातन सत्य,  किया सबने उद्भाषित |
कहे 'राज' कवि, माँ के चरण जगत में न्यारे  ,
निहित इन्हीं में, जग में समुचित रिश्ते सारे |
-०-                 
माता के दिल सा कही, नहीं और कुछ मित्र |
माता के दिल में बसें,  वही  पुराने   चित्र  |
वही  पुराने  चित्र,  क्षमा   से परिपूरित है ,
पीर, प्रेम, वात्सल्य,  शीर्ष  तक आधारित है |
कहे  'राज'  कवि,  आंचल में  संसार समाता  ,


बच्चों को सुख -चैन, अभय सब  देती माता | 

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