सोमवार, 24 जून 2013

खटीमा-एक नज़र में





                                                            खटीमा-एक नज़र में
                                   -डा.राजसक्सेना
      भारत के अधिकांश ग्रामों की तरह खटीमा ग्राम का इतिहास सदियों पूर्व तक 
जाता है |  1814 में गोरखों से हुई सिगंरौली सन्धि के अधीन वर्तमान गढवाल और
कुमांऊ कमिश्नरियों का स्वामित्व ब्रिटिश हाथों में आया किन्तु उस समय तराई  का
यह क्षेत्र जिसका खटीमा भी एक अंग था नेपाली आधिपत्य में नहीं था और न ही-
किसी पर्वतीय राजा के अधीन या उनके राज्य का हिस्सा था |
                वस्तुतः तराई क्षेत्र जो लगभग 145 कि.मी.और 20 से 25 कि.मी.
की लम्बाई-चौड़ाई की सघन वनों से आच्छादित दुर्गम दलदली झीलों के बाहुल्य 
तथा लम्बी घास एंव हिंसक पशुओं से भरी पड़ी एक पट्टी थी और विद्रोहियों व
अपराधियों की शरण स्थली थी सन 1802 में ही एक प्रथक कमिश्नरी के रूप में
उ०प्र० के गोरखपुर जिले के तराई भाग से काशीपुर के जसपुर तक आ चुकी थी |   
      1887-88 में ब्रिटिश भारत के इस भाग के हुए बंदोबस्त में कुछ इनी-गिनी
 झोपड़ियों का यह गांव खटेमा नाम से किच्छा तहसील(तहसील भवन 1890 में निर्मित)
 की सब-तहसील बनकर  (KHATEMA)अस्तित्व में आया खटीमा(स्थानीय पूर्वनाम-
 खत्तेमा)सब तहसील भवन(पेशकारी-ना.तहसीलदार)वर्ष 1905 में बन कर तैयार हुआ |  | 
1888 से पूर्व खटीमा परगना बिल्हैरी का भाग था या इसी का नाम बिल्हैरी रहा हो ?
आज भी रेवेन्यु रिकार्ड़ में खटीमा के परगने का नाम बिल्हैरी दर्ज है जबकि इस 
नाम का कोई ग्राम या नगर इस क्षेत्र में उपलब्ध नहीं है | सन 1857में अंग्रेजों-
की सहायता नेपाल सरकार द्वारा किये जाने के फ्लस्वरूप अंग्रेजो द्वारा प्रसन्न हो-
कर तत्कालीन अवध राज्य की तराई का थारू बाहुल्य क्षेत्र जो वर्तमान में नेपाल 
के पश्चिम्-दक्षिण के तीन जिलों के रूप में विद्यमान है,नेपाल सरकार को शारदा
नदी के पूर्व की ओर प्रदान किया तथा रूहेला सरदारों के नियन्त्राधीन रह चुके भाग 
जिसमें खटीमा भी शामिल है को ब्रिटिश तराई के रूप में अपने नियन्त्रण में ही 
रखा था | स्मरणीय है कि सन 1802 में लार्ड वेलेजली के समय अवध के नवाब 
से हुई सहायक सन्धि के अधीन तराई का गोरख पुर और रूहेल खण्ड अंग्रेजों के 
नियन्त्रणाधीन हो चुके थे |  इस प्रकार इस क्षेत्र पर ईस्ट इण्डिया कम्पनी का -
कब्जा हो गया था और 1857 में इसका शारदा नदी से पूर्व का कुछ भाग नेपाल 
को सौंप देने के कारण परगना बिल्हैरी का मुख्य भाग भी नेपाल में चले जाने 
 से ब्रिटिश क्षेत्र में परगना बिल्हैरी का कुछ भाग रह जाने के कारण, परगने का
नाम तो रह गया भौतिक अस्तित्व समाप्त हो गया |
               नव गठित तराई जिले में तब सहजगीर(जसपुर),कोटा(काशीपुर),मुड़िया
(बाजपुर),बड़ाखेड़ा(गदर्-पुर),किलपुरी(किच्छा-सितारगंज),बक्शी(नानकमत्ता) तथा बिल्हैरी
कुल सात परगने(तत्कालीन स्थानीय शासन केन्द्र्)सम्मिलित थे जो खाम स्टेट के नाम
 से अलग कमिश्नरी थे और दो तीन टुकड़ों में इन्हें नैनीताल जिला, अल्मोड़ा कमिश्नरी
 से काटकर बनाये जाने पर उसमेंसम्मिलित किया गया |पहले खटीमा बरेली कमिश्नरी
 में था और काशीपुर व जसपुर मुरादाबाद जिले का भाग थे | सुबरना या चिंकी
नाम से बहेड़ी भी इसी तराई में सम्मिलित था किन्तु नैनीताल जिला बनने पर तराई
 के जिले में सम्मिलन पर बहेड़ी बरेली जिले में ही रहने दिया गया और बिल्हैरी(खटीमा)
सम्मिलित किए गए थे | 05 अक्टूबर 1891 को जब अल्मोड़ा से कुछ क्षेत्र निकाल कर -
नैनीताल जिला बनाया गया तो तराई जिले  को उसमें समाहित कर दिया गया |
                            1896 में टनकपुर के भाबर क्षेत्र को तराई के क्षेत्र से काट कर 
अल्मोड़ा जिले  में मिला दिया गया |सन 1900 में तराई और भाबर को एक शासन 
सूत्र में बांधा गया और 'खाम की तराई भाबर स्टेट' का गठन किया गया | इसके
दस साल बाद  अल्मोड़ा के भाबर क्षेत्र को भी इसमे समाहित कर दिया गया और 
अल्मोड़ा के भाबर क्षेत्र का अंग होने के कारण टनकपुर भी तराई प्रशासन में सम्मि-
लित हो गया | 1802 में तराई पर अधिकार के  उपरान्त 1844 तक जसपुर(सहज-
गीर) और काशीपुर अलग राजस्व प्रभाग के रूप में मुरादाबाद जिले का अंग बने 
रहे | इस वर्ष मुरादाबाद जिले का पुनः सीमा निर्धारण हुआ और काशीपुर और 
जसपुर को मिलाकर तथा ठाकुर द्वारा,सुल्तानपुर पट्टी(सरकरा),मुरादाबाद्, और 
अफजल गढ के कुछ ग्रामों को मिला कर काशीपुर परगने का गठन किया गया |
सन 1856 में बाजपुर को भी तराई में मिला दिया गया | 
                       एक सदी के निरन्तर प्रयासों और नागरिक सुविधाओं में बढोत्तरी
के कारण तराई की आबादी में आशातीत वृद्दि हुई | वर्ष 1918 में इन्फ्लुएंजा-
महामारी के रूप में और फिर 1920 में हैजा महामारी के रूप में तराई में फैला |
उस समय तराई में चिकित्सा सुविधाओं का लगभग पूर्ण अभाव था |फलस्वरूप
प्रशासन ने तराई में चिकित्सा सुविधाओं के लिये बाजपुर,गदरपुर,रूद्रपुर,किच्छा,
सितारगंज और खटीमा में एक कम्पाउन्डर के अधीन छोटे अस्पतालों का   जाल 
बिछा दिया | यह वर्ष 1926 की बात थी | वर्ष 1928 में इन अस्पतालों के पक्के
भवनों का निर्माण हो चुका था |        
                               अभी जारी है .............

1 टिप्पणी:

  1. बहुत सुन्दर प्रस्तुति...!
    आपको सूचित करते हुए हर्ष हो रहा है कि आपकी इस प्रविष्टि की चर्चा आज मंगलवार (25-06-2013) को मंगलवारीय चर्चा-1287--हमें फूलों को सताना नहीं आता में "मयंक का कोना" पर भी है!
    सादर...!
    डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'

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