गुरुवार, 27 जून 2013

सरस्वती माँ




माँ सरस्वती 
कण-कण तन का उज्ज्वल करदे |
एक नवल तेज, अविकल  करदे |
माँ सरस्वती आ,    कंठ समा,
मन-मस्तक को अविरल करदे |

वाणी में मधु की,    धार बहा |
हो सृजनशील,  मस्तिष्क महा |
हर शब्द बने,  मानक जग में,
हर रचना को,  इतिहास बना |

जन की जिव्हा पर,   नाम चढ़े,
इतना मधुमय, अविचल करदे |
माँ सरस्वती आ,     कंठ समा,
मन मस्तक को अविरल करदे |

हो सृजित नया, जन के मन का,
हर शब्द लगे, नव उपवन का |
परिपूरित,      अद्भुत गंधों से,
वैकुण्ठ लोक के,   मधुवन सा |

रचना में,     श्रेष्ट समन्वय  हो,-
हर शब्द दिव्य-परिमल करदे |
माँ सरस्वती आ,     कंठ समा,
मन मस्तक को अविरल करदे |

कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें