गुरुवार, 20 जून 2013

गजल-ए-मुल्क




 गजल-ए-मुल्क 
उठ रही  दीवार से, अब देश  बचाना होगा |
प्यार के हार से, हर मोड़  सजाना होगा |
जिन्दगी भर जले, देश के हित लौ बनकर  ,
उन चिरागों को लहू,  देके  जलाना होगा |
बात हो दिल की मेरे,मुंह से तेरे जा निकले,
आइना दिल को बना, साथ निभाना होगा |
प्रेम की डोर से बंध कर के, बनें गुलदस्ता,
फिर से एक बार हमें,मुल्क जगाना होगा |
'राज' शैतान नहीं,  इंसान उगे  हर घर में,
ऐसा जीदार हमे,   मुल्क  बनाना होगा |  

1 टिप्पणी:

  1. बहुत सुन्दर प्रस्तुति...!
    आपको सूचित करते हुए हर्ष हो रहा है कि आपकी इस प्रविष्टि की चर्चा कल शुक्रवार (21-06-2013) के "उसकी बात वह ही जाने" (शुक्रवारीय चर्चा मंचःअंक-1282) पर भी होगी!
    --
    रविकर जी अभी व्यस्त हैं, इसलिए शुक्रवार की चर्चा मैंने ही लगाई है।
    सादर...!
    डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'

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