गुरुवार, 13 जून 2013

आनन देखा है


आनन देखा है





आनन देखा है

हे प्रियतम तुमने बसंत में,क्या अपना आनन देखा है |
सत्य कहो इस आनन जैसा,क्या मह्का मधुवन देखा है |
हूक उठीहै कभी हृदयमें,एक अजब सी प्यास जगी क्या,
इस बसंत की किसी रात में,निज मन का नर्तन देखा है |
रिमझिम वर्षा इन्द्र्धनुष से, एकनई अनुभूति जगाकर,
काजल सी घनघोर घटा में,सन्-सन् करता तन देखा है |
रस बरसाते पूर्ण चन्द्र ने, कभी नहीं क्या मधु बरसाया,
उस मधु से सिंचित परियों सा,क्या अपना यौवन देखा है |
आह् शिशिरके हिमपातोंने,असर नहीं क्या तुमपर डाला,
सर-सर चलती शीतपवन में,क्या जलता तनमन देखा है |
"राज"तृषित नयनोंसे अपलक,तुमको अविरल देख रहा है,
करुणकथा सा कुसुमित् उसका,क्षुधित हृदयक्रंदन देखा है | 

4 टिप्‍पणियां:

  1. बहुत सुन्दर प्रस्तुति...!
    आपको सूचित करते हुए हर्ष हो रहा है कि आपकी इस प्रविष्टि की चर्चा कल शुक्रवार (14-06-2013) के "चलता जब मैं थक जाता हुँ" (चर्चा मंच-अंकः1272) पर भी होगी!
    सादर...!
    रविकर जी अभी व्यस्त हैं, इसलिए मंगलवार की चर्चा मैंने ही लगाई है।
    डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'

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  2. हर ऋतु कितनी खुबसूरत हो गयी है यहाँ
    सुन्दर
    साभार !

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  3. अंतस को छूती बहुत भावपूर्ण रचना....

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