बुधवार, 12 जून 2013

मै जिन्दा रह सकता हूँ

मौलिक एवं अप्रकाशित
मै जिन्दा रह सकता हूँ
         -डा.राज सक्सेना
तपती धरती,तपता अम्बर,मैं हंसता  सह सकता हूं |
इन दोनों के बीच में तप कर,मैं जिंदा रह सकता हूं |
जिन से मेरे दिल के रिश्ते, देस गए तो भूल गए,
गैरों को परदेस में कैसे, मैं  अपना कह सकता हूं |
खुशियां बांटीं गैरों को भी, रख कर दोनों हाथ खुले,
अब तो गम के साथ खुशी से,मैं यकसाँ रह सकता हूं |
औरों को लुटता देखा पर , परदेसी से प्यार किया ,
मरने तक का रोग लगा कर,मैं हंसता रह सकता हूं |
मुझे डरा कर, पास से मेरे,कई बार गुज़री है मौत,
हर क्षण उसके पांव की चापें,मैं सुनता रह सकता हूं |
एक बुलबुला-जीवन पल का,है जीवन का सार यही,
देख वक्त के हाथ मैं किस्मत,मैं तकता रह सकता हूं |
घटाटोप अंधियारों में भी, यादों के कुछ दीप जलाकर,
'राज' इन्ही यादों के बल पर,मैं ज़िन्दा रह सकता हूं |
  मो.- 09410718777- 7579289888- 8057320999
इन्हें भी अवश्य देखें (ब्लाग)
bal sahityiksahchar, sahityiksahchar (hasya-vyangy)

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