सोमवार, 10 जून 2013

समीक्षा - सुवर्ण चम्पा

               समीक्षा - सुवर्ण चम्पा
                           -डा.राज सक्सेना
             सुवर्ण चम्पा समीक्षा हेतु प्राप्त हुआ | पैकेट खोला तो मुख पृष्ट सामने था | विश्वास नहीं हुआ कि
किसी एक उम्रदार चेहरे से भी कोई मुखपृष्ट इतना सुंदर बनाया जा सकता है | सच तो यह है कि मुखपृष्ट  का -
अवलोकन कर के ही ग्रन्थ को खोल कर पढने की उत्कंठा  अंगडाईयां  लेने लगे, तो यह है सम्पादक द्वै डा.नरेंद्र शर्मा 'कुसुम' और श्री कृष्ण शर्मा जी की सम्पादन क्षमता का पहला शानदार आयाम | अस्तु ! गजल के अनुरूप - आंतरिक पृथम पृष्ट पर राधा कृष्ण का युगल चित्र सोने में सुहागा बन कर उभरता है  | यह है सम्पादक द्वै की  -लगातार दूसरी सफलता का अनुपम आयाम जो पन्ने पर पन्ने पलटने के लिए पाठक को विवश ही नही करताआनन्द स्फुरण की सरिता का अविकल संवहन भी करता है | और इसके पश्चात प्रारम्भ होता है चोटी के अनेक साहित्य पुरोधाओं का सुवर्ण चम्पा पर उनके व्यक्तिगत आग्रहहीन मन्तव्यों का एक लम्बा सिलसिला | अक्सर -इस तरह के मन्तव्य उबाऊ और नीरस होते हैं | किन्तु इतने लम्बे मन्तव्य सिलसिले को नीरसता के अंध कूपसे, बिना काजल की कोई रेखा लगने देने से बचा कर, इस तरह से क्रम देकर पठनीय और सरस बनाया जा  -सकता है, इस कल्पनीय कला को साकार रूप देने में भी सम्पादक द्वै ने अपनी विशेषज्ञता सिद्ध की है | यह है -
सम्पादन सफलता की अनवरत सफलता की अगली कड़ी |
            इस अनुपम ग्रन्थ की अगली कड़ी प्रारम्भ होती है चौरड़िया जी के समग्र गजल और अंतर -संबंधित मुक्तकों आदि के एक सुगठित,समन्वित और सम्पादन क्षमता से परिपूर्ण काव्यमय गुलदस्ते के शानदार समुच्चय के रूप में | यहाँ भी सम्पादक द्वै ने अकबर इलाहाबादी के दो बेहद प्रसिद्ध शेअरों से , जो गुलदस्ते की एकजुटता के लिए बाँधी गई डोरी का काम करते हैं, की है | मुलाहिजा फरमाएं -
         अल्लाह ने दी है जो तुम्हें चाँद सी सूरत,
         रौशन भी करो जाके सियहखाना किसी का |    और -

         दूर से आए थे साक़ी सुनके मैखाने को हम,
         बस तरसते ही चले अफ़सोस पैमाने को हम |     क्या बात है |
             
         चौरड़िया जी का गजल समग्र प्रारम्भ होता है 'जरा तुम चलो, जरा हम  चलें' से |  इस
शानदार गजल से  चौरड़िया जी को  जिन्दगी के शानदार फलसफे   -
          किसी मोड़ पर यूँ ही बेसबब,
          कभी हम मिले, कभी तुम मिले |
          चले 'अश्क' यूं ही  रात दिन,
          यहाँ    जिन्दगी   के  काफिले |   
के साथ समग्र में प्रवेश दिलाया गया है | इसी
प्रकार एक से बढ़ कर एक गजल का चयन जहाँ एक ओर सम्पादन क्षमता का प्रदर्शन करता है,
वहीं दूसरी ओर चौरड़िया जी की गजलगोई पर जानदार अदबी पकड़ को अनायास सामने लाकर रख
देता है |
             अंदर के पन्नों पर विभिन्न भावपूर्ण साहित्यिक गजलों का नाना फूलों से सजा - गौरवमय गुलदस्ता इस प्रकार रखा गया है कि पाठक मंत्रमुग्ध सा पन्ने पर पन्ने पलटने को मजबूर होता चला चला जाता है और गजल के वजन और श्रंगारिक क्षमता का कायल होता चला जाता है |जहाँ तक मेरा प्रश्न है | मै तो चौरड़िया जी की अद्भुत गजलगोई और प्रत्येक दृष्टिकोण से सम्पूर्ण अदबी गजलों का कायल हो गया हूँ | अगर पाठक मन से समग्र का वाचन करे तो निश्चित रूप से उसे एक
अलौकिक आनन्द आएगा ऐसा मुझे विश्वास है |
             गजलों के बाद गीत और गद्य गीतों का एक काफिला पाठक को बांधे रखने में सफलता का आयाम बनाता चलता रखने में भी सम्पादक द्वै पूर्णतया सफल रहे है |
           इसके बाद प्रारम्भ होता है मुक्तक का क्रम कविवर रामधारी सिंह दिनकर की इन पंक्तियों से -
           और वक्ष के कुसुमकुंज, सुरभित विश्राम भवन ये,
           जहाँ मृत्यु के पथिक ठहरकर श्रान्ति दूर करते है |  
और अकबर इलाहाबादी के इस शेयर केॉ साथ -
           हम जान से बेजार रहा करते हैं अकबर,
           जब से दिले बेताब दीवाना है किसी का |
           इसे सम्पादन का सुंदर संकलन न कहा जाय तो क्या कहा जाय |शायर अश्क का कता/रुबाई के क्षेत्र में स्पष्ट दखल का उदाहरण देखें-
           साकिया जाम पिला दे मुझको,
           प्यासा मरता हूँ जिला दे मुझको |
           कसम खाई थी ऊपरी दिल से,
           कसम का यों न सिला दे मुझको | 
और फिर एक से बढ़ कर मुक्तकों की झमाझम का एक
अटूट सिलसिला पाठक को पृष्ट पर पृष्ट पलटने पर मजबूर करता रहता है |
           अब आता है अंत में अशआर और माहिया का एक लम्बा मगर दिलचस्प सिलसिला, एक -
शेयर 'अज्ञात' तथा नीरज जी की दो पंक्तियों के साथ -
           साक़िया तेरी नजर की लाज रखने के लिए,
           होश में होते हुए बेहोश हो जाना पड़ा  |      
तथा-
         
           देखती ही रहो प्राण दर्पण न तुम,
           प्यार का ये महूरत निकल जाएगा |    
से अंगडाई लेकर किसी हसीना के यौवन स्तूप सा
अचानक सामने आकर पूरा शरीर झनझनाने लगता है | अशआर पर अश्क जी की पकड़ का एक नमूना देखें-
           दोस्त इस दुनिया में कोई, दूसरा होता नहीं,
           हो गए है सब जुदा पर गम जुदा होता नहीं |    
इसे गागर में सागर न कहें तो क्या कहें |
           इसके बाद सम्पादक द्वै ने फिर से मंतव्यों की गंगा जमुनी महफिल मंतव्यों के पद्य और गद्य के रूपों से सजा दी है | इस कड़ी का अंत होता है सम्पादक द्वै में से एक आ.श्री कृष्ण शर्मा जी के बहुआयामी आलेख 'गजल और गीत को न्यौछावर है हर सांस' से | अंतिम कड़ी में तो शर्मा जी ने अश्क जी के जीवन -परिचय के साथ-साथ उनके समग्र में उपलब्ध सारे रत्न रूपी सितारों को सजा कर ही प्रस्तुत कर दिया है | क्या
बात है | आलेख जहाँ लेखक की अद्भुत लेखन क्षमता का परिचायक है वहीं अश्क जी के प्रति लेखक के अनन्य स्नेह और आदर का भी | साधुवाद |
           इस ग्रन्थ को और संग्रहणीय  तथा स्तरीय बनाने के लिए सम्पादक द्वै ने अश्क जी के सम्मानों की प्रतिलिपियों और उनके पारिवारिक अन्तरंग क्षणों के चित्रों की चित्र कथा का स्वरूप भी पाठको को परोस कर
उनकी जिज्ञासा का शमन ही नहीं किया है | ग्रन्थ को सार्थक भी बनाने का भगीरथ कार्य किया है |
           एक हर दृष्टि से सम्पूर्ण ग्रन्थ के विषय मै और क्या लिखूं समझ नहीं आ रहा है | इस मील के पत्थर को साहित्य जगत, विशेष रूप से गजल साहित्य संसार जगत में एक ऊंचा स्थान मिलेगा ऐसा मुझे पूर्ण
विश्वास है |
          चलते-चलते ग्रन्थ पर अपनी सार टिप्पणी -
               सुनाना हाल-ए-दिल था बस,बयां आंखों ने कर डाला ,
                  मुहब्बत के फसाने   को,  ज़ुबां  से  कब  कहा किस ने |
और अंत में एक शेअर अश्क जी को समर्पित करते हुए विदा-
             कुछ लोग तो पल भर में,जीते हैं ज़िन्दगी को  ,
                  कुछ लोग सौ बरस में,पल भर भी नहीं जीते |    
सचमुच अश्क जी ने पल भर में पूरी -जिन्दगी को जी लिया है |          
 सम्पर्क - धनवर्षा, हनुमान मन्दिर, खटीमा- 262 308 (उ.ख )
               मो- 09410718777          

2 टिप्‍पणियां:

  1. बहुत सुन्दर प्रस्तुति...!
    आपको सूचित करते हुए हर्ष हो रहा है कि आपकी इस प्रविष्टि की चर्चा कल मंगलवार (11-06-2013) के "चलता जब मैं थक जाता हुँ" (चर्चा मंच-अंकः1272) पर भी होगी!
    सादर...!
    शायद बहन राजेश कुमारी जी व्यस्त होंगी इसलिए मंगलवार की चर्चा मैंने ही लगाई है।
    डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'

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