बुधवार, 19 जून 2013

अपना यार करता है




नहीं करता जो  दुश्मन  भी,वो मेरा यार करता है |
झुका कर शोख नज़्ररों को,जिगर पर वार करता है |
मुझे मालूम है ये सबकुछ,मगर ये बात दिल की है,
अजब  शै   है ये मेरा दिल, उसी से प्यार करता है |
हमेशा की तरह् वादा , न आएगा वो शबभर फिर,
जगा कर रात भर हमको, सुबह तकरार करता है |
खता हमसे हुई कैसी,लगा बैठे हैं दिल उससे,
जो इज़हारे मुहब्बत से,सदा इन्कार करता है |
मैं जब-जब फूल चुनता हूं,चढ़ाने के लिये उसपर,
चुभोने को वो कांटों की,  फसल तैय्यार करता है |
ये कैसा प्यार है हरदम,मचलता है सताने को,
फसाने में मुहब्बत के, नहीं इकरार  करता है |
अकीदा किस कदर मुझको,मुहब्बत पर मेरे दिल की,
जो इतनी ठोकरें खाकर, यकीं हर बार करता है |
मुझे मालूम है यह भी,करूं क्या"राज"इस दिल का,
जो महरूम-ए-वफा उससे,वफा दरकार करता है |


2 टिप्‍पणियां:

  1. आपकी यह प्रस्तुति कल के चर्चा मंच पर है
    धन्यवाद

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  2. नहीं करता जो दुश्मन भी,वो मेरा यार करता है |
    झुका कर शोख नज़्ररों को,जिगर पर वार करता है |-- बहुत सुन्दर
    अनुशरण कर मेरे ब्लॉग को अनुभव करे मेरी अनुभूति को
    latest post परिणय की ४0 वीं वर्षगाँठ !

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