शनिवार, 1 जून 2013

                        -डा.राज सक्सेना
एक अजाना भय, मनो-मस्तिष्क के ऊपर  तना है |
देखना और बोलना, इस कालक्रम में सब मना है |
चुप रहो,  बोलो  नहीं,   चुपचाप  सब   सहते  रहो,
होंठ हिलने मात्र से  ही,  जीभ  कटने की सज़ा है |
इन उजालों से हमें क्या,  कोठियों  के   दास सब,
भाग्य में  हम झोपड़ों के, नीम-अंधियारा लिखा है |
मुस्कुराने   का  ज़रा  भी हक  नही,  मातम करो,
आज  ही  'सरकार'  के, 'दरबान का कुत्ता' मरा है |
बे - रोक सड़कों पर चले, 'सरकार'  लेकर   क़ाफ़िले,
कल से सड़कों पर  हमारा,   दोस्तो चलना मना है |
योजना  नित मधु - मयी, 'नेता' दिखाते  हर कहीं,
धनहरण का योजना में,हरकदम पर सिलसिला है |
जन - हितों पर फैसले, संसद   में  अब होते नहीं,
'पर कतर दो आम-जन के', ये बहस का मुददआ है |
खून कब, अब तो दिलों में, 'राज'  बस  आक्रोश है,
जल्द  उमड़ेगा  सड़क  पर,  दिख रही सम्भावना  है |
   सम्पर्क-हनुमानमन्दिर,खटीमा- 262308 (उ.ख.)
               mo.-09410718777

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