शुक्रवार, 31 मई 2013

डा.राज सक्सेना के कुछ मनपसन्द 
अपने अशआर -

दूर से देखें, तो लगता  है  समन्दर  में  सुकूं,
पास जाकर देखिए,वो किस कदर बेचैन है |
-0-
हों इरादे जब अटल तब राह को कया देखना,
जिस तरफ भी चल पड़ेंगे,रास्ते मिल जाएंगे |    
-0-
फासले भी कर दिया करते हैं दूरी कम कभी,
पर कभी नज़दीकियों से, बढ गये हैं फासले  |
-0-
निगाहों  ने  निगाहों से,  फसाने  कह  दिए सारे,
दिलों की बात कहने को,जुबां कब काम आती है |
           -०-
अभी से आंख में आंसू, ये कैसा ज़र्फ है साक़ी |          
अभी तो दास्ताने ग़म, शुरू भी की नहीं हमने |
              -०-
कुछ लोग तो पल भर में,जीते हैं ज़िन्दगी को  ,
कुछ लोग सौ बरस में,पल भर भी नहीं जीते |          
             -०-
लिपटी हुई खुश्बू को,गुल से तो हटा पहले,
यादों को मेरे दिल से,फिर अपनी ह्टा लेना |
           -०-
महफिल में यूं रूसवा करे,किसकी मजाल थी,
साज़िश में तेरा हाथ  है,    मालूम था मुझे |
        -०-
एक लफ्ज़ ने दिलों में, बारूद बिछा दी है ,
सदियों दिलों में सुलगे, वो आग लगा दी है |
-०-
मुंह खोलने से पहले,  सोचो हजार बार,
रिश्ते पिघल न जाएं लफ़्जों की आंच से|
         -0-
हादसों  के  दौर  से  निकलें ,  तो  देखें   इस  तरफ,
दौरे-दुनिया किस तरफ है,अपना रूख है किस तरफ |
            - ० -
ज़ेरे-बहस हैं आजकल,कुछ बे-वजह के मरहले,
अब ज़रूरी सिलसिलों पर,तबसिरे तक बंद हैं |
             - 0 -                      
हाथ में ले सर कटे  , जो  शख्स  कल   दंगों में था,
आज वो मक़तल पे जाकर,सबका वारिस बन गया |
           - ० -
खुश्क था वो किस क़दर, उम्र का दौरे-अमल,
ढल  गई  उम्र  तो,  सपनों  पे  जवानी  आई |
          - ० -
हारने की फिक्र हो तो, मंजिलें मिलती नहीं,
जीतने की ज़िद दिलाती है, हजारों मंज़िलें |
            - ० -
दो गज कफ़न ही साथ सिकन्दर के जा सका,
दावा जो कर रहा था कि ये, मेरा जहान है |
-0-
कमर से रीढ गायब है, न दिखती है जुबां मुंह में,
ये मीरे-कारवां कैसा, जो हंसता है न रोता है |
-0-
मत उलझ हमसे अमीरे कारवां, ये सोच ले,
जिन्दगी हमसे उलझ कर,चैन से अब तक नहीं |
      रचनाकार- डा.राज सक्सेना,
mob-09410718777
email-raajsaksena@gmail.com

2 टिप्‍पणियां:

  1. बहुत सुन्दर प्रस्तुति...!
    आपको सूचित करते हुए हर्ष हो रहा है कि आपकी इस प्रविष्टि की चर्चा आज शनिवार (01-06-2013) बिना अपने शब्दों को आवाज़ दिये (चर्चा मंचःअंक-1262) में "मयंक का कोना" पर भी है!
    सादर...!
    डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'

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