बुधवार, 1 मई 2013


         ग़ज़ल
                --डा.राज सक्सेना
देखना और बोलना, हुक्मन यहां पर सब  मना है |
एक डर अन्जान सा,हर शख़्स के मन में बना है |
चुप रहो, सुनते  रहो, चुप-चाप सब  सहते  रहो,
जुम्बिश-ए-लब पर यहां, कटना ज़ुबां  पहली सज़ा है |
हर 'हादसा-ए-ग़म' पे दुख,  होता रहा 'सरकार'  को,
भूल जाना दो दिनों में, यह सियासत की अदा है |
क्या उजालों  का करें , जो   ढूंढते  कोठी - महल,
झोपड़ों की किस्मतों में , नीम-अंधियारा लिखा है |
मुस्कुराने तक का तुम को, हक नही मातम करो,
आज  ही सरकार के, दरबान का 'कुत्ता'  मरा है |
बे - रोक सड़कों पर चले, 'सरकार'  लेकर  क़ाफ़िले,
कल से सड़कों पर तुम्हारा, दोस्तो चलना मना है |
जन - हितों पर फैसले, संसद में क्यूं  होंगे भला,
आमजन के 'पर' कतरने, कल से सैशन चल रहा है |
खून कब,अब तो रगों में 'राज'  आब-ए-चश्म   है,
खौलना फ़िलवक्त जिसका,फ़ितरतन हरसू मना है |
    सम्पर्क-हनुमानमन्दिर,खटीमा- 262308 (उ.ख.)
               mo.-09410718777

27 April, 2013-10:44:43 AM


  सामयिक-ग़ज़ल
                           -डा.राज सक्सेना
एक अजाना भय, मनो-मस्तिष्क के ऊपर  तना है |
देखना और बोलना, इस दौर में सब कुछ मना है |
चुप रहो,  बोलो  नहीं,   चुपचाप  सब   सहते  रहो,
होंठ हिलने मात्र से  ही,  जीभ  कटने की सज़ा है |
इन उजालों से हमें क्या,  कोठियों  के   दास सब,
भाग्य में  हम झोपड़ों के, नीम-अंधियारा लिखा है |
मुस्कुराने   का  ज़रा  भी हक  नही,  मातम करो,
आज  ही  'सरकार'  के, 'दरबान का कुत्ता' मरा है |
बे - रोक सड़कों पर चले, 'सरकार'  लेकर   क़ाफ़िले,
कल से सड़कों पर  हमारा,   दोस्तो चलना मना है |
योजना  नित मधु - मयी, 'नेता' दिखाते  हर कहीं,
पर घुटालों का इन्हीं में, एक लम्बा सिलसिला है |
जन - हितों पर फैसले, संसद   में  अब होते नहीं,
'पर कतर दो आम-जन के', ये बहस का मुददआ है |
खून कब,  अब तो रगों में, 'राज'  बस  आक्रोश है,
जल्द  उमड़ेगा  सड़क  पर,  दिख रही सम्भावना  है |
   सम्पर्क-हनुमानमन्दिर,खटीमा- 262308 (उ.ख.)
               mo.-09410718777


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