शनिवार, 5 जनवरी 2013


     baal kahaaniyaan                    
                                इसमें भी कुछ भला है
                       -डा.राज सक्सेना
         बहुत समय पहले की बात है उत्तर भारत के सैकड़ों किलोमीटर लम्बे मैदान के
मध्य कोसी नदी के किनारे एक रोहिला रियासत थी जिसकी राजधानी रामपुर थी और यह
नवाबी, रियासत रामपुर के नाम से जानी जाती थी |
              रामपुर नगर से लगभग तेरह किलोमीटर दूर खेमपुर नाम का एक बड़ा गांव
था जिसमें बुद्धसेन नामक बुद्धिमान व्यक्ति रहता था | वह अच्छी खासी खेती का मालिक
था | एक सुगढ पत्नी, एक बेटा, एक बेटी और एक शानदार घोड़ा जिसे उसने बचपन से
बड़े प्यार से पाला था, उसके परिवारजन थे | बुद्धसेन बहुत बुद्धिमान,नेक और दूसरों की
मदद करने वाला एक सकारात्मक सोच का व्यक्ति था | कुछ भी हो जाय वह कभी बुरा -
सोचता तक नहीं था | उसकी सोच यह रहती थी कि जो हो रहा है अच्छे के लिए हो रहा
है | जो भी होगा वह अच्छा ही होगा |
                       बुद्धसेन अपने घोड़े को अपने बेटे के समान प्यार करता था | एक बार -
ऐसा हुआ कि उसका घोड़ा गायब हो गया | बुद्धसेन दुखी तो हुआ लेकिन निराश नहीं हुआ,
लोगों ने कहा," बड़ा बुरा हुआ तुम्हारा घोड़ा चोरी हो गया |"
                     बुद्धसेन ने कहा,"कुछ भी बुरा नहीं हुआ | उसके चोरी जाने में भी मेरी -
और उस (घोड़े)की कुछ भलाई है जो कुछ दिनों में सामने आ जाएगी |" लोग चुप हो -
गए | समय बीतता रहा | एक साल बीत गया |
                  और एक दिन लोगों ने देखा कि बुद्धसेन का घोड़ा अपने खूंटे के पास एक
नए शानदार घोड़े के साथ खड़ा था | लोगों ने बुद्धसेन की सोच और सहनशक्ति की प्रशंसा
की | किन्तु बुद्धसेन खुश नहीं हुआ | उसने आसमान की ओर निहार कर, एक ठंडी सांस
लेकर कहा, "जैसी तेरी मर्जी |"
                    लोगों को ताज्जुब हुआ मगर क्या कह सकते थे |
                     समय बीतता रहा | बुद्धसेन और उसका पुत्र नए घोडे को प्रशिक्षित कर -
साधने लगे | एक दिन जब बुद्धसेन का पुत्र नए घोड़े पर चढा उसे साध रहा था कि घोड़ा
बिदक गया |
                    पुत्र घोड़े से नीचे जा गिरा | उसकी एक टांग टूट चुकी थी |
                                     *  *  *  *  *
                     अब वह न तो खेती के काम का रहा और न ही घोड़ा साधने के |
                      बुद्धसेन भला आदमी था उसने सबकी सहायता ही की थी | इसलिए उसके
पुत्र के अपंग हो जाने से लोग बहुत दुखी हुए और दुःख प्रकट करने उसके पास आए मगर
बुद्धसेन न तो दुखी था और न ही उदास |
                        वह दुख प्रकट करने वालों से कहता, "मित्रवर मैं कर्म करने पर विश्वास -
करने वाला व्यक्ति हूं, मुझे पूर्ण विश्वास है कि मैं इस परिस्थिति में भी कुछ भला कर सकता
हूं |"
           लोग उसकी इस सकारात्मक सोच पर ताज्जुब करने लगे |
           बुद्धसेन का बेटा शारिरिक श्रम के योग्य तो रहा नहीं था किन्तु दिमाग का-
बहुत तेज था | बुद्धसेन ने उसे कौटिल्य का अर्थशास्त्र और गुप्तचर सेवा का अध्ययन करने
के लिए काशी भेज दिया |
           पांच वर्ष के बाद जब बेटा वापस लौटा तो वह आत्मविश्वास से भरपूर एक
अलग व्यक्तित्व का स्वामी बन चुका था |
           उसकी विद्वता की ख्याति जब नवाब रामपुर तक पहुंची तो उन्होंने उसे अपने
किले में बुलवाया और उसकी परीक्षा ली |
                  बुद्धसेन का पुत्र जिसका नाम सत्य सेन था | नवाब द्वारा ली गई हर एक
परीक्षा में खरा उतरा |
                   नवाब रामपुर ने अपने मंत्रीमण्डल से परामर्श किया | सबने एक मत से
राज्य को उसकी सेवाओं से लाभ उठाने का परामर्श दिया |
                    नवाब साहब ने सत्यसेन को अपने मंत्रीमण्डल में मंत्री नियुक्त कर उसे -
वित्त और गुप्तचर विभाग का प्रभारी बना कर सीधे मीर-बख्शी (प्रधान मंत्री) के अधीन कर
दिया |
                  सत्यसेन ने अपनी सम्पूर्ण क्षमता से कार्य प्रारम्भ कर दिया | पहले उसने
राज्य की बिग़ड़ी अर्थ-व्यवस्था को सुधारने के प्रयासों में राज्य के अनावश्यक खर्चों पर -
लगाम लगा कर उन्हें शून्य कर दिया | उससे हुई बचत को उसने राज्य की शांति-व्यवस्था
पर लगा कर शांति-व्यवस्था सही करदी | राज्य में जब सारे कर्मचारियों को वेतन समय -
पर मिलने लगा तो वे मन लगा कर काम करने लगे और शांति-व्यवस्था में अनवरत जुट
गए |
                  दूसरा काम सत्यसेन ने नवाब के राजनैतिक विरोधियों को पकड़ने का किया
ये लोग राज्य में विद्रोह की भावना फैला कर अव्यवस्था के सपने देख रहे थे | इनके राज्य
विरोधी सपनों को सत्यसेन ने अपने गुप्तचरों के माध्यम से नेस्तनाबूद कर दिया |
                  पूरे राज्य में सत्यसेन की वाह-वाही हो गई | पांच साल के थोड़े से समय
में नवाब ने सत्यसेन को मीर बख्शी (प्रधानमंत्री) के सर्वोच्च पद पर नियुक्त कर उसकी -
निष्ठापूर्वक की गई सेवाओं का प्रतिदान किया |
                  पुत्र के प्रधान मंत्री बन जाने के बाद भी बुद्धसेन ने न तो खेमपुर छोड़ा और
न ही कृषि कार्य |
                     जब लोग उसे बधाई देने गए तो उसने मुस्कुराकर कहा," अगर मैं मुसी-
बत के समय अपनी सकारात्मक सोच और साहस का परित्याग कर देता तो क्या मेरा बेटा
आज इतना बड़ा पद पा सकता था | बिल्कुल नहीं |" यह कह कर वह अपने कृषिकार्य -
में लग गया उसे न तो किसी बात का दुख हुआ और न ही बेटे के प्रधानमंत्री बनने का -
हर्ष | वह सब कुछ भूल कर अपने मुख्य कर्म में मस्त था | दुनिया की और बातों से -
उसने कोई सरोकार नहीं रखा था और यही था उसकी एक के बाद एक सफलता का राज |

सम्पर्क-धनवर्षा,हनुमान मन्दिर,खटीमा-262308 (उ.ख.)मोबा.- 9410718777, 08057320999,07579289888      
 

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