मंगलवार, 25 दिसंबर 2012

mere chand ashaar



mere chand ashaar


mere chand ashaar

इस शहर के नाम से, जाना है लोगों ने हमें,
अब हमारे नाम से, जानेंगे इसको 'राज' सब |
            - 0 -
दूर से देखें, तो लगता है समन्दर में सुकूं,
पास जाकर देखिए,वो किस कदर बेचैन है |
          -०-
कौन कहता है समन्दर में,सुकूं है, चैन है,                          
देखिए नजदीक जाकर,हद तलक बेचैन है |
          -०-
 कह दिया किसने समन्दर,ज़र्फ से खामोश है ,
देखिये साहिल से वो,मदमस्त है, मदहोश है |
          -o-                                                          
हों इरादे जब अटल तब राह को कया देखना,
जिस तरफ भी चल पड़ेंगे,रास्ते मिल जाएंगे |      $
          -०-
 पर्वतों से हौंसले  लेकर चलेंगे 'राज' हम ,
रास्ता देगा समन्दर,आसमां हिल जाएगा |
           -०-
किस तरह रक्खी गई है बात किस के सामने,
है मुफस्सिर तो जरुरी, है असर हर बात का |
          -0-
दोबाला शान हो जाती,असर कुछ बढ गया होता ,
कहा जो तैश में तुमने,अगर हंस कर कहा होता |
           -०-
फासलों ने भी बढाई हैं  कभी नज़दीकियां,
पर कभी नज़दीकियों से बढ गई हैं दूरियां |
           -0-
फासले भी कर दिया करते हैं दूरी कम कभी,
पर कभी नज़दीकियों से बढ गये हैं फासले  \
          -0-


उल्झनों ने इस  तरह  घेरा दिले-बेताब को,
इतने टुकड़े हो गये,भारत की संसद हो गया |
         -०-
 इस  तरह घेरा हसीनों ने, दिल-ए-नादान को,
इतने ख़ाने हो गये , भारत का नक्शा हो गया |
           -०-
निगाहों  ही निगाहों में , निगाहें   बात कर आईं-
खबर दिल को न लगने दी,अयां सबकुछ किया यारो |
            -0-
सुनाना हाल--- दिल था  बस,बयां आंखों ने कर डाला ,
मुहब्बत के फसाने  में,जुबां   का काम क्या यारो |
           -०-
निगाहों ने निगाहों से फसाने कह दिय सारे,
दिलों की बात कहने को,जुबां कब काम आती है |
           -०-
जो कहना था सभी कुछ कह दिया उनकी निगाहों ने,
बचा क्या है जो कहने को,जुबां अल्फाज़ दोहराये |
           -०-
निगाहो ने निगाहों से कहा जो उनको कहना था,
कहो क्या राज़ की बातें,सरे बाज़ार की जायें |
           -०-
ईद  पर  रस्म  है,मिलते  हैं  गले  सब बढ़कर |
चलो मिलकर गले,इस ईद पर हम दोस्त हो जाएं |
          -०-
वस्ल पर रोक लगा दी है,चलो मान गये |
ईद पर दीद न हो, रस्म भी तोड़ी तुमने |
          -०-
ईद पर उनसे कहा,आओ गले मिल जाओ |
दबा के होंठ ये बोले,मिंयां  मुंह धो आओ |
          -०-


जवानी में क़दम रखते ही,जगमग कर दिया आलम |
जवां भरपूर होकर तुम,ग़ज़ब ढ़ाओगे  क्या  जानम |
          -०-
नहीं है उम्र कम लेकिन,बहुत भोले हैं दिल के वो |
किये ज़िद कल से बैठे हैं,दिखाओ दर्दे दिल हमको |
          -०-
इन्तहा करदी जहां वालों ने,अपने प्यार की तुझ पर |
तभी तो ले गये तुझ को , उठा कर आस्मां  वाले |
               -०-
तुम क्या गये कि साथ सब,खुशियां चली गयीं |
तुम सो गये तो साथ हर,लज़्ज़त भी सो गयी |
               -०-
अभी से आंख में आंसू, ये कैसा ज़र्फ है साक़ी |           $
अभी तो दास्ताने ग़म, शुरू भी की नहीं हमने |
              -०-
बहारों में  हमें  भी याद कर लेना चमन वालो,
बहुत सींचा पसीने से,चमन हमने भी ये बरसों |
              -०-
तरतीब से ख्वाबों की, ये  ज़ीस्त  बनी है,
ये ख्वाब बिखर जाएं तो,फिर मौत भली है |
              -०-
कुछ लोग तो पल भर में,जीते हैं ज़ीस्त पूरी,
कुछ लोग सौ बरस में,पल भर भी नहीं जीते |            $
             -०-
क्या बात है चमन में, फीका  है  रंग सबका,
ग़ुलचीं को कुछ हुआ क्या,सिसके है गुंचा-गुंचा |
              -०-
हो शाख  से अलग तो,रोता है शजर बरसों,
जिस ग़ुल को बहारों में, नाज़ों से संवारा हो |
              -0-


तूफान की धमकी से,कदमों से लिपट जाए ,
ये सच है बाअदब है,बुज़दिल नहीं है'राज' |
           -०-
लिपटी हुई खुश्बू को,गुल से तो हटा पहले,
यादों को मेरे दिल से,फिर अपनी ह्टा लेना |
           -०-
क्युं फंस रहे हो जाल में,मकड़ी के जानकर,
रोओगे सर पकड़ के,किसी दिन मलाल कर |
        -०-
महफिल में यूं रूसवा करे,किसकी मजाल थी,
साज़िश में तेरा हाथ  है,    मालूम था मुझे |
        -०-
मैं हवादिस के थपेड़ों से ये लाया हूं सबक,
जब भी डूबा है सफीना,दोस्त ही हमसाज़ थे |
        -०-
फ़ुरसत किसे है जो करे तौबा जनाब अब|
दो चार साल ज़िन्दगी के रह गये हों जब|
             -०-
फ़ुरसत किसे है जो करे तौबा जनाब अब|
दो चार साल ज़िन्दगी में हों जनाब  जब|
             -0-
तौबा करें और तोड़दें, फ़ितरत नहीं है दोस्त,
ये काम आप पंडित-ओ-मुल्ला पे छोड़ दें |
           -०-
गलती ने एक पल की, बारूद बिछा दी है,
सदियों दिलों में सुलगे वो आग लगा दी है|
          -0-
मुंह खोलने से पहले, सोचो हजार बार,
रिश्ते न पिघल जाएं लफ़्जों की आंच से|
         -0-


आफ़रीं-सद-आफ़रीं है, उम्र के इस दौर पर,
क्या महकते जा रहे हैं,उम्र के हर मोड़ पर |
         - ० -
तल्खिए - हालात  से निकलें, तो फ़िर देखें उधर,
जिन्दगी किस हाल में है, दौर-ए-दुनिया है किधर |
           - ० -
हद तक चलता औलिया, चलता बेहद पीर,
हद,बेहद की वर्जना,  करता   नहीं फकीर |
           - ० -
हादसों  के  दौर  से  निकलें  तो  देखें इस तरफ,
दौरे-दुनिया किस तरफ है,अपना रूख है किस तरफ |
            - ० -
ज़ेरे-बहस हैं आजकल,कुछ बे-वजह के मरहले,
अब ज़रूरी सिलसिलों पर,तबसरे तक बंद हैं |
             - 0 -                      
न खुली है नींद मीठी, आगोश-ए- कब्र जाकर,
एक चैन सा मिला है,इस तंग मकां में आकर |
           - ० -
पत्थर समझ रहे हैं,क्यों दूर से जनाब,
पाएंगे मोम जैसा, आएं तो दो कदम |
         - ० -
हाथ में ले सर कटे  , जो शख्स कल दंगों में था,
आज वो मक़तल पे जाकर,सबका वारिस बन गया |
           - ० -
सिरफिरे शौक-ओ-जुनूं के,ढूंढिए कुछ माइने |
लोग ना-बीना हैं सब, हम बेचते हैं आइने |
       - ० -
तुम्हारे  मुस्कुराने से, खिले हैं सैकड़ों  गुलशन,
चमन में वर्क चमकी है,तुम्हारे खिलखिलाने से |
                - ० -
खुश्क था वो किस क़दर, उम्र का दौरे-अमल,
ढल गई उम्र तो, ग़ज़लों पे जवानी आई |
          - ० -
गर्दिशे-दौरां से खेला, 'राज' इतना सोच कर,
क्या मज़ा जीने का हो जब,काम हर आसान हो |
            - ० -
हौंसले की एक किरन, ज़ालिम पे दुधारी होगी,
मिल गई रात उन्हें, अब भोर  हमारी  होगी |
            - ० -
चल पड़ा हूं जानिबे-मंज़िल,मैं ज़िद ये ठानकर,
जान रहते हर क़दम, इसकी तरफ़ होगा मेरा |
            - ० -
लीक पर चलते हैं सारे, लोग तो हर दौर के,
हौंसलों ने राह को, ढाला है अपने तौर पर |
            - ० -
हो पराजय की कसक तो,फिर विजय मिलती नहीं,
हौंसला रख कर चलें  तो, काम हर आसान है |
            - ० -
अभी  अंगार  उगलेंगे, ये  गूंगे  लोग बस्ती के,
मेरा एक गीत तो इनको,जरा सा गुनगुनाने दो |
            - ० -
निगाहों ने निगाहों से सभी कुछ कह दिया मिलकर,
किया करते हैं यूं कुछ लोग, सबके सामने बातें |            
            - ० -
 


रसपूर्ण न हो काव्य,मगर सादगी तो है |
लालित्य से विहीन है,पर ताजगी तो है |
आए पसंद आपको,करतल ध्वनि करें,-
कविवर नहीं है'राज'मगर आदमी तो है |
     -०-
जीने को एक युग न हो,पूरी घड़ी तो है |
ना हो गगन नसीब में,धरती पड़ी तो है |
कहने को लोग कुछ कहें इसका है गम किसे,
नाचीज होगा 'राज' , मगर आदमी तो है |
    -०-
किसी के शेर ले आना,मुनासिब सा नहीं लगता |
किसी के गीत गा लेना,मुनासिब सा नहीं लगता |
अगर है पास कुछ अपने,दिखादो वह जमाने को,
किसीसे कुछ छिपालेना,मुनासिब सा नहीं लगता |
          -०-
मेरे मासूम से बच्चे,गज़ब क्या कर दिया तुमने |
सजाकर एक अच्छा सा,गुलिस्तां धर दिया तुमने |
अजब सा खेल खेला है,अजब जादूगरी की है -,
सरल कविता में प्राणों को,गले से भरदिया तुमने |
         -०-
अभी दिखता है अपनापन,हमें कविता से रिश्ते में |
झलकता है अजब , उन्माद जैसा इन बहिश्तों में |
नये कवि आज जैसे छू रहे हैं सूर्य को जाकर -,          $
बहुत सम्भावनाएं दिख रही  हैं,  इन फरिश्तों में |

कठिन पान्डित्यप्रदर्शन,नहीं है बालकविता में |
अहम् के सर्प का दंशन,नहीं है बालकविता में |
ये सपनों का समर्पण है,जो भोली आंख ने देखे,
किसी कविदर्प का दर्शन्,नहीं है बालकविता में |          $
         -०-
जहां तक हम नहीं पहुंचे,वहां तक ये पहुंचते हैं |
हमारे दिल के दर्दों से,नयन  इनके छलकते हैं |
हम अपने स्वार्थ कविता मे,न चाहे डाल देते हैं,           $
ये कविता में अचेतन सी,महक बनकर महकते हैं |
            -०-
अलंकारिक नहीं भाषा,न भावों का पुलिन्दा है |
प्रशंसा से परे हैं ये,न इनमें कोई  निन्दा  है |            $
सरल भाषा में ये दिलपर,लिखा करते हैं भावों को,
ये पिंजरे में नहीं पलता,खुले नभ का परिन्दा है |
           -०-
है निर्मल गंध सी इनमे,जो शब्दों में महकती है |
है भावों की विरल गंगा,जो छन्दों मे छलकती है |
सरलता,सौम्यता का ये,अनूठा एक संगम   है-,            $
मगर कविता में छुप कर एक चिंगारी दहकती है |
          -०-          
ये नन्हे कवि कहां से खींच कर,यह इत्र लाते हैं |
अनोखी कल्पना,भावों की सरगम मित्र  लाते हैं |
ये अनगढ हैं मगर इनमें,बहुत प्रतिभा झलकती है,        $
ये शब्दों से रचे अपने,विरल से चित्र   लाते हैं |
         -०-
कहां की बात को लाकर,कहां पर रख दिया तुमने |
यहां पर शब्द का दरिया,बहा कर रख दिया तुमने |
बड़े आसान शब्दों में,इबारत दिल पे लिख दी है,
कहां से भाव लाए हो,हिला कर रख दिया  तुमने |
           -०-
ये नन्हे तीर कविता के,दिलों पर वार करते हैं |
युगों की वर्जनाओं का,सरल    संहार करते हैं |
न इनपर शब्द ज्यादा हैं, न छंदों की बड़ी गठरी,             $
ये भावों से सरल कविता, सरस तैयार करते हैं |
            -०-
दूर क्षितिज पर चमक रहा है, नन्हा एक सितारा |
जगमग-जगमग जग करने को,लगा रहा बल सारा |
अंधियारे की फौज दौड़ कर, करती उसे विवश पर,
नहीं हार से डरता अविचल, बांट रहा उजियारा |
           - ० -
ये नन्हे दीप,नन्ही ज्योति लेकर जगमगाते हैं |
धरा को रोशनी देकर, मगन हो मुस्कुराते हैं |
हजारों मुश्किलें इनको,  डराना चाहतीं हैं पर ,
अडिग नन्हीचमक लेकर,प्रकाशितपथ बनाते हैं |
       - ० -    
लिए हाथ में नन्हा दीपक,  चलते  रहे  सलोने |
नहीं चाहिए इन बच्चों को,  ढेरों - ढेर खिलौने |
नन्हे कर से भारत की,लिखते हैं तकदीर आज ये,
सिंह सरीखे तम से लड़कर,जीत रहे है मृग के छौने |
              - ० -
पुरानी लीक पर  चलना, कभी  हमको  नहीं  भाया |
विगत गुणगान से कुछ भी,किसी को मिल नहीं पाया |
नये पथ हम  तलाशेंगे,शिखर की ओर जाने के -,            $
रखे हाथों को हाथों पर ,कभी कुछ  मिल नहीं  पाया |
           -०-
उठो उठ कर तलाशें हम,नई सम्भावनाओं  को |
करें जी तोड़कर हम अब,नई नित साधनाओं को |
सरलजीवन,सघनवैभव,अधिक आराम तलबी भी,             $
हटाकर अपने जीवन से,मिटा दें वासनाओं   को |
           -०-
हमारे दिल में पुरखों का,अभी भी ख्वाब बाकी है |
इसी से आंख में अपनी, हया की  आब बाकी है |
मुहब्बत उठ गई शहरों से लेकिन गांव में अब भी,         $
पुरानी रस्म जिन्दा है,अदब-आदाब   बाकी  है |
             -०-
उदर में आसमानों से, सहेजा बन्द अबरों को |
उतर गहराई में दिल की,कुरेदा कुन्द ज़बरों को|
प्रसवपीड़ा सही जो"राज",उसकी टीस सह-सह कर,         $
निचोड़ा दर्द दिल का तो,रचा है चन्द सतरों को |
            -०-
रहें बैठे निठल्ले  भी समय  तो  बीत जायेगा |
मगर जीने की इच्छा का घड़ा सब रीत जायेगा |
मैं बूढा हूं नहीं कुछ हो नही सकता न सोचें ये,
करें कुछ काम जनहित का,बड़ा आनन्द आयेगा |
          -०-
हजारों काम हैं  ऐसे जिन्हें  हम  खुद बना लेंगे |
किसी की जिन्दगी में हम खुशी के पल बढा देंगे |
उठो उठ कर संवारो जिन्दगी के पल जवानों से,-
उन्हें यह गर्व करने दो,कि हम दुनिया सजा देंगे |
          -०-
बिखर जाएं तो पल भर में,मिटा लें अपनी हस्ती को |
संवारें कुछ दिनों में तो, संवारें   एक     बस्ती को |
हमारे पास क्या कम है, झिझकते हम रहें क्युंकर,-
रहे हैं मस्त जब अब तक, जियेंगे  मौज-मस्ती  को |
          -०-
जब आए तो ऊसर था,बसाया है बहारों को |
पसीने से इसे सींचा, तो लाए सुखकी धारों को |
नहीं सोचा अगर होता,नई नस्लों के बारे में,-
तो कैसे झेल पाते हम,विकट तूफां हजारों को |
          -०-
यहां क्या था,हमारी नस्ल केवल जानती है |
हमारी शौर्य शक्ति को, ये धरती  मानती है |
यहां बाहों की ताकत से रहे हैं दोस्त हम जिन्दा,
हमारी बांह की ताकत, धरा पहचानती है |                $
          -०-
मिलेंगे फिर कभी तुमसे,दिलों मे आस रखते हैं |
करेंगे फिर कभी स्वागत,ये इच्छा खास रखते हैं |
खुशी से कर रहे हैं हम,विदा इन नौजवानों को,-
रहेंगे नौजवां सौ तक, यही विश्वास   करते  हैं |         $
           -०-
जो आया है उसे तो एक दिन जाना जरुरी है |
मगर हर रस्म दुनिया की, निभाना भी जरुरी है |
जिएंगे जब तलक,जिन्दादिली का पास रक्खेंगे,
भरम कुछ साथ में रख्नना,दिखाना भी जरूरी है |           $
            -०-
       चन्द रुबाइयां
चली आई बड़े तड़के,   मेरे घर  पर लिए डोली |
हमारे कान में'अब उठ'किरण कुछ् इस तरह बोली |
मिलन की रात बीती है,मिलन क्षण शेष हैं मन में,
अभी क्यों दे रही दस्तक,अभी आराम  कर भोली |
             -०-
तुम्हारी रेशमी आहट, मेरे  जब   पास आती है |
मिलन की कामनाओं का,मधुर अहसास लाती है |
मुझे अमराइयों के झुटपुटे क्षण याद  आते   हैं,
सितारों से भरा आंगन,मिलन की आस लाती है |
             -०-
तुम्हारी देह    का दर्पण , मेरा  श्रंगार  करता है |          $
छिपी मन में    अगर पीड़ा,त्वरित संहार करता है |
मिलन सौ    बार होता है,अगर तुमसे अकेले में,
मिलें कुछ और क्षण मुझको,हृदय हर बार करता है |
             -०-
मिलन की प्यास बुझ जाये, कहें ये देह के धागे |
यही  क्षण चक्षु ने चाहा,  यही मन गेह ने चाहे |
रहो सानिध्य में हरदम , यही है कामना प्रियतम,
तुम्हारे साथ क्यों बांधे,  ये हमने स्नेह के धागे |
             -०-
मलय  सा   हो गया हल्का, क्षितिज के पार चलता   हूं |
छिड़क कर कामना सारी,  तुम्हारे नेह से बाहर निकलता हूं |
सृजन नव कर दिया हमने , नवल संसार  का   प्रियतम ,
धरोहर रूप में अर्पण, क्षणिक लम्हों का ये अंबार करता हूं |
              -०-
मातृभाषा पर जिसे,अपनी न स्वाभिमान है |
राष्ट्रभाषा के प्रति, रखता नहीं अधिमान  है |
पूर्ण पशुवत है जिसे,ना शीर्ष पर हो राष्ट्रप्रेम,
सम्पदामय हो,अकिंचन का सही प्रतिमान है |
        -०-
उठो उठकर तलाशें  हम, नई  सम्भावनाओं को |
करें हिन्दी की अब सेवा,करें नव- साधनाओं को,
सरल जीवन,सघन मेहनत,यही चाहा है हिन्दी ने,
हटाकर अपने जीवन से,मिटा दें धारणाओं  को |
        -०-
हमारे दिल में हिन्दी का,अभी भी ख्वाब बाकी है |
इसी से दिल की धड़कन में,दिलेबेताब  बाकी  है |
शहर से उठ गई हिन्दी,हमारे गांव में    लेकिन,
धड़कती है दिलों मे वो,सरो-शादाब    बाकी  है |
        -०-
मैं हिन्दी हूं,मै हिन्दी था,रहूंगा मैं सदा  हिन्दी |
है हिन्दी ही कथा मेरी,रही हमदम सदा  हिन्दी |
नहीं हूं वर्णसंकर मैं,जो बोलूंगा  अलग  भाषा,
मैं भारत मां का बेटा हूं,मैं बोलूंगा सदा हिन्दी  |
        -०-
करेगी देश को जगमग,मुझे विश्वास विश्वास हिन्दी का |
है उत्सव के लिये निशचित,सितम्बर मास हिन्दी का |
हर एक चौद्ह सितम्बर को,मनाते हैं हम 'हिन्दी डे'-
इसी दिन हम किया करते हैं,तर्पण खास हिन्दी  का |
        -०-
मनाते इस तरह से हम, अजब त्योहार हिन्दी   का |
इकट्ठे हो लिये, मातम मना, हर बार  हिन्दी  का |
बना कर एक खबर भेजी जहां छपता  है   रोजाना-,
फिर अगले दिन पढ़ा करते हैं हम,अखबार हिन्दी का |
        -०-
गवइयों की सजी महफिल,गवइये सुर लगाते हैं |
कुछ अपने खूबसूरत मुख,अदाएं कर दिखाते  हैं |
हमारे पास क्या,सूखे शजर में फूल खिलते क्या ?,         $
लो हम भी आपके सम्मुख,मटककर हिनहिनाते हैं |
          -०-
कवि को धैर्य से सुनना, अजब है  बेबसी यारो |
यहां हमको बुलाया है, ये इनकी  बेबसी  यारो |
चलो इस हाथ खुशियां लें,तुम्हें देते हैं गम भारी,            $
सुनो इतने तो हमको भी,समझलो बेबसी  यारो |
          -०-
तू श्वानों की तरह से भोंकता और वार करता है |
वतन को बेच खाने के नियम तैयार  करता  है |
विदेशी बैंक में जाकर तू रखता है कमाई   को,
लड़ा कर धर्म-जाति पर,वतन बरबाद करता  है |
          -०-
अरे शिशुपाल सा बरताब करना छोड़ दे अब तो |
बिदकना,भोंकना,बकवास करना छोड़ दे अब तो |
तुझे हम माफ कर देंगे,अगर सत्ता की खातिर तू,
वतन का बेचना,व्यापार करना छोड़ दे अब  तो |
         -०-
ये श्वानों सा रुदन तू झींक कर हर बार करता है |
हमारी राष्ट्र्-भक्ति पर,तू हरदम   वार करता  है |
अरे सत्ताके भंवरे सुन, न  आतंकी  हमें   कहना,
यहां का मूल हर ब्च्चा,वतन को प्यार करता है |
              -०-
उलझना मत कभी हमसे,अगर ली हमने अंगड़ाई |
वहीं पर ड़ाल देंगे हम ,  जहां बिकती है चतुराई |
हम आंधी हैं तेरी कीलों से हम रुक नहीं सकते ,
जो दृष्टि वक्र की हमने, न मिल पायेगी परछांई |
               -०-
बड़प्पन है हमारा ये,कि हम चुपचाप रहते  हैं  |
तू हमको गालियां देता है,हम सन्ताप सहते हैं  |
मगर सत्ता के लोलुप सुन,अति का अंत होता है,
सहेंगे अब नहीं कुछ भी, ये तुझसे साफ कह्ते है |

यूं तो कहने को वतन में,अब सवेरा हो गया |
नफरतों का हरतरफ, लेकिन अंधेरा हो गया |
देश के रक्षक का हमने,जिसको बख्शा था खिताब,
बदनसीबी"राज"अपनी,  वो लुटेरा हो गया |
       -०-
उन्नत ललाट पर चमक रही,भारत माता की बिन्दी है |
है ब्रह्मपुत्र सम हिमनद यह,सतलुज,सरयू,कालिन्दी है |          $
जो आकर मिला पवित्र हुआ,है पतित-पावनी मां जैसी,
वर्तनी सरल,  भाषा  सीधी, निर्मल गंगा सम हिन्दी है |
      -०-
अब नही आतंक से डर,शेष तक ना वेदना है |
चक्षु लाखों अब सजग हैं, वार तेरा देखना है |               $
देश में ही रह रहे,  विश्वासघाती  वार कर -,
जाग कर बैठा है हिन्दू,मुस्लिमों में चेतना है |
      -०-
निकले थे हम कहां के लिये आ गये कहां |
हर ओर लाश खून है,उजड़ा  है हर  मकां |
किसने लगादी आग फिर, अम्नोअमान को,
फिर दिख रहा है हर तरफ,उठता हुआ धुआं |
     -०-
रिश्तों के तार तोड़कर,बैठे हुये हैं कयों |
हम नफरतों के दौर,समेटे हुये हैं क्यों |                   $
सांझी विरासतों का, इतिहास भूलकर ,
बारूद के एक ढेर पर बैठे हुये हैं क्यॉ |
     -०-
तन बिक गया बाजार में,थोड़े से धान् में |
बिखरी पड़ी है लाज एक्,सूने मकान  में |
सपना यही था क्या मेरे,आज़ादहिन्द का,                 $
जन्ता का ये भविष्य है,भारत महान में |
     -०-
तुम्हारी रेशमी आहट , तृणों से प्यार है मुझको |
अनक्षत देह परमित के कणों से प्यार है मुझको |
निकट सानिध्य में बीते तुम्हारे साथ जो स्वर्णिम,
रहे सौगात जीवन के , क्षणों से प्यार है मुझको |
         -०-
मंद-मंद मादक-मलयानिल को संग लिए, करता काम-केलिकृत्य,गिरि तक आता है |
शीतल,सहज-शांत,सौन्दर्य को समाए तन, बहु - विधि,बादल, बहार  बन  जाता है |
पानी  नहीं  प्रीत  के  पुनीत  पंख-पांवड़े,पूर्णिमा के पुण्य-पूर्ण, पावन प्रकाश  में -
दूर  कहीं  देर तक, दुन्दुभि  निनाद कर ,प्रेम के प्रसून , प्रेम - पूर्ण  बरसाता है |          
          -0-
अविरल, अनन्त, अवशेष  रह  जाय  यह,
क्रम किस भांति,कौन किसका निभाता है |
पर्यावरण  पूर्ण    पहले    सा,  'राज'  हो,
दायित्व हम आप पर, अब आ जाता ही |
        -0-
हिन्दुत्व पर अपने नहीं जिसको तनिक अभिमान है |
पशु सरीखा, जी रहा,  सब से अधम  इन्सान है |
सोच  रक्खो  ये   हमेशा, श्रेष्ट  थे  हम  श्रेष्ट हैं ,
हिन्दुत्व ही इस विश्व का, सब से बड़ा सम्मान है |
     -०-
    कवि-संगोष्ठी
मिला व्यक्तित्व आकर्षक,गला क्या खूब पाया है |
हिला कर रख दिया सबको,जरा सा गुनगुनाया है |
चहेते बन गये हैं वो,जमाने भर के कुछ दिन में,
भरा हर रंग कविता में, जो सबको खूब भाया है |
           -०-
उसी दिन फिर से मिलते हैं,लिपट कर खूब मिलते हैं |
वो लिखते हैं तो अपने में, सिमट कर खूब लिखते हैं |
वो महफिल में कहीं जाकर, अगर कविता सुना दें तो,
वहां शबनम की बूंदों से,  निखर कर फूल खिलते  हैं |
            -०-
वो सूरज हैं उन्हें दीपक दिखाना, क्या उचित होगा |
वो रह्बर हैं उन्हें राहें  बताना,  क्या उचित होगा |
जहां आकर कई नदियां मिलें,  साहित्य  गंगा से,
वहां सागर से कुछ बूंदें उठाना,  क्या उचित होगा |
            -०-
उन्हें दीपक कहा जाना, सरासर ज्यादती   होगी |
शमा भी उनकी कविता पर,महारत जानती होगी |
वो माइक पर खड़े होकर, हमें कविता   सुनायेंगे,
ये सुन कर आज कविता भी,कहींपर कांपती होगी |
               -०-
परीक्षक मैं अगर होता,तो सौ में सौ तुझे देता |
यहीं पर मैं नहीं रुकता,जरा सा और बढ लेता |
लिखी है जिस तरह कविता,हृदय की रोशनाई से,
अलग से चार सौ नम्बर,तुझे बोनस के दे देता |
           -०-
सतरों में चन्द आपने,क्या-क्या बयां किया |
लफ्जों में हालेदिल को,पिरो कर अयां किया |
चिलमन के साथ बैठ कर,दो लफ्ज क्या कहे,
खुशरगं सा जैसे यहां, मौसम खिला दिया |
           -0-
हे मधु-गंधे मधुबाला सी,
तू सुरभित है सुरबाला सी |
अन्तर तक अगम अगोचर है-
मधु छलकाती मधुशाला सी |
           -0-
सूर्य अस्तांचल चला,पूछा धरा ने ये सवाल |
इस अंधेरे में रखेगा,कौन अब मेरा खयाल |
चुप हैं सब ये देख,नन्हे दीप ने उठकर कहा,
सूर्य जैसा मै बनूंगा, लेके एक नन्हीं मशाल |
         -0-
चली आई मेरे उर में , तुम्हारी  याद  की  डोली |
उठाकर  नैन  उन्मीलित , लरजते प्यार से बोली |
गुजरते हैं कहो कैसे तरसते पल , तो मैं बोला-
हिमालय हो गया तुम बिन निमिष भी काटना भोली |
          -०-

जीने को एक युग न हो, पूरी घड़ी तो है |
सांसों की डोर,वक़्त से जुड़ती लड़ी तो है |
कहते रहें ये लोग के, पाने को कुछ नहीं,
ना हो पहुंच आकाश तक,धरती पड़ी तो है |
         - ० -
जन्मे, पढे, नौकर  हुए,  होकर  रिटायर घर गए,
कुछ दिनों के बाद, रगड़ीं  एड़ियां   और मर गए |
इस मिथक को तोड़,जो भी वक़्त से लड़ कर जिए,
वो समय के शीर्ष-पट पर, नाम अंकित कर गए |
            - 0 -
केवल नारे और बातों से, सद्कर्म नहीं बन पाते हैं |
जो दृढ निश्चय लेकर चलते, पर्वत पर राह बनाते है |
बाधा आए,संकट आए, रुकना उन  को स्वीकार नहीं,
कायर चलते नीचे झुककर,सर सब के वीर झुकाते हैं |
                  - 0 -
 नहीं जानता हूं के मन्ज़िल कहां है |
अभी तो सफ़र का इरादा किया है |
कहीं भी मिले, ढूंढ लूगा मैं तुझ को ,
मन्जिल से अपनी ये वादा किया है |
               - 0 -
सबकी रोटी से उन्हें, हिस्सा बड़ा मिलता रहे |
चाहते हैं लोग रस्मन, सिलसिला चलता रहे |
मेरी कोशिश है यहीं पर,खत्म हो ये सिलसिला,
हर किसी का हक़ उसे, मांगे बिना मिलता रहे |
          - ० -
हर कहीं पर एक घटना घट रही है |
पेड़ की हर एक टहनी कट रही है |
बढ रहे आवास इंसानो के,लेकिन,
बेबस परिंदों की बसावत घट रही है |
          - ० -
आप सब ज़िन्दा रहें,बस इसलिए लिखते है हम |
ज़िन्दगी के वास्ते ही, मरसिए लिखते  हैं  हम  |
बारूद के एक ढेर पर, बैठा हुआ है ये जहां,
मौत से कैसे बचें,  ये सिलसिले लिखते हैं हम |
           - ० -
       

mere chand ashaar


mere chand ashaar

इस शहर के नाम से, जाना है लोगों ने हमें,
अब हमारे नाम से, जानेंगे इसको 'राज' सब |
            - 0 -
दूर से देखें, तो लगता है समन्दर में सुकूं,
पास जाकर देखिए,वो किस कदर बेचैन है |
          -०-
कौन कहता है समन्दर में,सुकूं है, चैन है,                          
देखिए नजदीक जाकर,हद तलक बेचैन है |
          -०-
 कह दिया किसने समन्दर,ज़र्फ से खामोश है ,
देखिये साहिल से वो,मदमस्त है, मदहोश है |
          -o-                                                          
हों इरादे जब अटल तब राह को कया देखना,
जिस तरफ भी चल पड़ेंगे,रास्ते मिल जाएंगे |      $
          -०-
 पर्वतों से हौंसले  लेकर चलेंगे 'राज' हम ,
रास्ता देगा समन्दर,आसमां हिल जाएगा |
           -०-
किस तरह रक्खी गई है बात किस के सामने,
है मुफस्सिर तो जरुरी, है असर हर बात का |
          -0-
दोबाला शान हो जाती,असर कुछ बढ गया होता ,
कहा जो तैश में तुमने,अगर हंस कर कहा होता |
           -०-
फासलों ने भी बढाई हैं  कभी नज़दीकियां,
पर कभी नज़दीकियों से बढ गई हैं दूरियां |
           -0-
फासले भी कर दिया करते हैं दूरी कम कभी,
पर कभी नज़दीकियों से बढ गये हैं फासले  \
          -0-


उल्झनों ने इस  तरह  घेरा दिले-बेताब को,
इतने टुकड़े हो गये,भारत की संसद हो गया |
         -०-
 इस  तरह घेरा हसीनों ने, दिल-ए-नादान को,
इतने ख़ाने हो गये , भारत का नक्शा हो गया |
           -०-
निगाहों  ही निगाहों में , निगाहें   बात कर आईं-
खबर दिल को न लगने दी,अयां सबकुछ किया यारो |
            -0-
सुनाना हाल--- दिल था  बस,बयां आंखों ने कर डाला ,
मुहब्बत के फसाने  में,जुबां   का काम क्या यारो |
           -०-
निगाहों ने निगाहों से फसाने कह दिय सारे,
दिलों की बात कहने को,जुबां कब काम आती है |
           -०-
जो कहना था सभी कुछ कह दिया उनकी निगाहों ने,
बचा क्या है जो कहने को,जुबां अल्फाज़ दोहराये |
           -०-
निगाहो ने निगाहों से कहा जो उनको कहना था,
कहो क्या राज़ की बातें,सरे बाज़ार की जायें |
           -०-
ईद  पर  रस्म  है,मिलते  हैं  गले  सब बढ़कर |
चलो मिलकर गले,इस ईद पर हम दोस्त हो जाएं |
          -०-
वस्ल पर रोक लगा दी है,चलो मान गये |
ईद पर दीद न हो, रस्म भी तोड़ी तुमने |
          -०-
ईद पर उनसे कहा,आओ गले मिल जाओ |
दबा के होंठ ये बोले,मिंयां  मुंह धो आओ |
          -०-


जवानी में क़दम रखते ही,जगमग कर दिया आलम |
जवां भरपूर होकर तुम,ग़ज़ब ढ़ाओगे  क्या  जानम |
          -०-
नहीं है उम्र कम लेकिन,बहुत भोले हैं दिल के वो |
किये ज़िद कल से बैठे हैं,दिखाओ दर्दे दिल हमको |
          -०-
इन्तहा करदी जहां वालों ने,अपने प्यार की तुझ पर |
तभी तो ले गये तुझ को , उठा कर आस्मां  वाले |
               -०-
तुम क्या गये कि साथ सब,खुशियां चली गयीं |
तुम सो गये तो साथ हर,लज़्ज़त भी सो गयी |
               -०-
अभी से आंख में आंसू, ये कैसा ज़र्फ है साक़ी |           $
अभी तो दास्ताने ग़म, शुरू भी की नहीं हमने |
              -०-
बहारों में  हमें  भी याद कर लेना चमन वालो,
बहुत सींचा पसीने से,चमन हमने भी ये बरसों |
              -०-
तरतीब से ख्वाबों की, ये  ज़ीस्त  बनी है,
ये ख्वाब बिखर जाएं तो,फिर मौत भली है |
              -०-
कुछ लोग तो पल भर में,जीते हैं ज़ीस्त पूरी,
कुछ लोग सौ बरस में,पल भर भी नहीं जीते |            $
             -०-
क्या बात है चमन में, फीका  है  रंग सबका,
ग़ुलचीं को कुछ हुआ क्या,सिसके है गुंचा-गुंचा |
              -०-
हो शाख  से अलग तो,रोता है शजर बरसों,
जिस ग़ुल को बहारों में, नाज़ों से संवारा हो |
              -0-


तूफान की धमकी से,कदमों से लिपट जाए ,
ये सच है बाअदब है,बुज़दिल नहीं है'राज' |
           -०-
लिपटी हुई खुश्बू को,गुल से तो हटा पहले,
यादों को मेरे दिल से,फिर अपनी ह्टा लेना |
           -०-
क्युं फंस रहे हो जाल में,मकड़ी के जानकर,
रोओगे सर पकड़ के,किसी दिन मलाल कर |
        -०-
महफिल में यूं रूसवा करे,किसकी मजाल थी,
साज़िश में तेरा हाथ  है,    मालूम था मुझे |
        -०-
मैं हवादिस के थपेड़ों से ये लाया हूं सबक,
जब भी डूबा है सफीना,दोस्त ही हमसाज़ थे |
        -०-
फ़ुरसत किसे है जो करे तौबा जनाब अब|
दो चार साल ज़िन्दगी के रह गये हों जब|
             -०-
फ़ुरसत किसे है जो करे तौबा जनाब अब|
दो चार साल ज़िन्दगी में हों जनाब  जब|
             -0-
तौबा करें और तोड़दें, फ़ितरत नहीं है दोस्त,
ये काम आप पंडित-ओ-मुल्ला पे छोड़ दें |
           -०-
गलती ने एक पल की, बारूद बिछा दी है,
सदियों दिलों में सुलगे वो आग लगा दी है|
          -0-
मुंह खोलने से पहले, सोचो हजार बार,
रिश्ते न पिघल जाएं लफ़्जों की आंच से|
         -0-


आफ़रीं-सद-आफ़रीं है, उम्र के इस दौर पर,
क्या महकते जा रहे हैं,उम्र के हर मोड़ पर |
         - ० -
तल्खिए - हालात  से निकलें, तो फ़िर देखें उधर,
जिन्दगी किस हाल में है, दौर-ए-दुनिया है किधर |
           - ० -
हद तक चलता औलिया, चलता बेहद पीर,
हद,बेहद की वर्जना,  करता   नहीं फकीर |
           - ० -
हादसों  के  दौर  से  निकलें  तो  देखें इस तरफ,
दौरे-दुनिया किस तरफ है,अपना रूख है किस तरफ |
            - ० -
ज़ेरे-बहस हैं आजकल,कुछ बे-वजह के मरहले,
अब ज़रूरी सिलसिलों पर,तबसरे तक बंद हैं |
             - 0 -                      
न खुली है नींद मीठी, आगोश-ए- कब्र जाकर,
एक चैन सा मिला है,इस तंग मकां में आकर |
           - ० -
पत्थर समझ रहे हैं,क्यों दूर से जनाब,
पाएंगे मोम जैसा, आएं तो दो कदम |
         - ० -
हाथ में ले सर कटे  , जो शख्स कल दंगों में था,
आज वो मक़तल पे जाकर,सबका वारिस बन गया |
           - ० -
सिरफिरे शौक-ओ-जुनूं के,ढूंढिए कुछ माइने |
लोग ना-बीना हैं सब, हम बेचते हैं आइने |
       - ० -
तुम्हारे  मुस्कुराने से, खिले हैं सैकड़ों  गुलशन,
चमन में वर्क चमकी है,तुम्हारे खिलखिलाने से |
                - ० -
खुश्क था वो किस क़दर, उम्र का दौरे-अमल,
ढल गई उम्र तो, ग़ज़लों पे जवानी आई |
          - ० -
गर्दिशे-दौरां से खेला, 'राज' इतना सोच कर,
क्या मज़ा जीने का हो जब,काम हर आसान हो |
            - ० -
हौंसले की एक किरन, ज़ालिम पे दुधारी होगी,
मिल गई रात उन्हें, अब भोर  हमारी  होगी |
            - ० -
चल पड़ा हूं जानिबे-मंज़िल,मैं ज़िद ये ठानकर,
जान रहते हर क़दम, इसकी तरफ़ होगा मेरा |
            - ० -
लीक पर चलते हैं सारे, लोग तो हर दौर के,
हौंसलों ने राह को, ढाला है अपने तौर पर |
            - ० -
हो पराजय की कसक तो,फिर विजय मिलती नहीं,
हौंसला रख कर चलें  तो, काम हर आसान है |
            - ० -
अभी  अंगार  उगलेंगे, ये  गूंगे  लोग बस्ती के,
मेरा एक गीत तो इनको,जरा सा गुनगुनाने दो |
            - ० -
निगाहों ने निगाहों से सभी कुछ कह दिया मिलकर,
किया करते हैं यूं कुछ लोग, सबके सामने बातें |            
            - ० -
 


रसपूर्ण न हो काव्य,मगर सादगी तो है |
लालित्य से विहीन है,पर ताजगी तो है |
आए पसंद आपको,करतल ध्वनि करें,-
कविवर नहीं है'राज'मगर आदमी तो है |
     -०-
जीने को एक युग न हो,पूरी घड़ी तो है |
ना हो गगन नसीब में,धरती पड़ी तो है |
कहने को लोग कुछ कहें इसका है गम किसे,
नाचीज होगा 'राज' , मगर आदमी तो है |
    -०-
किसी के शेर ले आना,मुनासिब सा नहीं लगता |
किसी के गीत गा लेना,मुनासिब सा नहीं लगता |
अगर है पास कुछ अपने,दिखादो वह जमाने को,
किसीसे कुछ छिपालेना,मुनासिब सा नहीं लगता |
          -०-
मेरे मासूम से बच्चे,गज़ब क्या कर दिया तुमने |
सजाकर एक अच्छा सा,गुलिस्तां धर दिया तुमने |
अजब सा खेल खेला है,अजब जादूगरी की है -,
सरल कविता में प्राणों को,गले से भरदिया तुमने |
         -०-
अभी दिखता है अपनापन,हमें कविता से रिश्ते में |
झलकता है अजब , उन्माद जैसा इन बहिश्तों में |
नये कवि आज जैसे छू रहे हैं सूर्य को जाकर -,          $
बहुत सम्भावनाएं दिख रही  हैं,  इन फरिश्तों में |

कठिन पान्डित्यप्रदर्शन,नहीं है बालकविता में |
अहम् के सर्प का दंशन,नहीं है बालकविता में |
ये सपनों का समर्पण है,जो भोली आंख ने देखे,
किसी कविदर्प का दर्शन्,नहीं है बालकविता में |          $
         -०-
जहां तक हम नहीं पहुंचे,वहां तक ये पहुंचते हैं |
हमारे दिल के दर्दों से,नयन  इनके छलकते हैं |
हम अपने स्वार्थ कविता मे,न चाहे डाल देते हैं,           $
ये कविता में अचेतन सी,महक बनकर महकते हैं |
            -०-
अलंकारिक नहीं भाषा,न भावों का पुलिन्दा है |
प्रशंसा से परे हैं ये,न इनमें कोई  निन्दा  है |            $
सरल भाषा में ये दिलपर,लिखा करते हैं भावों को,
ये पिंजरे में नहीं पलता,खुले नभ का परिन्दा है |
           -०-
है निर्मल गंध सी इनमे,जो शब्दों में महकती है |
है भावों की विरल गंगा,जो छन्दों मे छलकती है |
सरलता,सौम्यता का ये,अनूठा एक संगम   है-,            $
मगर कविता में छुप कर एक चिंगारी दहकती है |
          -०-          
ये नन्हे कवि कहां से खींच कर,यह इत्र लाते हैं |
अनोखी कल्पना,भावों की सरगम मित्र  लाते हैं |
ये अनगढ हैं मगर इनमें,बहुत प्रतिभा झलकती है,        $
ये शब्दों से रचे अपने,विरल से चित्र   लाते हैं |
         -०-
कहां की बात को लाकर,कहां पर रख दिया तुमने |
यहां पर शब्द का दरिया,बहा कर रख दिया तुमने |
बड़े आसान शब्दों में,इबारत दिल पे लिख दी है,
कहां से भाव लाए हो,हिला कर रख दिया  तुमने |
           -०-
ये नन्हे तीर कविता के,दिलों पर वार करते हैं |
युगों की वर्जनाओं का,सरल    संहार करते हैं |
न इनपर शब्द ज्यादा हैं, न छंदों की बड़ी गठरी,             $
ये भावों से सरल कविता, सरस तैयार करते हैं |
            -०-
दूर क्षितिज पर चमक रहा है, नन्हा एक सितारा |
जगमग-जगमग जग करने को,लगा रहा बल सारा |
अंधियारे की फौज दौड़ कर, करती उसे विवश पर,
नहीं हार से डरता अविचल, बांट रहा उजियारा |
           - ० -
ये नन्हे दीप,नन्ही ज्योति लेकर जगमगाते हैं |
धरा को रोशनी देकर, मगन हो मुस्कुराते हैं |
हजारों मुश्किलें इनको,  डराना चाहतीं हैं पर ,
अडिग नन्हीचमक लेकर,प्रकाशितपथ बनाते हैं |
       - ० -    
लिए हाथ में नन्हा दीपक,  चलते  रहे  सलोने |
नहीं चाहिए इन बच्चों को,  ढेरों - ढेर खिलौने |
नन्हे कर से भारत की,लिखते हैं तकदीर आज ये,
सिंह सरीखे तम से लड़कर,जीत रहे है मृग के छौने |
              - ० -
पुरानी लीक पर  चलना, कभी  हमको  नहीं  भाया |
विगत गुणगान से कुछ भी,किसी को मिल नहीं पाया |
नये पथ हम  तलाशेंगे,शिखर की ओर जाने के -,            $
रखे हाथों को हाथों पर ,कभी कुछ  मिल नहीं  पाया |
           -०-
उठो उठ कर तलाशें हम,नई सम्भावनाओं  को |
करें जी तोड़कर हम अब,नई नित साधनाओं को |
सरलजीवन,सघनवैभव,अधिक आराम तलबी भी,             $
हटाकर अपने जीवन से,मिटा दें वासनाओं   को |
           -०-
हमारे दिल में पुरखों का,अभी भी ख्वाब बाकी है |
इसी से आंख में अपनी, हया की  आब बाकी है |
मुहब्बत उठ गई शहरों से लेकिन गांव में अब भी,         $
पुरानी रस्म जिन्दा है,अदब-आदाब   बाकी  है |
             -०-
उदर में आसमानों से, सहेजा बन्द अबरों को |
उतर गहराई में दिल की,कुरेदा कुन्द ज़बरों को|
प्रसवपीड़ा सही जो"राज",उसकी टीस सह-सह कर,         $
निचोड़ा दर्द दिल का तो,रचा है चन्द सतरों को |
            -०-
रहें बैठे निठल्ले  भी समय  तो  बीत जायेगा |
मगर जीने की इच्छा का घड़ा सब रीत जायेगा |
मैं बूढा हूं नहीं कुछ हो नही सकता न सोचें ये,
करें कुछ काम जनहित का,बड़ा आनन्द आयेगा |
          -०-
हजारों काम हैं  ऐसे जिन्हें  हम  खुद बना लेंगे |
किसी की जिन्दगी में हम खुशी के पल बढा देंगे |
उठो उठ कर संवारो जिन्दगी के पल जवानों से,-
उन्हें यह गर्व करने दो,कि हम दुनिया सजा देंगे |
          -०-
बिखर जाएं तो पल भर में,मिटा लें अपनी हस्ती को |
संवारें कुछ दिनों में तो, संवारें   एक     बस्ती को |
हमारे पास क्या कम है, झिझकते हम रहें क्युंकर,-
रहे हैं मस्त जब अब तक, जियेंगे  मौज-मस्ती  को |
          -०-
जब आए तो ऊसर था,बसाया है बहारों को |
पसीने से इसे सींचा, तो लाए सुखकी धारों को |
नहीं सोचा अगर होता,नई नस्लों के बारे में,-
तो कैसे झेल पाते हम,विकट तूफां हजारों को |
          -०-
यहां क्या था,हमारी नस्ल केवल जानती है |
हमारी शौर्य शक्ति को, ये धरती  मानती है |
यहां बाहों की ताकत से रहे हैं दोस्त हम जिन्दा,
हमारी बांह की ताकत, धरा पहचानती है |                $
          -०-
मिलेंगे फिर कभी तुमसे,दिलों मे आस रखते हैं |
करेंगे फिर कभी स्वागत,ये इच्छा खास रखते हैं |
खुशी से कर रहे हैं हम,विदा इन नौजवानों को,-
रहेंगे नौजवां सौ तक, यही विश्वास   करते  हैं |         $
           -०-
जो आया है उसे तो एक दिन जाना जरुरी है |
मगर हर रस्म दुनिया की, निभाना भी जरुरी है |
जिएंगे जब तलक,जिन्दादिली का पास रक्खेंगे,
भरम कुछ साथ में रख्नना,दिखाना भी जरूरी है |           $
            -०-
       चन्द रुबाइयां
चली आई बड़े तड़के,   मेरे घर  पर लिए डोली |
हमारे कान में'अब उठ'किरण कुछ् इस तरह बोली |
मिलन की रात बीती है,मिलन क्षण शेष हैं मन में,
अभी क्यों दे रही दस्तक,अभी आराम  कर भोली |
             -०-
तुम्हारी रेशमी आहट, मेरे  जब   पास आती है |
मिलन की कामनाओं का,मधुर अहसास लाती है |
मुझे अमराइयों के झुटपुटे क्षण याद  आते   हैं,
सितारों से भरा आंगन,मिलन की आस लाती है |
             -०-
तुम्हारी देह    का दर्पण , मेरा  श्रंगार  करता है |          $
छिपी मन में    अगर पीड़ा,त्वरित संहार करता है |
मिलन सौ    बार होता है,अगर तुमसे अकेले में,
मिलें कुछ और क्षण मुझको,हृदय हर बार करता है |
             -०-
मिलन की प्यास बुझ जाये, कहें ये देह के धागे |
यही  क्षण चक्षु ने चाहा,  यही मन गेह ने चाहे |
रहो सानिध्य में हरदम , यही है कामना प्रियतम,
तुम्हारे साथ क्यों बांधे,  ये हमने स्नेह के धागे |
             -०-
मलय  सा   हो गया हल्का, क्षितिज के पार चलता   हूं |
छिड़क कर कामना सारी,  तुम्हारे नेह से बाहर निकलता हूं |
सृजन नव कर दिया हमने , नवल संसार  का   प्रियतम ,
धरोहर रूप में अर्पण, क्षणिक लम्हों का ये अंबार करता हूं |
              -०-
मातृभाषा पर जिसे,अपनी न स्वाभिमान है |
राष्ट्रभाषा के प्रति, रखता नहीं अधिमान  है |
पूर्ण पशुवत है जिसे,ना शीर्ष पर हो राष्ट्रप्रेम,
सम्पदामय हो,अकिंचन का सही प्रतिमान है |
        -०-
उठो उठकर तलाशें  हम, नई  सम्भावनाओं को |
करें हिन्दी की अब सेवा,करें नव- साधनाओं को,
सरल जीवन,सघन मेहनत,यही चाहा है हिन्दी ने,
हटाकर अपने जीवन से,मिटा दें धारणाओं  को |
        -०-
हमारे दिल में हिन्दी का,अभी भी ख्वाब बाकी है |
इसी से दिल की धड़कन में,दिलेबेताब  बाकी  है |
शहर से उठ गई हिन्दी,हमारे गांव में    लेकिन,
धड़कती है दिलों मे वो,सरो-शादाब    बाकी  है |
        -०-
मैं हिन्दी हूं,मै हिन्दी था,रहूंगा मैं सदा  हिन्दी |
है हिन्दी ही कथा मेरी,रही हमदम सदा  हिन्दी |
नहीं हूं वर्णसंकर मैं,जो बोलूंगा  अलग  भाषा,
मैं भारत मां का बेटा हूं,मैं बोलूंगा सदा हिन्दी  |
        -०-
करेगी देश को जगमग,मुझे विश्वास विश्वास हिन्दी का |
है उत्सव के लिये निशचित,सितम्बर मास हिन्दी का |
हर एक चौद्ह सितम्बर को,मनाते हैं हम 'हिन्दी डे'-
इसी दिन हम किया करते हैं,तर्पण खास हिन्दी  का |
        -०-
मनाते इस तरह से हम, अजब त्योहार हिन्दी   का |
इकट्ठे हो लिये, मातम मना, हर बार  हिन्दी  का |
बना कर एक खबर भेजी जहां छपता  है   रोजाना-,
फिर अगले दिन पढ़ा करते हैं हम,अखबार हिन्दी का |
        -०-
गवइयों की सजी महफिल,गवइये सुर लगाते हैं |
कुछ अपने खूबसूरत मुख,अदाएं कर दिखाते  हैं |
हमारे पास क्या,सूखे शजर में फूल खिलते क्या ?,         $
लो हम भी आपके सम्मुख,मटककर हिनहिनाते हैं |
          -०-
कवि को धैर्य से सुनना, अजब है  बेबसी यारो |
यहां हमको बुलाया है, ये इनकी  बेबसी  यारो |
चलो इस हाथ खुशियां लें,तुम्हें देते हैं गम भारी,            $
सुनो इतने तो हमको भी,समझलो बेबसी  यारो |
          -०-
तू श्वानों की तरह से भोंकता और वार करता है |
वतन को बेच खाने के नियम तैयार  करता  है |
विदेशी बैंक में जाकर तू रखता है कमाई   को,
लड़ा कर धर्म-जाति पर,वतन बरबाद करता  है |
          -०-
अरे शिशुपाल सा बरताब करना छोड़ दे अब तो |
बिदकना,भोंकना,बकवास करना छोड़ दे अब तो |
तुझे हम माफ कर देंगे,अगर सत्ता की खातिर तू,
वतन का बेचना,व्यापार करना छोड़ दे अब  तो |
         -०-
ये श्वानों सा रुदन तू झींक कर हर बार करता है |
हमारी राष्ट्र्-भक्ति पर,तू हरदम   वार करता  है |
अरे सत्ताके भंवरे सुन, न  आतंकी  हमें   कहना,
यहां का मूल हर ब्च्चा,वतन को प्यार करता है |
              -०-
उलझना मत कभी हमसे,अगर ली हमने अंगड़ाई |
वहीं पर ड़ाल देंगे हम ,  जहां बिकती है चतुराई |
हम आंधी हैं तेरी कीलों से हम रुक नहीं सकते ,
जो दृष्टि वक्र की हमने, न मिल पायेगी परछांई |
               -०-
बड़प्पन है हमारा ये,कि हम चुपचाप रहते  हैं  |
तू हमको गालियां देता है,हम सन्ताप सहते हैं  |
मगर सत्ता के लोलुप सुन,अति का अंत होता है,
सहेंगे अब नहीं कुछ भी, ये तुझसे साफ कह्ते है |

यूं तो कहने को वतन में,अब सवेरा हो गया |
नफरतों का हरतरफ, लेकिन अंधेरा हो गया |
देश के रक्षक का हमने,जिसको बख्शा था खिताब,
बदनसीबी"राज"अपनी,  वो लुटेरा हो गया |
       -०-
उन्नत ललाट पर चमक रही,भारत माता की बिन्दी है |
है ब्रह्मपुत्र सम हिमनद यह,सतलुज,सरयू,कालिन्दी है |          $
जो आकर मिला पवित्र हुआ,है पतित-पावनी मां जैसी,
वर्तनी सरल,  भाषा  सीधी, निर्मल गंगा सम हिन्दी है |
      -०-
अब नही आतंक से डर,शेष तक ना वेदना है |
चक्षु लाखों अब सजग हैं, वार तेरा देखना है |               $
देश में ही रह रहे,  विश्वासघाती  वार कर -,
जाग कर बैठा है हिन्दू,मुस्लिमों में चेतना है |
      -०-
निकले थे हम कहां के लिये आ गये कहां |
हर ओर लाश खून है,उजड़ा  है हर  मकां |
किसने लगादी आग फिर, अम्नोअमान को,
फिर दिख रहा है हर तरफ,उठता हुआ धुआं |
     -०-
रिश्तों के तार तोड़कर,बैठे हुये हैं कयों |
हम नफरतों के दौर,समेटे हुये हैं क्यों |                   $
सांझी विरासतों का, इतिहास भूलकर ,
बारूद के एक ढेर पर बैठे हुये हैं क्यॉ |
     -०-
तन बिक गया बाजार में,थोड़े से धान् में |
बिखरी पड़ी है लाज एक्,सूने मकान  में |
सपना यही था क्या मेरे,आज़ादहिन्द का,                 $
जन्ता का ये भविष्य है,भारत महान में |
     -०-
तुम्हारी रेशमी आहट , तृणों से प्यार है मुझको |
अनक्षत देह परमित के कणों से प्यार है मुझको |
निकट सानिध्य में बीते तुम्हारे साथ जो स्वर्णिम,
रहे सौगात जीवन के , क्षणों से प्यार है मुझको |
         -०-
मंद-मंद मादक-मलयानिल को संग लिए, करता काम-केलिकृत्य,गिरि तक आता है |
शीतल,सहज-शांत,सौन्दर्य को समाए तन, बहु - विधि,बादल, बहार  बन  जाता है |
पानी  नहीं  प्रीत  के  पुनीत  पंख-पांवड़े,पूर्णिमा के पुण्य-पूर्ण, पावन प्रकाश  में -
दूर  कहीं  देर तक, दुन्दुभि  निनाद कर ,प्रेम के प्रसून , प्रेम - पूर्ण  बरसाता है |          
          -0-
अविरल, अनन्त, अवशेष  रह  जाय  यह,
क्रम किस भांति,कौन किसका निभाता है |
पर्यावरण  पूर्ण    पहले    सा,  'राज'  हो,
दायित्व हम आप पर, अब आ जाता ही |
        -0-
हिन्दुत्व पर अपने नहीं जिसको तनिक अभिमान है |
पशु सरीखा, जी रहा,  सब से अधम  इन्सान है |
सोच  रक्खो  ये   हमेशा, श्रेष्ट  थे  हम  श्रेष्ट हैं ,
हिन्दुत्व ही इस विश्व का, सब से बड़ा सम्मान है |
     -०-
    कवि-संगोष्ठी
मिला व्यक्तित्व आकर्षक,गला क्या खूब पाया है |
हिला कर रख दिया सबको,जरा सा गुनगुनाया है |
चहेते बन गये हैं वो,जमाने भर के कुछ दिन में,
भरा हर रंग कविता में, जो सबको खूब भाया है |
           -०-
उसी दिन फिर से मिलते हैं,लिपट कर खूब मिलते हैं |
वो लिखते हैं तो अपने में, सिमट कर खूब लिखते हैं |
वो महफिल में कहीं जाकर, अगर कविता सुना दें तो,
वहां शबनम की बूंदों से,  निखर कर फूल खिलते  हैं |
            -०-
वो सूरज हैं उन्हें दीपक दिखाना, क्या उचित होगा |
वो रह्बर हैं उन्हें राहें  बताना,  क्या उचित होगा |
जहां आकर कई नदियां मिलें,  साहित्य  गंगा से,
वहां सागर से कुछ बूंदें उठाना,  क्या उचित होगा |
            -०-
उन्हें दीपक कहा जाना, सरासर ज्यादती   होगी |
शमा भी उनकी कविता पर,महारत जानती होगी |
वो माइक पर खड़े होकर, हमें कविता   सुनायेंगे,
ये सुन कर आज कविता भी,कहींपर कांपती होगी |
               -०-
परीक्षक मैं अगर होता,तो सौ में सौ तुझे देता |
यहीं पर मैं नहीं रुकता,जरा सा और बढ लेता |
लिखी है जिस तरह कविता,हृदय की रोशनाई से,
अलग से चार सौ नम्बर,तुझे बोनस के दे देता |
           -०-
सतरों में चन्द आपने,क्या-क्या बयां किया |
लफ्जों में हालेदिल को,पिरो कर अयां किया |
चिलमन के साथ बैठ कर,दो लफ्ज क्या कहे,
खुशरगं सा जैसे यहां, मौसम खिला दिया |
           -0-
हे मधु-गंधे मधुबाला सी,
तू सुरभित है सुरबाला सी |
अन्तर तक अगम अगोचर है-
मधु छलकाती मधुशाला सी |
           -0-
सूर्य अस्तांचल चला,पूछा धरा ने ये सवाल |
इस अंधेरे में रखेगा,कौन अब मेरा खयाल |
चुप हैं सब ये देख,नन्हे दीप ने उठकर कहा,
सूर्य जैसा मै बनूंगा, लेके एक नन्हीं मशाल |
         -0-
चली आई मेरे उर में , तुम्हारी  याद  की  डोली |
उठाकर  नैन  उन्मीलित , लरजते प्यार से बोली |
गुजरते हैं कहो कैसे तरसते पल , तो मैं बोला-
हिमालय हो गया तुम बिन निमिष भी काटना भोली |
          -०-

जीने को एक युग न हो, पूरी घड़ी तो है |
सांसों की डोर,वक़्त से जुड़ती लड़ी तो है |
कहते रहें ये लोग के, पाने को कुछ नहीं,
ना हो पहुंच आकाश तक,धरती पड़ी तो है |
         - ० -
जन्मे, पढे, नौकर  हुए,  होकर  रिटायर घर गए,
कुछ दिनों के बाद, रगड़ीं  एड़ियां   और मर गए |
इस मिथक को तोड़,जो भी वक़्त से लड़ कर जिए,
वो समय के शीर्ष-पट पर, नाम अंकित कर गए |
            - 0 -
केवल नारे और बातों से, सद्कर्म नहीं बन पाते हैं |
जो दृढ निश्चय लेकर चलते, पर्वत पर राह बनाते है |
बाधा आए,संकट आए, रुकना उन  को स्वीकार नहीं,
कायर चलते नीचे झुककर,सर सब के वीर झुकाते हैं |
                  - 0 -
 नहीं जानता हूं के मन्ज़िल कहां है |
अभी तो सफ़र का इरादा किया है |
कहीं भी मिले, ढूंढ लूगा मैं तुझ को ,
मन्जिल से अपनी ये वादा किया है |
               - 0 -
सबकी रोटी से उन्हें, हिस्सा बड़ा मिलता रहे |
चाहते हैं लोग रस्मन, सिलसिला चलता रहे |
मेरी कोशिश है यहीं पर,खत्म हो ये सिलसिला,
हर किसी का हक़ उसे, मांगे बिना मिलता रहे |
          - ० -
हर कहीं पर एक घटना घट रही है |
पेड़ की हर एक टहनी कट रही है |
बढ रहे आवास इंसानो के,लेकिन,
बेबस परिंदों की बसावत घट रही है |
          - ० -
आप सब ज़िन्दा रहें,बस इसलिए लिखते है हम |
ज़िन्दगी के वास्ते ही, मरसिए लिखते  हैं  हम  |
बारूद के एक ढेर पर, बैठा हुआ है ये जहां,
मौत से कैसे बचें,  ये सिलसिले लिखते हैं हम |
           - ० -
       

mere chand ashaar


mere chand ashaar

इस शहर के नाम से, जाना है लोगों ने हमें,
अब हमारे नाम से, जानेंगे इसको 'राज' सब |
            - 0 -
दूर से देखें, तो लगता है समन्दर में सुकूं,
पास जाकर देखिए,वो किस कदर बेचैन है |
          -०-
कौन कहता है समन्दर में,सुकूं है, चैन है,                          
देखिए नजदीक जाकर,हद तलक बेचैन है |
          -०-
 कह दिया किसने समन्दर,ज़र्फ से खामोश है ,
देखिये साहिल से वो,मदमस्त है, मदहोश है |
          -o-                                                          
हों इरादे जब अटल तब राह को कया देखना,
जिस तरफ भी चल पड़ेंगे,रास्ते मिल जाएंगे |      $
          -०-
 पर्वतों से हौंसले  लेकर चलेंगे 'राज' हम ,
रास्ता देगा समन्दर,आसमां हिल जाएगा |
           -०-
किस तरह रक्खी गई है बात किस के सामने,
है मुफस्सिर तो जरुरी, है असर हर बात का |
          -0-
दोबाला शान हो जाती,असर कुछ बढ गया होता ,
कहा जो तैश में तुमने,अगर हंस कर कहा होता |
           -०-
फासलों ने भी बढाई हैं  कभी नज़दीकियां,
पर कभी नज़दीकियों से बढ गई हैं दूरियां |
           -0-
फासले भी कर दिया करते हैं दूरी कम कभी,
पर कभी नज़दीकियों से बढ गये हैं फासले  \
          -0-


उल्झनों ने इस  तरह  घेरा दिले-बेताब को,
इतने टुकड़े हो गये,भारत की संसद हो गया |
         -०-
 इस  तरह घेरा हसीनों ने, दिल-ए-नादान को,
इतने ख़ाने हो गये , भारत का नक्शा हो गया |
           -०-
निगाहों  ही निगाहों में , निगाहें   बात कर आईं-
खबर दिल को न लगने दी,अयां सबकुछ किया यारो |
            -0-
सुनाना हाल--- दिल था  बस,बयां आंखों ने कर डाला ,
मुहब्बत के फसाने  में,जुबां   का काम क्या यारो |
           -०-
निगाहों ने निगाहों से फसाने कह दिय सारे,
दिलों की बात कहने को,जुबां कब काम आती है |
           -०-
जो कहना था सभी कुछ कह दिया उनकी निगाहों ने,
बचा क्या है जो कहने को,जुबां अल्फाज़ दोहराये |
           -०-
निगाहो ने निगाहों से कहा जो उनको कहना था,
कहो क्या राज़ की बातें,सरे बाज़ार की जायें |
           -०-
ईद  पर  रस्म  है,मिलते  हैं  गले  सब बढ़कर |
चलो मिलकर गले,इस ईद पर हम दोस्त हो जाएं |
          -०-
वस्ल पर रोक लगा दी है,चलो मान गये |
ईद पर दीद न हो, रस्म भी तोड़ी तुमने |
          -०-
ईद पर उनसे कहा,आओ गले मिल जाओ |
दबा के होंठ ये बोले,मिंयां  मुंह धो आओ |
          -०-


जवानी में क़दम रखते ही,जगमग कर दिया आलम |
जवां भरपूर होकर तुम,ग़ज़ब ढ़ाओगे  क्या  जानम |
          -०-
नहीं है उम्र कम लेकिन,बहुत भोले हैं दिल के वो |
किये ज़िद कल से बैठे हैं,दिखाओ दर्दे दिल हमको |
          -०-
इन्तहा करदी जहां वालों ने,अपने प्यार की तुझ पर |
तभी तो ले गये तुझ को , उठा कर आस्मां  वाले |
               -०-
तुम क्या गये कि साथ सब,खुशियां चली गयीं |
तुम सो गये तो साथ हर,लज़्ज़त भी सो गयी |
               -०-
अभी से आंख में आंसू, ये कैसा ज़र्फ है साक़ी |           $
अभी तो दास्ताने ग़म, शुरू भी की नहीं हमने |
              -०-
बहारों में  हमें  भी याद कर लेना चमन वालो,
बहुत सींचा पसीने से,चमन हमने भी ये बरसों |
              -०-
तरतीब से ख्वाबों की, ये  ज़ीस्त  बनी है,
ये ख्वाब बिखर जाएं तो,फिर मौत भली है |
              -०-
कुछ लोग तो पल भर में,जीते हैं ज़ीस्त पूरी,
कुछ लोग सौ बरस में,पल भर भी नहीं जीते |            $
             -०-
क्या बात है चमन में, फीका  है  रंग सबका,
ग़ुलचीं को कुछ हुआ क्या,सिसके है गुंचा-गुंचा |
              -०-
हो शाख  से अलग तो,रोता है शजर बरसों,
जिस ग़ुल को बहारों में, नाज़ों से संवारा हो |
              -0-


तूफान की धमकी से,कदमों से लिपट जाए ,
ये सच है बाअदब है,बुज़दिल नहीं है'राज' |
           -०-
लिपटी हुई खुश्बू को,गुल से तो हटा पहले,
यादों को मेरे दिल से,फिर अपनी ह्टा लेना |
           -०-
क्युं फंस रहे हो जाल में,मकड़ी के जानकर,
रोओगे सर पकड़ के,किसी दिन मलाल कर |
        -०-
महफिल में यूं रूसवा करे,किसकी मजाल थी,
साज़िश में तेरा हाथ  है,    मालूम था मुझे |
        -०-
मैं हवादिस के थपेड़ों से ये लाया हूं सबक,
जब भी डूबा है सफीना,दोस्त ही हमसाज़ थे |
        -०-
फ़ुरसत किसे है जो करे तौबा जनाब अब|
दो चार साल ज़िन्दगी के रह गये हों जब|
             -०-
फ़ुरसत किसे है जो करे तौबा जनाब अब|
दो चार साल ज़िन्दगी में हों जनाब  जब|
             -0-
तौबा करें और तोड़दें, फ़ितरत नहीं है दोस्त,
ये काम आप पंडित-ओ-मुल्ला पे छोड़ दें |
           -०-
गलती ने एक पल की, बारूद बिछा दी है,
सदियों दिलों में सुलगे वो आग लगा दी है|
          -0-
मुंह खोलने से पहले, सोचो हजार बार,
रिश्ते न पिघल जाएं लफ़्जों की आंच से|
         -0-


आफ़रीं-सद-आफ़रीं है, उम्र के इस दौर पर,
क्या महकते जा रहे हैं,उम्र के हर मोड़ पर |
         - ० -
तल्खिए - हालात  से निकलें, तो फ़िर देखें उधर,
जिन्दगी किस हाल में है, दौर-ए-दुनिया है किधर |
           - ० -
हद तक चलता औलिया, चलता बेहद पीर,
हद,बेहद की वर्जना,  करता   नहीं फकीर |
           - ० -
हादसों  के  दौर  से  निकलें  तो  देखें इस तरफ,
दौरे-दुनिया किस तरफ है,अपना रूख है किस तरफ |
            - ० -
ज़ेरे-बहस हैं आजकल,कुछ बे-वजह के मरहले,
अब ज़रूरी सिलसिलों पर,तबसरे तक बंद हैं |
             - 0 -                      
न खुली है नींद मीठी, आगोश-ए- कब्र जाकर,
एक चैन सा मिला है,इस तंग मकां में आकर |
           - ० -
पत्थर समझ रहे हैं,क्यों दूर से जनाब,
पाएंगे मोम जैसा, आएं तो दो कदम |
         - ० -
हाथ में ले सर कटे  , जो शख्स कल दंगों में था,
आज वो मक़तल पे जाकर,सबका वारिस बन गया |
           - ० -
सिरफिरे शौक-ओ-जुनूं के,ढूंढिए कुछ माइने |
लोग ना-बीना हैं सब, हम बेचते हैं आइने |
       - ० -
तुम्हारे  मुस्कुराने से, खिले हैं सैकड़ों  गुलशन,
चमन में वर्क चमकी है,तुम्हारे खिलखिलाने से |
                - ० -
खुश्क था वो किस क़दर, उम्र का दौरे-अमल,
ढल गई उम्र तो, ग़ज़लों पे जवानी आई |
          - ० -
गर्दिशे-दौरां से खेला, 'राज' इतना सोच कर,
क्या मज़ा जीने का हो जब,काम हर आसान हो |
            - ० -
हौंसले की एक किरन, ज़ालिम पे दुधारी होगी,
मिल गई रात उन्हें, अब भोर  हमारी  होगी |
            - ० -
चल पड़ा हूं जानिबे-मंज़िल,मैं ज़िद ये ठानकर,
जान रहते हर क़दम, इसकी तरफ़ होगा मेरा |
            - ० -
लीक पर चलते हैं सारे, लोग तो हर दौर के,
हौंसलों ने राह को, ढाला है अपने तौर पर |
            - ० -
हो पराजय की कसक तो,फिर विजय मिलती नहीं,
हौंसला रख कर चलें  तो, काम हर आसान है |
            - ० -
अभी  अंगार  उगलेंगे, ये  गूंगे  लोग बस्ती के,
मेरा एक गीत तो इनको,जरा सा गुनगुनाने दो |
            - ० -
निगाहों ने निगाहों से सभी कुछ कह दिया मिलकर,
किया करते हैं यूं कुछ लोग, सबके सामने बातें |            
            - ० -
 


रसपूर्ण न हो काव्य,मगर सादगी तो है |
लालित्य से विहीन है,पर ताजगी तो है |
आए पसंद आपको,करतल ध्वनि करें,-
कविवर नहीं है'राज'मगर आदमी तो है |
     -०-
जीने को एक युग न हो,पूरी घड़ी तो है |
ना हो गगन नसीब में,धरती पड़ी तो है |
कहने को लोग कुछ कहें इसका है गम किसे,
नाचीज होगा 'राज' , मगर आदमी तो है |
    -०-
किसी के शेर ले आना,मुनासिब सा नहीं लगता |
किसी के गीत गा लेना,मुनासिब सा नहीं लगता |
अगर है पास कुछ अपने,दिखादो वह जमाने को,
किसीसे कुछ छिपालेना,मुनासिब सा नहीं लगता |
          -०-
मेरे मासूम से बच्चे,गज़ब क्या कर दिया तुमने |
सजाकर एक अच्छा सा,गुलिस्तां धर दिया तुमने |
अजब सा खेल खेला है,अजब जादूगरी की है -,
सरल कविता में प्राणों को,गले से भरदिया तुमने |
         -०-
अभी दिखता है अपनापन,हमें कविता से रिश्ते में |
झलकता है अजब , उन्माद जैसा इन बहिश्तों में |
नये कवि आज जैसे छू रहे हैं सूर्य को जाकर -,          $
बहुत सम्भावनाएं दिख रही  हैं,  इन फरिश्तों में |

कठिन पान्डित्यप्रदर्शन,नहीं है बालकविता में |
अहम् के सर्प का दंशन,नहीं है बालकविता में |
ये सपनों का समर्पण है,जो भोली आंख ने देखे,
किसी कविदर्प का दर्शन्,नहीं है बालकविता में |          $
         -०-
जहां तक हम नहीं पहुंचे,वहां तक ये पहुंचते हैं |
हमारे दिल के दर्दों से,नयन  इनके छलकते हैं |
हम अपने स्वार्थ कविता मे,न चाहे डाल देते हैं,           $
ये कविता में अचेतन सी,महक बनकर महकते हैं |
            -०-
अलंकारिक नहीं भाषा,न भावों का पुलिन्दा है |
प्रशंसा से परे हैं ये,न इनमें कोई  निन्दा  है |            $
सरल भाषा में ये दिलपर,लिखा करते हैं भावों को,
ये पिंजरे में नहीं पलता,खुले नभ का परिन्दा है |
           -०-
है निर्मल गंध सी इनमे,जो शब्दों में महकती है |
है भावों की विरल गंगा,जो छन्दों मे छलकती है |
सरलता,सौम्यता का ये,अनूठा एक संगम   है-,            $
मगर कविता में छुप कर एक चिंगारी दहकती है |
          -०-          
ये नन्हे कवि कहां से खींच कर,यह इत्र लाते हैं |
अनोखी कल्पना,भावों की सरगम मित्र  लाते हैं |
ये अनगढ हैं मगर इनमें,बहुत प्रतिभा झलकती है,        $
ये शब्दों से रचे अपने,विरल से चित्र   लाते हैं |
         -०-
कहां की बात को लाकर,कहां पर रख दिया तुमने |
यहां पर शब्द का दरिया,बहा कर रख दिया तुमने |
बड़े आसान शब्दों में,इबारत दिल पे लिख दी है,
कहां से भाव लाए हो,हिला कर रख दिया  तुमने |
           -०-
ये नन्हे तीर कविता के,दिलों पर वार करते हैं |
युगों की वर्जनाओं का,सरल    संहार करते हैं |
न इनपर शब्द ज्यादा हैं, न छंदों की बड़ी गठरी,             $
ये भावों से सरल कविता, सरस तैयार करते हैं |
            -०-
दूर क्षितिज पर चमक रहा है, नन्हा एक सितारा |
जगमग-जगमग जग करने को,लगा रहा बल सारा |
अंधियारे की फौज दौड़ कर, करती उसे विवश पर,
नहीं हार से डरता अविचल, बांट रहा उजियारा |
           - ० -
ये नन्हे दीप,नन्ही ज्योति लेकर जगमगाते हैं |
धरा को रोशनी देकर, मगन हो मुस्कुराते हैं |
हजारों मुश्किलें इनको,  डराना चाहतीं हैं पर ,
अडिग नन्हीचमक लेकर,प्रकाशितपथ बनाते हैं |
       - ० -    
लिए हाथ में नन्हा दीपक,  चलते  रहे  सलोने |
नहीं चाहिए इन बच्चों को,  ढेरों - ढेर खिलौने |
नन्हे कर से भारत की,लिखते हैं तकदीर आज ये,
सिंह सरीखे तम से लड़कर,जीत रहे है मृग के छौने |
              - ० -
पुरानी लीक पर  चलना, कभी  हमको  नहीं  भाया |
विगत गुणगान से कुछ भी,किसी को मिल नहीं पाया |
नये पथ हम  तलाशेंगे,शिखर की ओर जाने के -,            $
रखे हाथों को हाथों पर ,कभी कुछ  मिल नहीं  पाया |
           -०-
उठो उठ कर तलाशें हम,नई सम्भावनाओं  को |
करें जी तोड़कर हम अब,नई नित साधनाओं को |
सरलजीवन,सघनवैभव,अधिक आराम तलबी भी,             $
हटाकर अपने जीवन से,मिटा दें वासनाओं   को |
           -०-
हमारे दिल में पुरखों का,अभी भी ख्वाब बाकी है |
इसी से आंख में अपनी, हया की  आब बाकी है |
मुहब्बत उठ गई शहरों से लेकिन गांव में अब भी,         $
पुरानी रस्म जिन्दा है,अदब-आदाब   बाकी  है |
             -०-
उदर में आसमानों से, सहेजा बन्द अबरों को |
उतर गहराई में दिल की,कुरेदा कुन्द ज़बरों को|
प्रसवपीड़ा सही जो"राज",उसकी टीस सह-सह कर,         $
निचोड़ा दर्द दिल का तो,रचा है चन्द सतरों को |
            -०-
रहें बैठे निठल्ले  भी समय  तो  बीत जायेगा |
मगर जीने की इच्छा का घड़ा सब रीत जायेगा |
मैं बूढा हूं नहीं कुछ हो नही सकता न सोचें ये,
करें कुछ काम जनहित का,बड़ा आनन्द आयेगा |
          -०-
हजारों काम हैं  ऐसे जिन्हें  हम  खुद बना लेंगे |
किसी की जिन्दगी में हम खुशी के पल बढा देंगे |
उठो उठ कर संवारो जिन्दगी के पल जवानों से,-
उन्हें यह गर्व करने दो,कि हम दुनिया सजा देंगे |
          -०-
बिखर जाएं तो पल भर में,मिटा लें अपनी हस्ती को |
संवारें कुछ दिनों में तो, संवारें   एक     बस्ती को |
हमारे पास क्या कम है, झिझकते हम रहें क्युंकर,-
रहे हैं मस्त जब अब तक, जियेंगे  मौज-मस्ती  को |
          -०-
जब आए तो ऊसर था,बसाया है बहारों को |
पसीने से इसे सींचा, तो लाए सुखकी धारों को |
नहीं सोचा अगर होता,नई नस्लों के बारे में,-
तो कैसे झेल पाते हम,विकट तूफां हजारों को |
          -०-
यहां क्या था,हमारी नस्ल केवल जानती है |
हमारी शौर्य शक्ति को, ये धरती  मानती है |
यहां बाहों की ताकत से रहे हैं दोस्त हम जिन्दा,
हमारी बांह की ताकत, धरा पहचानती है |                $
          -०-
मिलेंगे फिर कभी तुमसे,दिलों मे आस रखते हैं |
करेंगे फिर कभी स्वागत,ये इच्छा खास रखते हैं |
खुशी से कर रहे हैं हम,विदा इन नौजवानों को,-
रहेंगे नौजवां सौ तक, यही विश्वास   करते  हैं |         $
           -०-
जो आया है उसे तो एक दिन जाना जरुरी है |
मगर हर रस्म दुनिया की, निभाना भी जरुरी है |
जिएंगे जब तलक,जिन्दादिली का पास रक्खेंगे,
भरम कुछ साथ में रख्नना,दिखाना भी जरूरी है |           $
            -०-
       चन्द रुबाइयां
चली आई बड़े तड़के,   मेरे घर  पर लिए डोली |
हमारे कान में'अब उठ'किरण कुछ् इस तरह बोली |
मिलन की रात बीती है,मिलन क्षण शेष हैं मन में,
अभी क्यों दे रही दस्तक,अभी आराम  कर भोली |
             -०-
तुम्हारी रेशमी आहट, मेरे  जब   पास आती है |
मिलन की कामनाओं का,मधुर अहसास लाती है |
मुझे अमराइयों के झुटपुटे क्षण याद  आते   हैं,
सितारों से भरा आंगन,मिलन की आस लाती है |
             -०-
तुम्हारी देह    का दर्पण , मेरा  श्रंगार  करता है |          $
छिपी मन में    अगर पीड़ा,त्वरित संहार करता है |
मिलन सौ    बार होता है,अगर तुमसे अकेले में,
मिलें कुछ और क्षण मुझको,हृदय हर बार करता है |
             -०-
मिलन की प्यास बुझ जाये, कहें ये देह के धागे |
यही  क्षण चक्षु ने चाहा,  यही मन गेह ने चाहे |
रहो सानिध्य में हरदम , यही है कामना प्रियतम,
तुम्हारे साथ क्यों बांधे,  ये हमने स्नेह के धागे |
             -०-
मलय  सा   हो गया हल्का, क्षितिज के पार चलता   हूं |
छिड़क कर कामना सारी,  तुम्हारे नेह से बाहर निकलता हूं |
सृजन नव कर दिया हमने , नवल संसार  का   प्रियतम ,
धरोहर रूप में अर्पण, क्षणिक लम्हों का ये अंबार करता हूं |
              -०-
मातृभाषा पर जिसे,अपनी न स्वाभिमान है |
राष्ट्रभाषा के प्रति, रखता नहीं अधिमान  है |
पूर्ण पशुवत है जिसे,ना शीर्ष पर हो राष्ट्रप्रेम,
सम्पदामय हो,अकिंचन का सही प्रतिमान है |
        -०-
उठो उठकर तलाशें  हम, नई  सम्भावनाओं को |
करें हिन्दी की अब सेवा,करें नव- साधनाओं को,
सरल जीवन,सघन मेहनत,यही चाहा है हिन्दी ने,
हटाकर अपने जीवन से,मिटा दें धारणाओं  को |
        -०-
हमारे दिल में हिन्दी का,अभी भी ख्वाब बाकी है |
इसी से दिल की धड़कन में,दिलेबेताब  बाकी  है |
शहर से उठ गई हिन्दी,हमारे गांव में    लेकिन,
धड़कती है दिलों मे वो,सरो-शादाब    बाकी  है |
        -०-
मैं हिन्दी हूं,मै हिन्दी था,रहूंगा मैं सदा  हिन्दी |
है हिन्दी ही कथा मेरी,रही हमदम सदा  हिन्दी |
नहीं हूं वर्णसंकर मैं,जो बोलूंगा  अलग  भाषा,
मैं भारत मां का बेटा हूं,मैं बोलूंगा सदा हिन्दी  |
        -०-
करेगी देश को जगमग,मुझे विश्वास विश्वास हिन्दी का |
है उत्सव के लिये निशचित,सितम्बर मास हिन्दी का |
हर एक चौद्ह सितम्बर को,मनाते हैं हम 'हिन्दी डे'-
इसी दिन हम किया करते हैं,तर्पण खास हिन्दी  का |
        -०-
मनाते इस तरह से हम, अजब त्योहार हिन्दी   का |
इकट्ठे हो लिये, मातम मना, हर बार  हिन्दी  का |
बना कर एक खबर भेजी जहां छपता  है   रोजाना-,
फिर अगले दिन पढ़ा करते हैं हम,अखबार हिन्दी का |
        -०-
गवइयों की सजी महफिल,गवइये सुर लगाते हैं |
कुछ अपने खूबसूरत मुख,अदाएं कर दिखाते  हैं |
हमारे पास क्या,सूखे शजर में फूल खिलते क्या ?,         $
लो हम भी आपके सम्मुख,मटककर हिनहिनाते हैं |
          -०-
कवि को धैर्य से सुनना, अजब है  बेबसी यारो |
यहां हमको बुलाया है, ये इनकी  बेबसी  यारो |
चलो इस हाथ खुशियां लें,तुम्हें देते हैं गम भारी,            $
सुनो इतने तो हमको भी,समझलो बेबसी  यारो |
          -०-
तू श्वानों की तरह से भोंकता और वार करता है |
वतन को बेच खाने के नियम तैयार  करता  है |
विदेशी बैंक में जाकर तू रखता है कमाई   को,
लड़ा कर धर्म-जाति पर,वतन बरबाद करता  है |
          -०-
अरे शिशुपाल सा बरताब करना छोड़ दे अब तो |
बिदकना,भोंकना,बकवास करना छोड़ दे अब तो |
तुझे हम माफ कर देंगे,अगर सत्ता की खातिर तू,
वतन का बेचना,व्यापार करना छोड़ दे अब  तो |
         -०-
ये श्वानों सा रुदन तू झींक कर हर बार करता है |
हमारी राष्ट्र्-भक्ति पर,तू हरदम   वार करता  है |
अरे सत्ताके भंवरे सुन, न  आतंकी  हमें   कहना,
यहां का मूल हर ब्च्चा,वतन को प्यार करता है |
              -०-
उलझना मत कभी हमसे,अगर ली हमने अंगड़ाई |
वहीं पर ड़ाल देंगे हम ,  जहां बिकती है चतुराई |
हम आंधी हैं तेरी कीलों से हम रुक नहीं सकते ,
जो दृष्टि वक्र की हमने, न मिल पायेगी परछांई |
               -०-
बड़प्पन है हमारा ये,कि हम चुपचाप रहते  हैं  |
तू हमको गालियां देता है,हम सन्ताप सहते हैं  |
मगर सत्ता के लोलुप सुन,अति का अंत होता है,
सहेंगे अब नहीं कुछ भी, ये तुझसे साफ कह्ते है |

यूं तो कहने को वतन में,अब सवेरा हो गया |
नफरतों का हरतरफ, लेकिन अंधेरा हो गया |
देश के रक्षक का हमने,जिसको बख्शा था खिताब,
बदनसीबी"राज"अपनी,  वो लुटेरा हो गया |
       -०-
उन्नत ललाट पर चमक रही,भारत माता की बिन्दी है |
है ब्रह्मपुत्र सम हिमनद यह,सतलुज,सरयू,कालिन्दी है |          $
जो आकर मिला पवित्र हुआ,है पतित-पावनी मां जैसी,
वर्तनी सरल,  भाषा  सीधी, निर्मल गंगा सम हिन्दी है |
      -०-
अब नही आतंक से डर,शेष तक ना वेदना है |
चक्षु लाखों अब सजग हैं, वार तेरा देखना है |               $
देश में ही रह रहे,  विश्वासघाती  वार कर -,
जाग कर बैठा है हिन्दू,मुस्लिमों में चेतना है |
      -०-
निकले थे हम कहां के लिये आ गये कहां |
हर ओर लाश खून है,उजड़ा  है हर  मकां |
किसने लगादी आग फिर, अम्नोअमान को,
फिर दिख रहा है हर तरफ,उठता हुआ धुआं |
     -०-
रिश्तों के तार तोड़कर,बैठे हुये हैं कयों |
हम नफरतों के दौर,समेटे हुये हैं क्यों |                   $
सांझी विरासतों का, इतिहास भूलकर ,
बारूद के एक ढेर पर बैठे हुये हैं क्यॉ |
     -०-
तन बिक गया बाजार में,थोड़े से धान् में |
बिखरी पड़ी है लाज एक्,सूने मकान  में |
सपना यही था क्या मेरे,आज़ादहिन्द का,                 $
जन्ता का ये भविष्य है,भारत महान में |
     -०-
तुम्हारी रेशमी आहट , तृणों से प्यार है मुझको |
अनक्षत देह परमित के कणों से प्यार है मुझको |
निकट सानिध्य में बीते तुम्हारे साथ जो स्वर्णिम,
रहे सौगात जीवन के , क्षणों से प्यार है मुझको |
         -०-
मंद-मंद मादक-मलयानिल को संग लिए, करता काम-केलिकृत्य,गिरि तक आता है |
शीतल,सहज-शांत,सौन्दर्य को समाए तन, बहु - विधि,बादल, बहार  बन  जाता है |
पानी  नहीं  प्रीत  के  पुनीत  पंख-पांवड़े,पूर्णिमा के पुण्य-पूर्ण, पावन प्रकाश  में -
दूर  कहीं  देर तक, दुन्दुभि  निनाद कर ,प्रेम के प्रसून , प्रेम - पूर्ण  बरसाता है |          
          -0-
अविरल, अनन्त, अवशेष  रह  जाय  यह,
क्रम किस भांति,कौन किसका निभाता है |
पर्यावरण  पूर्ण    पहले    सा,  'राज'  हो,
दायित्व हम आप पर, अब आ जाता ही |
        -0-
हिन्दुत्व पर अपने नहीं जिसको तनिक अभिमान है |
पशु सरीखा, जी रहा,  सब से अधम  इन्सान है |
सोच  रक्खो  ये   हमेशा, श्रेष्ट  थे  हम  श्रेष्ट हैं ,
हिन्दुत्व ही इस विश्व का, सब से बड़ा सम्मान है |
     -०-
    कवि-संगोष्ठी
मिला व्यक्तित्व आकर्षक,गला क्या खूब पाया है |
हिला कर रख दिया सबको,जरा सा गुनगुनाया है |
चहेते बन गये हैं वो,जमाने भर के कुछ दिन में,
भरा हर रंग कविता में, जो सबको खूब भाया है |
           -०-
उसी दिन फिर से मिलते हैं,लिपट कर खूब मिलते हैं |
वो लिखते हैं तो अपने में, सिमट कर खूब लिखते हैं |
वो महफिल में कहीं जाकर, अगर कविता सुना दें तो,
वहां शबनम की बूंदों से,  निखर कर फूल खिलते  हैं |
            -०-
वो सूरज हैं उन्हें दीपक दिखाना, क्या उचित होगा |
वो रह्बर हैं उन्हें राहें  बताना,  क्या उचित होगा |
जहां आकर कई नदियां मिलें,  साहित्य  गंगा से,
वहां सागर से कुछ बूंदें उठाना,  क्या उचित होगा |
            -०-
उन्हें दीपक कहा जाना, सरासर ज्यादती   होगी |
शमा भी उनकी कविता पर,महारत जानती होगी |
वो माइक पर खड़े होकर, हमें कविता   सुनायेंगे,
ये सुन कर आज कविता भी,कहींपर कांपती होगी |
               -०-
परीक्षक मैं अगर होता,तो सौ में सौ तुझे देता |
यहीं पर मैं नहीं रुकता,जरा सा और बढ लेता |
लिखी है जिस तरह कविता,हृदय की रोशनाई से,
अलग से चार सौ नम्बर,तुझे बोनस के दे देता |
           -०-
सतरों में चन्द आपने,क्या-क्या बयां किया |
लफ्जों में हालेदिल को,पिरो कर अयां किया |
चिलमन के साथ बैठ कर,दो लफ्ज क्या कहे,
खुशरगं सा जैसे यहां, मौसम खिला दिया |
           -0-
हे मधु-गंधे मधुबाला सी,
तू सुरभित है सुरबाला सी |
अन्तर तक अगम अगोचर है-
मधु छलकाती मधुशाला सी |
           -0-
सूर्य अस्तांचल चला,पूछा धरा ने ये सवाल |
इस अंधेरे में रखेगा,कौन अब मेरा खयाल |
चुप हैं सब ये देख,नन्हे दीप ने उठकर कहा,
सूर्य जैसा मै बनूंगा, लेके एक नन्हीं मशाल |
         -0-
चली आई मेरे उर में , तुम्हारी  याद  की  डोली |
उठाकर  नैन  उन्मीलित , लरजते प्यार से बोली |
गुजरते हैं कहो कैसे तरसते पल , तो मैं बोला-
हिमालय हो गया तुम बिन निमिष भी काटना भोली |
          -०-

जीने को एक युग न हो, पूरी घड़ी तो है |
सांसों की डोर,वक़्त से जुड़ती लड़ी तो है |
कहते रहें ये लोग के, पाने को कुछ नहीं,
ना हो पहुंच आकाश तक,धरती पड़ी तो है |
         - ० -
जन्मे, पढे, नौकर  हुए,  होकर  रिटायर घर गए,
कुछ दिनों के बाद, रगड़ीं  एड़ियां   और मर गए |
इस मिथक को तोड़,जो भी वक़्त से लड़ कर जिए,
वो समय के शीर्ष-पट पर, नाम अंकित कर गए |
            - 0 -
केवल नारे और बातों से, सद्कर्म नहीं बन पाते हैं |
जो दृढ निश्चय लेकर चलते, पर्वत पर राह बनाते है |
बाधा आए,संकट आए, रुकना उन  को स्वीकार नहीं,
कायर चलते नीचे झुककर,सर सब के वीर झुकाते हैं |
                  - 0 -
 नहीं जानता हूं के मन्ज़िल कहां है |
अभी तो सफ़र का इरादा किया है |
कहीं भी मिले, ढूंढ लूगा मैं तुझ को ,
मन्जिल से अपनी ये वादा किया है |
               - 0 -
सबकी रोटी से उन्हें, हिस्सा बड़ा मिलता रहे |
चाहते हैं लोग रस्मन, सिलसिला चलता रहे |
मेरी कोशिश है यहीं पर,खत्म हो ये सिलसिला,
हर किसी का हक़ उसे, मांगे बिना मिलता रहे |
          - ० -
हर कहीं पर एक घटना घट रही है |
पेड़ की हर एक टहनी कट रही है |
बढ रहे आवास इंसानो के,लेकिन,
बेबस परिंदों की बसावत घट रही है |
          - ० -
आप सब ज़िन्दा रहें,बस इसलिए लिखते है हम |
ज़िन्दगी के वास्ते ही, मरसिए लिखते  हैं  हम  |
बारूद के एक ढेर पर, बैठा हुआ है ये जहां,
मौत से कैसे बचें,  ये सिलसिले लिखते हैं हम |
           - ० -
       

mere chand ashaar



         
       

mere chand ashaar



mere chand ashaar


mere chand ashaar

इस शहर के नाम से, जाना है लोगों ने हमें,
अब हमारे नाम से, जानेंगे इसको 'राज' सब |
            - 0 -
दूर से देखें, तो लगता है समन्दर में सुकूं,
पास जाकर देखिए,वो किस कदर बेचैन है |
          -०-
कौन कहता है समन्दर में,सुकूं है, चैन है,                          
देखिए नजदीक जाकर,हद तलक बेचैन है |
          -०-
 कह दिया किसने समन्दर,ज़र्फ से खामोश है ,
देखिये साहिल से वो,मदमस्त है, मदहोश है |
          -o-                                                          
हों इरादे जब अटल तब राह को कया देखना,
जिस तरफ भी चल पड़ेंगे,रास्ते मिल जाएंगे |      $
          -०-
 पर्वतों से हौंसले  लेकर चलेंगे 'राज' हम ,
रास्ता देगा समन्दर,आसमां हिल जाएगा |
           -०-
किस तरह रक्खी गई है बात किस के सामने,
है मुफस्सिर तो जरुरी, है असर हर बात का |
          -0-
दोबाला शान हो जाती,असर कुछ बढ गया होता ,
कहा जो तैश में तुमने,अगर हंस कर कहा होता |
           -०-
फासलों ने भी बढाई हैं  कभी नज़दीकियां,
पर कभी नज़दीकियों से बढ गई हैं दूरियां |
           -0-
फासले भी कर दिया करते हैं दूरी कम कभी,
पर कभी नज़दीकियों से बढ गये हैं फासले  \
          -0-


उल्झनों ने इस  तरह  घेरा दिले-बेताब को,
इतने टुकड़े हो गये,भारत की संसद हो गया |
         -०-
 इस  तरह घेरा हसीनों ने, दिल-ए-नादान को,
इतने ख़ाने हो गये , भारत का नक्शा हो गया |
           -०-
निगाहों  ही निगाहों में , निगाहें   बात कर आईं-
खबर दिल को न लगने दी,अयां सबकुछ किया यारो |
            -0-
सुनाना हाल--- दिल था  बस,बयां आंखों ने कर डाला ,
मुहब्बत के फसाने  में,जुबां   का काम क्या यारो |
           -०-
निगाहों ने निगाहों से फसाने कह दिय सारे,
दिलों की बात कहने को,जुबां कब काम आती है |
           -०-
जो कहना था सभी कुछ कह दिया उनकी निगाहों ने,
बचा क्या है जो कहने को,जुबां अल्फाज़ दोहराये |
           -०-
निगाहो ने निगाहों से कहा जो उनको कहना था,
कहो क्या राज़ की बातें,सरे बाज़ार की जायें |
           -०-
ईद  पर  रस्म  है,मिलते  हैं  गले  सब बढ़कर |
चलो मिलकर गले,इस ईद पर हम दोस्त हो जाएं |
          -०-
वस्ल पर रोक लगा दी है,चलो मान गये |
ईद पर दीद न हो, रस्म भी तोड़ी तुमने |
          -०-
ईद पर उनसे कहा,आओ गले मिल जाओ |
दबा के होंठ ये बोले,मिंयां  मुंह धो आओ |
          -०-


जवानी में क़दम रखते ही,जगमग कर दिया आलम |
जवां भरपूर होकर तुम,ग़ज़ब ढ़ाओगे  क्या  जानम |
          -०-
नहीं है उम्र कम लेकिन,बहुत भोले हैं दिल के वो |
किये ज़िद कल से बैठे हैं,दिखाओ दर्दे दिल हमको |
          -०-
इन्तहा करदी जहां वालों ने,अपने प्यार की तुझ पर |
तभी तो ले गये तुझ को , उठा कर आस्मां  वाले |
               -०-
तुम क्या गये कि साथ सब,खुशियां चली गयीं |
तुम सो गये तो साथ हर,लज़्ज़त भी सो गयी |
               -०-
अभी से आंख में आंसू, ये कैसा ज़र्फ है साक़ी |           $
अभी तो दास्ताने ग़म, शुरू भी की नहीं हमने |
              -०-
बहारों में  हमें  भी याद कर लेना चमन वालो,
बहुत सींचा पसीने से,चमन हमने भी ये बरसों |
              -०-
तरतीब से ख्वाबों की, ये  ज़ीस्त  बनी है,
ये ख्वाब बिखर जाएं तो,फिर मौत भली है |
              -०-
कुछ लोग तो पल भर में,जीते हैं ज़ीस्त पूरी,
कुछ लोग सौ बरस में,पल भर भी नहीं जीते |            $
             -०-
क्या बात है चमन में, फीका  है  रंग सबका,
ग़ुलचीं को कुछ हुआ क्या,सिसके है गुंचा-गुंचा |
              -०-
हो शाख  से अलग तो,रोता है शजर बरसों,
जिस ग़ुल को बहारों में, नाज़ों से संवारा हो |
              -0-


तूफान की धमकी से,कदमों से लिपट जाए ,
ये सच है बाअदब है,बुज़दिल नहीं है'राज' |
           -०-
लिपटी हुई खुश्बू को,गुल से तो हटा पहले,
यादों को मेरे दिल से,फिर अपनी ह्टा लेना |
           -०-
क्युं फंस रहे हो जाल में,मकड़ी के जानकर,
रोओगे सर पकड़ के,किसी दिन मलाल कर |
        -०-
महफिल में यूं रूसवा करे,किसकी मजाल थी,
साज़िश में तेरा हाथ  है,    मालूम था मुझे |
        -०-
मैं हवादिस के थपेड़ों से ये लाया हूं सबक,
जब भी डूबा है सफीना,दोस्त ही हमसाज़ थे |
        -०-
फ़ुरसत किसे है जो करे तौबा जनाब अब|
दो चार साल ज़िन्दगी के रह गये हों जब|
             -०-
फ़ुरसत किसे है जो करे तौबा जनाब अब|
दो चार साल ज़िन्दगी में हों जनाब  जब|
             -0-
तौबा करें और तोड़दें, फ़ितरत नहीं है दोस्त,
ये काम आप पंडित-ओ-मुल्ला पे छोड़ दें |
           -०-
गलती ने एक पल की, बारूद बिछा दी है,
सदियों दिलों में सुलगे वो आग लगा दी है|
          -0-
मुंह खोलने से पहले, सोचो हजार बार,
रिश्ते न पिघल जाएं लफ़्जों की आंच से|
         -0-


आफ़रीं-सद-आफ़रीं है, उम्र के इस दौर पर,
क्या महकते जा रहे हैं,उम्र के हर मोड़ पर |
         - ० -
तल्खिए - हालात  से निकलें, तो फ़िर देखें उधर,
जिन्दगी किस हाल में है, दौर-ए-दुनिया है किधर |
           - ० -
हद तक चलता औलिया, चलता बेहद पीर,
हद,बेहद की वर्जना,  करता   नहीं फकीर |
           - ० -
हादसों  के  दौर  से  निकलें  तो  देखें इस तरफ,
दौरे-दुनिया किस तरफ है,अपना रूख है किस तरफ |
            - ० -
ज़ेरे-बहस हैं आजकल,कुछ बे-वजह के मरहले,
अब ज़रूरी सिलसिलों पर,तबसरे तक बंद हैं |
             - 0 -                      
न खुली है नींद मीठी, आगोश-ए- कब्र जाकर,
एक चैन सा मिला है,इस तंग मकां में आकर |
           - ० -
पत्थर समझ रहे हैं,क्यों दूर से जनाब,
पाएंगे मोम जैसा, आएं तो दो कदम |
         - ० -
हाथ में ले सर कटे  , जो शख्स कल दंगों में था,
आज वो मक़तल पे जाकर,सबका वारिस बन गया |
           - ० -
सिरफिरे शौक-ओ-जुनूं के,ढूंढिए कुछ माइने |
लोग ना-बीना हैं सब, हम बेचते हैं आइने |
       - ० -
तुम्हारे  मुस्कुराने से, खिले हैं सैकड़ों  गुलशन,
चमन में वर्क चमकी है,तुम्हारे खिलखिलाने से |
                - ० -
खुश्क था वो किस क़दर, उम्र का दौरे-अमल,
ढल गई उम्र तो, ग़ज़लों पे जवानी आई |
          - ० -
गर्दिशे-दौरां से खेला, 'राज' इतना सोच कर,
क्या मज़ा जीने का हो जब,काम हर आसान हो |
            - ० -
हौंसले की एक किरन, ज़ालिम पे दुधारी होगी,
मिल गई रात उन्हें, अब भोर  हमारी  होगी |
            - ० -
चल पड़ा हूं जानिबे-मंज़िल,मैं ज़िद ये ठानकर,
जान रहते हर क़दम, इसकी तरफ़ होगा मेरा |
            - ० -
लीक पर चलते हैं सारे, लोग तो हर दौर के,
हौंसलों ने राह को, ढाला है अपने तौर पर |
            - ० -
हो पराजय की कसक तो,फिर विजय मिलती नहीं,
हौंसला रख कर चलें  तो, काम हर आसान है |
            - ० -
अभी  अंगार  उगलेंगे, ये  गूंगे  लोग बस्ती के,
मेरा एक गीत तो इनको,जरा सा गुनगुनाने दो |
            - ० -
निगाहों ने निगाहों से सभी कुछ कह दिया मिलकर,
किया करते हैं यूं कुछ लोग, सबके सामने बातें |            
            - ० -
 


रसपूर्ण न हो काव्य,मगर सादगी तो है |
लालित्य से विहीन है,पर ताजगी तो है |
आए पसंद आपको,करतल ध्वनि करें,-
कविवर नहीं है'राज'मगर आदमी तो है |
     -०-
जीने को एक युग न हो,पूरी घड़ी तो है |
ना हो गगन नसीब में,धरती पड़ी तो है |
कहने को लोग कुछ कहें इसका है गम किसे,
नाचीज होगा 'राज' , मगर आदमी तो है |
    -०-
किसी के शेर ले आना,मुनासिब सा नहीं लगता |
किसी के गीत गा लेना,मुनासिब सा नहीं लगता |
अगर है पास कुछ अपने,दिखादो वह जमाने को,
किसीसे कुछ छिपालेना,मुनासिब सा नहीं लगता |
          -०-
मेरे मासूम से बच्चे,गज़ब क्या कर दिया तुमने |
सजाकर एक अच्छा सा,गुलिस्तां धर दिया तुमने |
अजब सा खेल खेला है,अजब जादूगरी की है -,
सरल कविता में प्राणों को,गले से भरदिया तुमने |
         -०-
अभी दिखता है अपनापन,हमें कविता से रिश्ते में |
झलकता है अजब , उन्माद जैसा इन बहिश्तों में |
नये कवि आज जैसे छू रहे हैं सूर्य को जाकर -,          $
बहुत सम्भावनाएं दिख रही  हैं,  इन फरिश्तों में |

कठिन पान्डित्यप्रदर्शन,नहीं है बालकविता में |
अहम् के सर्प का दंशन,नहीं है बालकविता में |
ये सपनों का समर्पण है,जो भोली आंख ने देखे,
किसी कविदर्प का दर्शन्,नहीं है बालकविता में |          $
         -०-
जहां तक हम नहीं पहुंचे,वहां तक ये पहुंचते हैं |
हमारे दिल के दर्दों से,नयन  इनके छलकते हैं |
हम अपने स्वार्थ कविता मे,न चाहे डाल देते हैं,           $
ये कविता में अचेतन सी,महक बनकर महकते हैं |
            -०-
अलंकारिक नहीं भाषा,न भावों का पुलिन्दा है |
प्रशंसा से परे हैं ये,न इनमें कोई  निन्दा  है |            $
सरल भाषा में ये दिलपर,लिखा करते हैं भावों को,
ये पिंजरे में नहीं पलता,खुले नभ का परिन्दा है |
           -०-
है निर्मल गंध सी इनमे,जो शब्दों में महकती है |
है भावों की विरल गंगा,जो छन्दों मे छलकती है |
सरलता,सौम्यता का ये,अनूठा एक संगम   है-,            $
मगर कविता में छुप कर एक चिंगारी दहकती है |
          -०-          
ये नन्हे कवि कहां से खींच कर,यह इत्र लाते हैं |
अनोखी कल्पना,भावों की सरगम मित्र  लाते हैं |
ये अनगढ हैं मगर इनमें,बहुत प्रतिभा झलकती है,        $
ये शब्दों से रचे अपने,विरल से चित्र   लाते हैं |
         -०-
कहां की बात को लाकर,कहां पर रख दिया तुमने |
यहां पर शब्द का दरिया,बहा कर रख दिया तुमने |
बड़े आसान शब्दों में,इबारत दिल पे लिख दी है,
कहां से भाव लाए हो,हिला कर रख दिया  तुमने |
           -०-
ये नन्हे तीर कविता के,दिलों पर वार करते हैं |
युगों की वर्जनाओं का,सरल    संहार करते हैं |
न इनपर शब्द ज्यादा हैं, न छंदों की बड़ी गठरी,             $
ये भावों से सरल कविता, सरस तैयार करते हैं |
            -०-
दूर क्षितिज पर चमक रहा है, नन्हा एक सितारा |
जगमग-जगमग जग करने को,लगा रहा बल सारा |
अंधियारे की फौज दौड़ कर, करती उसे विवश पर,
नहीं हार से डरता अविचल, बांट रहा उजियारा |
           - ० -
ये नन्हे दीप,नन्ही ज्योति लेकर जगमगाते हैं |
धरा को रोशनी देकर, मगन हो मुस्कुराते हैं |
हजारों मुश्किलें इनको,  डराना चाहतीं हैं पर ,
अडिग नन्हीचमक लेकर,प्रकाशितपथ बनाते हैं |
       - ० -    
लिए हाथ में नन्हा दीपक,  चलते  रहे  सलोने |
नहीं चाहिए इन बच्चों को,  ढेरों - ढेर खिलौने |
नन्हे कर से भारत की,लिखते हैं तकदीर आज ये,
सिंह सरीखे तम से लड़कर,जीत रहे है मृग के छौने |
              - ० -
पुरानी लीक पर  चलना, कभी  हमको  नहीं  भाया |
विगत गुणगान से कुछ भी,किसी को मिल नहीं पाया |
नये पथ हम  तलाशेंगे,शिखर की ओर जाने के -,            $
रखे हाथों को हाथों पर ,कभी कुछ  मिल नहीं  पाया |
           -०-
उठो उठ कर तलाशें हम,नई सम्भावनाओं  को |
करें जी तोड़कर हम अब,नई नित साधनाओं को |
सरलजीवन,सघनवैभव,अधिक आराम तलबी भी,             $
हटाकर अपने जीवन से,मिटा दें वासनाओं   को |
           -०-
हमारे दिल में पुरखों का,अभी भी ख्वाब बाकी है |
इसी से आंख में अपनी, हया की  आब बाकी है |
मुहब्बत उठ गई शहरों से लेकिन गांव में अब भी,         $
पुरानी रस्म जिन्दा है,अदब-आदाब   बाकी  है |
             -०-
उदर में आसमानों से, सहेजा बन्द अबरों को |
उतर गहराई में दिल की,कुरेदा कुन्द ज़बरों को|
प्रसवपीड़ा सही जो"राज",उसकी टीस सह-सह कर,         $
निचोड़ा दर्द दिल का तो,रचा है चन्द सतरों को |
            -०-
रहें बैठे निठल्ले  भी समय  तो  बीत जायेगा |
मगर जीने की इच्छा का घड़ा सब रीत जायेगा |
मैं बूढा हूं नहीं कुछ हो नही सकता न सोचें ये,
करें कुछ काम जनहित का,बड़ा आनन्द आयेगा |
          -०-
हजारों काम हैं  ऐसे जिन्हें  हम  खुद बना लेंगे |
किसी की जिन्दगी में हम खुशी के पल बढा देंगे |
उठो उठ कर संवारो जिन्दगी के पल जवानों से,-
उन्हें यह गर्व करने दो,कि हम दुनिया सजा देंगे |
          -०-
बिखर जाएं तो पल भर में,मिटा लें अपनी हस्ती को |
संवारें कुछ दिनों में तो, संवारें   एक     बस्ती को |
हमारे पास क्या कम है, झिझकते हम रहें क्युंकर,-
रहे हैं मस्त जब अब तक, जियेंगे  मौज-मस्ती  को |
          -०-
जब आए तो ऊसर था,बसाया है बहारों को |
पसीने से इसे सींचा, तो लाए सुखकी धारों को |
नहीं सोचा अगर होता,नई नस्लों के बारे में,-
तो कैसे झेल पाते हम,विकट तूफां हजारों को |
          -०-
यहां क्या था,हमारी नस्ल केवल जानती है |
हमारी शौर्य शक्ति को, ये धरती  मानती है |
यहां बाहों की ताकत से रहे हैं दोस्त हम जिन्दा,
हमारी बांह की ताकत, धरा पहचानती है |                $
          -०-
मिलेंगे फिर कभी तुमसे,दिलों मे आस रखते हैं |
करेंगे फिर कभी स्वागत,ये इच्छा खास रखते हैं |
खुशी से कर रहे हैं हम,विदा इन नौजवानों को,-
रहेंगे नौजवां सौ तक, यही विश्वास   करते  हैं |         $
           -०-
जो आया है उसे तो एक दिन जाना जरुरी है |
मगर हर रस्म दुनिया की, निभाना भी जरुरी है |
जिएंगे जब तलक,जिन्दादिली का पास रक्खेंगे,
भरम कुछ साथ में रख्नना,दिखाना भी जरूरी है |           $
            -०-
       चन्द रुबाइयां
चली आई बड़े तड़के,   मेरे घर  पर लिए डोली |
हमारे कान में'अब उठ'किरण कुछ् इस तरह बोली |
मिलन की रात बीती है,मिलन क्षण शेष हैं मन में,
अभी क्यों दे रही दस्तक,अभी आराम  कर भोली |
             -०-
तुम्हारी रेशमी आहट, मेरे  जब   पास आती है |
मिलन की कामनाओं का,मधुर अहसास लाती है |
मुझे अमराइयों के झुटपुटे क्षण याद  आते   हैं,
सितारों से भरा आंगन,मिलन की आस लाती है |
             -०-
तुम्हारी देह    का दर्पण , मेरा  श्रंगार  करता है |          $
छिपी मन में    अगर पीड़ा,त्वरित संहार करता है |
मिलन सौ    बार होता है,अगर तुमसे अकेले में,
मिलें कुछ और क्षण मुझको,हृदय हर बार करता है |
             -०-
मिलन की प्यास बुझ जाये, कहें ये देह के धागे |
यही  क्षण चक्षु ने चाहा,  यही मन गेह ने चाहे |
रहो सानिध्य में हरदम , यही है कामना प्रियतम,
तुम्हारे साथ क्यों बांधे,  ये हमने स्नेह के धागे |
             -०-
मलय  सा   हो गया हल्का, क्षितिज के पार चलता   हूं |
छिड़क कर कामना सारी,  तुम्हारे नेह से बाहर निकलता हूं |
सृजन नव कर दिया हमने , नवल संसार  का   प्रियतम ,
धरोहर रूप में अर्पण, क्षणिक लम्हों का ये अंबार करता हूं |
              -०-
मातृभाषा पर जिसे,अपनी न स्वाभिमान है |
राष्ट्रभाषा के प्रति, रखता नहीं अधिमान  है |
पूर्ण पशुवत है जिसे,ना शीर्ष पर हो राष्ट्रप्रेम,
सम्पदामय हो,अकिंचन का सही प्रतिमान है |
        -०-
उठो उठकर तलाशें  हम, नई  सम्भावनाओं को |
करें हिन्दी की अब सेवा,करें नव- साधनाओं को,
सरल जीवन,सघन मेहनत,यही चाहा है हिन्दी ने,
हटाकर अपने जीवन से,मिटा दें धारणाओं  को |
        -०-
हमारे दिल में हिन्दी का,अभी भी ख्वाब बाकी है |
इसी से दिल की धड़कन में,दिलेबेताब  बाकी  है |
शहर से उठ गई हिन्दी,हमारे गांव में    लेकिन,
धड़कती है दिलों मे वो,सरो-शादाब    बाकी  है |
        -०-
मैं हिन्दी हूं,मै हिन्दी था,रहूंगा मैं सदा  हिन्दी |
है हिन्दी ही कथा मेरी,रही हमदम सदा  हिन्दी |
नहीं हूं वर्णसंकर मैं,जो बोलूंगा  अलग  भाषा,
मैं भारत मां का बेटा हूं,मैं बोलूंगा सदा हिन्दी  |
        -०-
करेगी देश को जगमग,मुझे विश्वास विश्वास हिन्दी का |
है उत्सव के लिये निशचित,सितम्बर मास हिन्दी का |
हर एक चौद्ह सितम्बर को,मनाते हैं हम 'हिन्दी डे'-
इसी दिन हम किया करते हैं,तर्पण खास हिन्दी  का |
        -०-
मनाते इस तरह से हम, अजब त्योहार हिन्दी   का |
इकट्ठे हो लिये, मातम मना, हर बार  हिन्दी  का |
बना कर एक खबर भेजी जहां छपता  है   रोजाना-,
फिर अगले दिन पढ़ा करते हैं हम,अखबार हिन्दी का |
        -०-
गवइयों की सजी महफिल,गवइये सुर लगाते हैं |
कुछ अपने खूबसूरत मुख,अदाएं कर दिखाते  हैं |
हमारे पास क्या,सूखे शजर में फूल खिलते क्या ?,         $
लो हम भी आपके सम्मुख,मटककर हिनहिनाते हैं |
          -०-
कवि को धैर्य से सुनना, अजब है  बेबसी यारो |
यहां हमको बुलाया है, ये इनकी  बेबसी  यारो |
चलो इस हाथ खुशियां लें,तुम्हें देते हैं गम भारी,            $
सुनो इतने तो हमको भी,समझलो बेबसी  यारो |
          -०-
तू श्वानों की तरह से भोंकता और वार करता है |
वतन को बेच खाने के नियम तैयार  करता  है |
विदेशी बैंक में जाकर तू रखता है कमाई   को,
लड़ा कर धर्म-जाति पर,वतन बरबाद करता  है |
          -०-
अरे शिशुपाल सा बरताब करना छोड़ दे अब तो |
बिदकना,भोंकना,बकवास करना छोड़ दे अब तो |
तुझे हम माफ कर देंगे,अगर सत्ता की खातिर तू,
वतन का बेचना,व्यापार करना छोड़ दे अब  तो |
         -०-
ये श्वानों सा रुदन तू झींक कर हर बार करता है |
हमारी राष्ट्र्-भक्ति पर,तू हरदम   वार करता  है |
अरे सत्ताके भंवरे सुन, न  आतंकी  हमें   कहना,
यहां का मूल हर ब्च्चा,वतन को प्यार करता है |
              -०-
उलझना मत कभी हमसे,अगर ली हमने अंगड़ाई |
वहीं पर ड़ाल देंगे हम ,  जहां बिकती है चतुराई |
हम आंधी हैं तेरी कीलों से हम रुक नहीं सकते ,
जो दृष्टि वक्र की हमने, न मिल पायेगी परछांई |
               -०-
बड़प्पन है हमारा ये,कि हम चुपचाप रहते  हैं  |
तू हमको गालियां देता है,हम सन्ताप सहते हैं  |
मगर सत्ता के लोलुप सुन,अति का अंत होता है,
सहेंगे अब नहीं कुछ भी, ये तुझसे साफ कह्ते है |

यूं तो कहने को वतन में,अब सवेरा हो गया |
नफरतों का हरतरफ, लेकिन अंधेरा हो गया |
देश के रक्षक का हमने,जिसको बख्शा था खिताब,
बदनसीबी"राज"अपनी,  वो लुटेरा हो गया |
       -०-
उन्नत ललाट पर चमक रही,भारत माता की बिन्दी है |
है ब्रह्मपुत्र सम हिमनद यह,सतलुज,सरयू,कालिन्दी है |          $
जो आकर मिला पवित्र हुआ,है पतित-पावनी मां जैसी,
वर्तनी सरल,  भाषा  सीधी, निर्मल गंगा सम हिन्दी है |
      -०-
अब नही आतंक से डर,शेष तक ना वेदना है |
चक्षु लाखों अब सजग हैं, वार तेरा देखना है |               $
देश में ही रह रहे,  विश्वासघाती  वार कर -,
जाग कर बैठा है हिन्दू,मुस्लिमों में चेतना है |
      -०-
निकले थे हम कहां के लिये आ गये कहां |
हर ओर लाश खून है,उजड़ा  है हर  मकां |
किसने लगादी आग फिर, अम्नोअमान को,
फिर दिख रहा है हर तरफ,उठता हुआ धुआं |
     -०-
रिश्तों के तार तोड़कर,बैठे हुये हैं कयों |
हम नफरतों के दौर,समेटे हुये हैं क्यों |                   $
सांझी विरासतों का, इतिहास भूलकर ,
बारूद के एक ढेर पर बैठे हुये हैं क्यॉ |
     -०-
तन बिक गया बाजार में,थोड़े से धान् में |
बिखरी पड़ी है लाज एक्,सूने मकान  में |
सपना यही था क्या मेरे,आज़ादहिन्द का,                 $
जन्ता का ये भविष्य है,भारत महान में |
     -०-
तुम्हारी रेशमी आहट , तृणों से प्यार है मुझको |
अनक्षत देह परमित के कणों से प्यार है मुझको |
निकट सानिध्य में बीते तुम्हारे साथ जो स्वर्णिम,
रहे सौगात जीवन के , क्षणों से प्यार है मुझको |
         -०-
मंद-मंद मादक-मलयानिल को संग लिए, करता काम-केलिकृत्य,गिरि तक आता है |
शीतल,सहज-शांत,सौन्दर्य को समाए तन, बहु - विधि,बादल, बहार  बन  जाता है |
पानी  नहीं  प्रीत  के  पुनीत  पंख-पांवड़े,पूर्णिमा के पुण्य-पूर्ण, पावन प्रकाश  में -
दूर  कहीं  देर तक, दुन्दुभि  निनाद कर ,प्रेम के प्रसून , प्रेम - पूर्ण  बरसाता है |          
          -0-
अविरल, अनन्त, अवशेष  रह  जाय  यह,
क्रम किस भांति,कौन किसका निभाता है |
पर्यावरण  पूर्ण    पहले    सा,  'राज'  हो,
दायित्व हम आप पर, अब आ जाता ही |
        -0-
हिन्दुत्व पर अपने नहीं जिसको तनिक अभिमान है |
पशु सरीखा, जी रहा,  सब से अधम  इन्सान है |
सोच  रक्खो  ये   हमेशा, श्रेष्ट  थे  हम  श्रेष्ट हैं ,
हिन्दुत्व ही इस विश्व का, सब से बड़ा सम्मान है |
     -०-
    कवि-संगोष्ठी
मिला व्यक्तित्व आकर्षक,गला क्या खूब पाया है |
हिला कर रख दिया सबको,जरा सा गुनगुनाया है |
चहेते बन गये हैं वो,जमाने भर के कुछ दिन में,
भरा हर रंग कविता में, जो सबको खूब भाया है |
           -०-
उसी दिन फिर से मिलते हैं,लिपट कर खूब मिलते हैं |
वो लिखते हैं तो अपने में, सिमट कर खूब लिखते हैं |
वो महफिल में कहीं जाकर, अगर कविता सुना दें तो,
वहां शबनम की बूंदों से,  निखर कर फूल खिलते  हैं |
            -०-
वो सूरज हैं उन्हें दीपक दिखाना, क्या उचित होगा |
वो रह्बर हैं उन्हें राहें  बताना,  क्या उचित होगा |
जहां आकर कई नदियां मिलें,  साहित्य  गंगा से,
वहां सागर से कुछ बूंदें उठाना,  क्या उचित होगा |
            -०-
उन्हें दीपक कहा जाना, सरासर ज्यादती   होगी |
शमा भी उनकी कविता पर,महारत जानती होगी |
वो माइक पर खड़े होकर, हमें कविता   सुनायेंगे,
ये सुन कर आज कविता भी,कहींपर कांपती होगी |
               -०-
परीक्षक मैं अगर होता,तो सौ में सौ तुझे देता |
यहीं पर मैं नहीं रुकता,जरा सा और बढ लेता |
लिखी है जिस तरह कविता,हृदय की रोशनाई से,
अलग से चार सौ नम्बर,तुझे बोनस के दे देता |
           -०-
सतरों में चन्द आपने,क्या-क्या बयां किया |
लफ्जों में हालेदिल को,पिरो कर अयां किया |
चिलमन के साथ बैठ कर,दो लफ्ज क्या कहे,
खुशरगं सा जैसे यहां, मौसम खिला दिया |
           -0-
हे मधु-गंधे मधुबाला सी,
तू सुरभित है सुरबाला सी |
अन्तर तक अगम अगोचर है-
मधु छलकाती मधुशाला सी |
           -0-
सूर्य अस्तांचल चला,पूछा धरा ने ये सवाल |
इस अंधेरे में रखेगा,कौन अब मेरा खयाल |
चुप हैं सब ये देख,नन्हे दीप ने उठकर कहा,
सूर्य जैसा मै बनूंगा, लेके एक नन्हीं मशाल |
         -0-
चली आई मेरे उर में , तुम्हारी  याद  की  डोली |
उठाकर  नैन  उन्मीलित , लरजते प्यार से बोली |
गुजरते हैं कहो कैसे तरसते पल , तो मैं बोला-
हिमालय हो गया तुम बिन निमिष भी काटना भोली |
          -०-

जीने को एक युग न हो, पूरी घड़ी तो है |
सांसों की डोर,वक़्त से जुड़ती लड़ी तो है |
कहते रहें ये लोग के, पाने को कुछ नहीं,
ना हो पहुंच आकाश तक,धरती पड़ी तो है |
         - ० -
जन्मे, पढे, नौकर  हुए,  होकर  रिटायर घर गए,
कुछ दिनों के बाद, रगड़ीं  एड़ियां   और मर गए |
इस मिथक को तोड़,जो भी वक़्त से लड़ कर जिए,
वो समय के शीर्ष-पट पर, नाम अंकित कर गए |
            - 0 -
केवल नारे और बातों से, सद्कर्म नहीं बन पाते हैं |
जो दृढ निश्चय लेकर चलते, पर्वत पर राह बनाते है |
बाधा आए,संकट आए, रुकना उन  को स्वीकार नहीं,
कायर चलते नीचे झुककर,सर सब के वीर झुकाते हैं |
                  - 0 -
 नहीं जानता हूं के मन्ज़िल कहां है |
अभी तो सफ़र का इरादा किया है |
कहीं भी मिले, ढूंढ लूगा मैं तुझ को ,
मन्जिल से अपनी ये वादा किया है |
               - 0 -
सबकी रोटी से उन्हें, हिस्सा बड़ा मिलता रहे |
चाहते हैं लोग रस्मन, सिलसिला चलता रहे |
मेरी कोशिश है यहीं पर,खत्म हो ये सिलसिला,
हर किसी का हक़ उसे, मांगे बिना मिलता रहे |
          - ० -
हर कहीं पर एक घटना घट रही है |
पेड़ की हर एक टहनी कट रही है |
बढ रहे आवास इंसानो के,लेकिन,
बेबस परिंदों की बसावत घट रही है |
          - ० -
आप सब ज़िन्दा रहें,बस इसलिए लिखते है हम |
ज़िन्दगी के वास्ते ही, मरसिए लिखते  हैं  हम  |
बारूद के एक ढेर पर, बैठा हुआ है ये जहां,
मौत से कैसे बचें,  ये सिलसिले लिखते हैं हम |
           - ० -