शनिवार, 27 अक्तूबर 2012

श्री चम्पा लाल चौरड़िया 'अश्क'के प्रति सादर


   श्री चम्पा लाल चौरड़िया 'अश्क'के प्रति सादर
हे काव्य विधा के शिखर शीर्ष,
छंदों   के गगन  सरीखे तुम |
हो  श्रेष्ट स्वंय उपमा-विहीन,
उपमान स्वंय से दीखे तुम |

साहित्य गगन के सूर्य-पुरूष,
तुमने इतिहास सजा डाला |
शब्दों संग नृत्य किया जी भर,
अक्षर को 'साज़' बना डाला |

जो लिखा नींव का पत्थर बन,
बन गया काव्य का अतल श्रोत |
चांदी के पन्नों पर स्वर्णिम,
जल उठी सौम्य सी नवल जोत |

दे काव्य विधा को नव-जीवन,
नव पथ का नव निर्माण किया |
मृतप्रायः,तुकान्त को जीवित कर,
काव्य-जगत कल्याण किया |

कल्पनातीत शत-ग्रन्थ लिखे,
कुछ अकल्पनीय साहित्य दिया |
नित शब्द स्वर्ण से हिन्दी को,
एक कमलनीय लालित्य दिया |

कविता को देकर नवल रूप,
लिख दिये ग्रंथ पर ग्रंथ कई |
सुन्दर भूषण परिपूरित कर,
रच डाली हीरक राह नई |

हिन्दी को महका'चम्पा'सम,
बन गए'लाल'तुम हिन्दी के |
दिग्भ्रांत काव्य के'अश्क'पौंछ,
कृतिकार बने तुम हिन्दी के |

अति-ऋणी आपकी हिन्दी है,
दे डाला जिसको धवल रूप |
अपनी विद्वता से'चौरड़िया'जी,
बन गये काव्य के नवल भूप |

  धनवर्षा,हनुमान मन्दिर,खटीमा-262308(U.K)
    मो०-09410718777, 08057320999

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