बुधवार, 17 अक्तूबर 2012

पावन उत्तराखण्ड


       पावन उत्तराखण्ड
                              डा.राज सक्सेना
जब हिमालय पर उतरती, सूर्य की पहली किरन |
झिलमिलाती-झूमती, पावन धरा लगती  दुल्हन |
हर शिखर हीरक बना और हर नदी चांदी का रूप,
जगमगाते,  झूमते,  स्वर्णिम  बने  धरती-गगन |
शस्यस्यामल, सौम्य, सुरभित, है धरा वनखण्ड की,
वन्य पशु-पक्षी प्रजा, भय शून्य करती आचरण |
लावण्यमय हो खेत कुसुमित,मकरंद करते स्फुरित,
गंध स्वप्निल महमहाती, साथ ले  बहती पवन |
भेजती है लाड़ले नित, देश पर  बलिदान  हित,
खो रही खुद लाड़ले पर ,  देश में रखती अमन |
ऋषि-महर्षि  की धरा , पावन-धरा  कैलाश की,
वेद-वेदान्तिक ऋचा   का,  सार्थक करती वरण |
वीर जननी, धर्म धरणी, भाल भारत  भूमि की,
'राज' उत्तराखण्ड को, हर संस्कृति करती नमन |

             धनवर्षा,हनुमानमन्दिर,खटीमा-262308
                 मो. 09410718777, 08057320999

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