बुधवार, 19 सितंबर 2012



                                        वादा तेरा-वादा
                                                 - डा.राज सक्सेना
         फ्लैट का दरवाजा खोलकर वाल्कनी में पड़ा अखबार उठाया तो मुख पृष्ट पर
सतनाम जी की फोटो देख कर चौंक पड़ा | जल्दी से हैडलाइन पर नजर डाली तो लगा
अरे ! ये क्या हो गया | बड़े-बड़े अक्षरों में लिखा था,"राज्य के मुख्य मन्त्री सतनाम जी
का दिल का दौरा पड़ने से देहान्त"| पढ कर कलेजा मुंह को आ गया, खड़ा नहीं रहा गया
धम से वाल्कनी के नंगे फर्श पर ही बैठ गया | सतनाम जी का चेहरा आंखों के सामने -
बार-बार आने लगा कभी हंसता हुआ, तो कभी मुस्कुराता हुआ | गुस्से में तो कभी उन्हें
देखा ही नहीं था | कोई मुंह पर गाली दे जाय क्या मजाल जो चेहरे पर बल भी पड़ जाय,
उसे बैठाते चाय पानी पिलाते और उसके गुस्से का कारण पूछते, समस्या का उल्टा-सीधा
जो समयानुकूल समझते निदान बताते और ठंड़ा करके ही भेजते |
                    एक पत्रकार होने के नाते मेरी उनसे पहली मुलाकात पत्र की ओर से -
एक दुर्घटना पर उनका साक्षात्कार लेने के सिलसिले में हुई थी | अब से बीस साल पहले
वे मुख्य मंत्री नहीं, मंत्री थे तब, परिवहन मंत्री | एक बस दुर्घटना हुई जिसमें यह इल्जाम
लगा कि विभाग ने बिना सही ढंग से जांच कराए खराब बस को पर्वतीयरूट पर भेज दिया
जिससे बस दुर्घटनाग्रस्त हो गयी और सत्ताईस यात्रियों के साथ बस के ड्राईवर और परि-
चालक की भी मौत हो गई | मामले को कर्मचारी संघ ने अपने हाथ में लेकर हड़ताल -
कर दी | चक्का जाम हो गया तो, मेरे पत्र ने मा.मन्त्री जी का, इण्टरव्यु लेने के लिये -
 मुझे भेज दिया | यह बात अलग है कि आम हड़तालों की तरह कुछ दो, कुछ लो के
आधार पर हड़ताल तो खत्म हो गई मगर मेरे और सतनाम जी के बीच जो उनके खुले
दिल और अपना बना लेने की कला के चलते  सम्बन्ध बने वे उनकी मृत्युपर्यन्त रहे |
                    यूं तो चौधरी सतनाम सिंह अस्सी बरस के थे मगर दिल के बड़े जवान
और मजाकिया थे | कम उम्र महिलाओं और विशेषकर जवानी की दहलीज में कदम रख
रही कन्याओं से उन्हें बेहद लगाव था, अन्य नेताओं की तरह वे इसे छिपाते भी नहीं थे |
अक्सर दो चार महीने में किसी कन्या के सम्बन्ध में वे हैडलाइन बन ही जाते थे | खैर
यह उनका व्यक्तिगत मामला था हमें इससे क्या | दिल के बड़े साफ, नियमों को ताक -
पर रख कर अपने निर्वाचन क्षेत्र के लोगों की मदद करने की आदत और अपने निर्वाचन
क्षेत्र में हर सुख सुविधा के साधन नागरिकों को उपलब्ध कराने की नीति के चलते वे सन
अस्सी से अपने क्षेत्र जसपुर के निर्विवाद प्रतिनिधि थे | जब उनकी पार्टी को जरूरत हो-
चाहे केन्द्र में या प्रदेश में उन्हें बिना मांगे सांसद या विधायक का टिकट मिल जाता था |
पार्टी के विश्वास को कायम रखते हुए वे कभी हारे भी नहीं अन्तर चाहे कम हो या ज्यादा
जीतते सतनाम जी ही थे | विधायक बने तो मुख्यमंत्री और सांसद बने तो केन्द्र मे  -
मंत्री की सीट भी उन्हें बिन मांगे मिलती थी |
                        कहते हैं चिराग तले अंधेरा होता है | सतनाम जी गोरे चिट्टे, लाल
रंग के चमकदार चेहरे वाले सुदर्शन, हर दिल अजीज नेता भले रहे हों पत्नी से उनकी -
कभी नहीं बनी | कहने वाले कहते हैं कि उनके अन्य स्त्रियों में रस लेने की आदत के
कारण पत्नी जो एक प्राइमरी अध्यापिका थीं ने शादी के पांच साल बाद ही इन से अलग
रह कर सादगी से नौकरी जारी रखी थी | लोग उनकी बड़ी इज्जत करते थे | इस नाते
नही  कि वे सतनाम जी की घोषित पत्नी थीं, अपितु उनकी सरलता और सादगी के -
साथ उनकी पवित्र जीवन शैली ही उनकी लोकप्रियता और सम्मान का कारण थी | अपनी
इसी विशेषता के कारण वे समर्पित भाव से शिक्षण कार्य निबाहते हुए सफलता की सीढी
चढती रहीं और इण्टर कालेज के प्रधानाचार्य पद से सेवानिवृत होकर निर्धन बच्चों के  -
लिए एक प्रतिष्ठित शिक्षा संस्थान चला रही हैं |
        यूं तो राजनेताओं में हजार कमियां होती हैं | सतनाम जी में भी कुछ तो थीं
ही | मगर एक बहुत बड़ी कमी थी कि अन्य नेताओं से कुछ आगे बढ कर लारा लप्पा-
बाज थे | दिखाएंगे तो आपको कितने सब्जबाग,मगर देंगे अंगूठा | टालते रहेंगे, वादे-

                                 - 2 -
पर वादे | इतने वादे कि मांगने वाला थक कर बैठ जाय |
         एक बार मैंने उनसे उनकी इस कमी का जिक्र किया तो उन्होंने जो बताया-
उसका सार संक्षेप यह है कि पहले सतनाम जी ऐसे बिल्कुल नहीं थे | वे तो पक्के गांधी
वादी नेता थे | रिश्वत से कोसों दूर्, अपनी गांठ से पैसा लगा कर दूसरों के काम कराने
वाले सीधे साधे जन सेवक थे | मगर जब लोगों के उकसाने पर निर्द्लीय विधायक सीट
पर खड़े हो गए तो जमानत भी नहीं बचा पाए | जिन-जिन के काम कराते थे सबने -
जात-बिरादरी,दारू या पैसा लेकर दूसरों को वोट दिया तो सत्ताधारीपार्टी के एक बड़े नेता
ने इनकी प्रतिभा को पहचान कर इन्हें पार्टी ज्वाइन कराई और एक साल में आधुनिक -
नेता के सारे गुणों से परिपूरित भी कर दिया | फलस्वरूप अगला इलेक्शन सतनाम जी ने
अन्य सभी प्रतिद्वंदियों की जमानत जप्त करा कर जीता और उस बड़े नेता की कृपा से -
उसके ही विभाग के उपमंत्री भी बन गए | फिर क्या था उस बड़े नेता मंत्री के सारे कामों
के माध्यम भी बन गए | हर प्रकार का 'माल' मंत्री जी तक इनके माध्यम से ही पंहुचने
लगा | पहले तो अपनी आदत के मुताबिक वे सर्वथा ईमानदार रहे मगर  जब मंत्री जी ने
ही समझाया तो कभी मंत्री जी को बता कर और कभी बिना बताए भी सतनाम जी'माल'
में से अपना कमीशन या कुछ घन्टे चुराने लगे | धीरे-धीरे यह आदत बन गई और जब-
वे मंत्री बने तो खुल कर खेलने लगे | पत्नी ने कुछ दिनों तक तो घर में धन और महि-
लाओं का आना सहा, शिकायत भी की पर कोई असर न देख कर अपना बोरिया बिस्तर -
उठाकर अपने स्वंय के बनाए मकान में एक बार गईं तो फिर सतनाम जी से न तो मिलीं
ही और न ही कोई सम्बन्ध रखा | मुझ पर वे पुत्रवत स्नेह रखतीं थी | अगले दिन जब
मैं उनसे मिलने गया तो वह इस घटना से पूरी तरह निस्पृह और अविचलित थीं | मेरे-
द्वारा बात प्रारम्भ करते ही उन्होंने हाथ उठा कर मुझे रोक दिया और कहा,"जो अध्याय -
खत्म हो गया उस के पन्ने पलटने से क्या फायदा |"  मैंने  उस दिन जाना  कि सतनाम
जी के प्रति उनके मन में कितनी नफरत थी | खैर जाने दें यह उनका व्यक्तिगत मामला
है | हमें क्या |
         आज सतनाम जी का चौथा था | दिन भर उनके रिश्तेदारों द्वारा कराए गए
चौथा कार्यक्रम में व्यस्त रहना पड़ा | पूरे दिन मा इक पर सतनाम जी का प्रशस्ति  -
वाचन होता रहा | उन्हें दुनिया का सर्वश्रेष्ठ व्यक्ति सिद्ध करने में किसी ने कसर नही -
छोड़ी | कार्यक्रम में सविता जी ( सतनाम जी की पत्नि )कहीं नजर न आने पर मैंने
उन्हें फोन किया तो उन्होंने कहा,"देखो बेटा,सतनाम जी से मेरा सम्बन्ध तो उसी दिन
समाप्त हो गया था जिस दिन मैंने उनका बंगला छोड़ा था | उनकी तरह दिखावा मुझे -
कभी पसन्द ही नहीं रहा जो मैं दिखावा करूं |"
          बात सही थी मैं चुप रह गया | दो चार लोगों ने दबी जबान यह प्रश्न -
उठाया भी किन्तु सविता जी के विराट व्यक्तित्व के समक्ष प्रश्न चर्चा का विषय न बन
सका इसका मुझे संतोष भी रहा | खैर शाम को थका मांदा अपने फ्लैट पर आया पत्नि
बच्चों सहित मायके गई थी | घर सूना-सूना लग रहा था | दिन में काफी तला-भुना
खा चुका था इस लिए कुछ खाने को भी मन नहीं कर रहा था | रात आठ बजे  चार
स्लाइस दूध के साथ खाकर रात दस बजे तक सारे चैनलों के समाचार सुनता रहा और
जानकारी को अपडेट करता रहा | दिन भर का थका तो था ही आलस ने घेर लिया -
कमर सीधी करने बिस्तर पर लेटा तो दो चार मिनट में गहरी नींद आ गई |
          अभी एकाध घन्टा ही सोया होऊंगा कि मुझे लगा सतनाम जी मेरे बिस्त-
र के बगल में लगी कुर्सी पर आकर बैठ गए | मैंने आंख खोलने की कोशिश की मगर
आंख न खोल सका,उठने की कोशिश की तो उठ न सका | इन्द्रियां सब सजग मगर -
उनका संचालन मेरे नियन्त्रण में नहीं रहा | लगा लकवा मार गया | दो चार मिनट यह
स्थिति रही | मैंने एक बार फिर हिलने की कोशिश की, सफल न होने पर हाथ पैर ढीले
छोड़ कर आंख बन्द किए ही चुपचाप पड़ा रहा | कुछ पलों के बाद सतनाम जी की आ-
वाज आई,"कैसे हो मित्र" |

                                    - 3 -
           " अच्छा हूं , आप कैसे हैं |" मैने फिर उठने की चेष्टा की | सतनाम
जी जब किसी समस्या में उलझे होते थे या अत्यन्त प्रसन्न होते थे तो मुझे मित्र कह-
कर ही सम्बोधित करते थे |
            "नहीं हिलने की चेष्टा मत करो, हिल नहीं पाओगे | मेरी बात ध्यान
से सुनो, मैं सातवें आसमान में स्थित 'यमराज भवन' से बोल रहा हूं | बड़ी मुश्किल
से यमराज ने केवल दो बार इस दिव्य यन्त्र से तुमसे बात करने की अनुमति दी है,एक
बार अब और एक बार तीन दिन बाद |"
             " प्रणाम श्री मन, आदेश करें |"
             " जीते रहो, तरक्की करो | सुनो मित्र तुम अच्छी तरह जानते हो -
कि मैं तुमसे कई गम्भीर मामलों में राय लेता रहा हूं और तुम मुझे हमेशा अपनी नि-
ष्पक्ष राय देकर मुझे संकट से उबारते रहे हो | आज भी मैं एक धर्म संकट में फंस गया
हूं  बुद्धि काम नहीं कर रही है कि क्या करूं | राय दो कि मैं क्या करूं ?"|
            " कुछ बताएं भी तो माननीय | जब तक मुझे पता न चले कि सम-
स्या क्या है, तब तक मैं कोई राय कैसे दे सकता हूं |"
            " ओह सारी, बात कुछ लम्बी है तुम बोर तो नहीं हो जाओगे "|
            " नहीं सर, पूरी रात अपनी है आप बेफिक्र होकर कहें"|
            " तो सुनो मित्र "| उन्होंने अपनी आदत के अनुसार मुस्कुराते हुए कहा
मुझे आश्चर्य हुआ कि मैं स्वर्गीय सतनाम जी से आंख बन्द करे हुए ही बात कर पा
रहा हूं कैसा चमत्कार है यह |
          "सुनो मित्र, अचानक चार दिन पूर्व जब मैं सारा काम काज निबटाकर -
शयनकक्ष में नियमित चार पैग लगा कर और खाना खाकर सोने के लिए गया तो मुझे
सीने में हल्का सा दर्द महसूस हुआ | लगा दिल बैठा जा रहा है | मैं घबरा गया मैंने
जोर से घण्टी पर हाथ मारा मगर तब अर्दली या तो सो रहा था या कहीं गया था,शायद
मेरे लिए दूध लेने | जब तक वह आया तब तक मेरे प्राण मेरा शरीर छोड़ चुके थे"|
          सतनाम जी सांस लेने के लिए रूके | मेरी उत्कंठा बढी | अनजाने में
मुझे एक मृतात्मा के अनुभव प्राप्त होने जा रहे थे | मेरा दिल बल्लियों उछल रहा था |
मैं जल्दी से जल्दी सब कुछ जान लेना चाहता था | मैंने बेताबी से सतनाम जी से -
प्रश्न किया,"फिर क्या हुआ मान्यवर"|
          सतनाम जी मुस्कुराए और बोले," बहुत बेताब न हो, आराम से सुनो-
मैं अपने आप को बहुत हल्का महसूस कर रहा था | लग रहा था जैसे मैं उड़ा चला जा
रहा था | ऊपर और ऊपर, अनन्त की ओर | पता नहीं कितनी देर उड़ता रहा, जब-
रुका तो एक बहुत बड़ा सोने का दरवाजा मेरे सम्मुख था | अचानक मेरे बगल में एक
सुन्दर और सुसज्जित देव पुरूष प्रकट हुआ | शायद वह निराकार मेरे साथ ही चल रहा
था या फिर मुझे लेकर जा रहा था मैं नहीं समझ पाया | मैंने देखा उसने दरवाजे पर -
हाथ रखा और दरवाजा बेआवाज खुल गया | जैसे ही हम लोग अन्दर हुए दरवाजा तुरन्त
बन्द हो गया अब मुझे लगा कि कुछ गड़बड़ है | मैं कहां हूं मैं यह सोचने लगा |पलक
झपकते हम एक स्वर्णिम दरबार हाल जैसे भवन में थे जिसमे पड़े एक शानदार सिंहासन
पर एक सफेद दाढी मूंछधारी भव्य राजसी व्यक्तित्व का व्यक्ति बैठा था | मेरे साथ चल
रहे दिव्य पुरूष ने उसे प्रणाम किया | सिंहासनारूढ व्यक्ति ने बिना कुछ बोले हाथ उठा -
कर उसे अभय दिया और पूछा," इस आत्मा ने तुम्हें परेशान तो नहीं किया आने में -
चित्रगुप्त"|
            "नहीं धर्मराज, इसने और नेताओं की तरह बिल्कुल भी परेशान नहीं
किया | गाय की तरह चुपचाप मेरे साथ चला आया है | शायद यह समझ ही नहीं -
सका कि यह मर गया है"|
             "अच्छा चलो इसका खाता खोलो और देखो कि इसे कहां भेजना है"|
             "जो आज्ञा महाराज" कह कर धर्मराज साथ के छोटे आसन पर जा

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बैठे और एक पुरानी बही उठा कर उसके पन्ने पलटने लगे |
             "आश्चर्य महाराज" कुछ देख कर वे आश्चर्यमिश्रित स्वर में बोले |
             "क्या हुआ, कुछ गड़बड़ है क्या" धर्मराज ने सर उठाकर कहा |
             "गड़बड़ तो नहीं मगर आश्चर्य है कि इसके विधायक बनने से पूर्व -
के सद्कर्म और विधायकी से अब तक के दुष्कर्म समान हैं ऐसे में इसे स्वर्ग भेजा -
जाय या नर्क यह समझ में नहीं आ रहा है "| चित्रगुप्त ने बिना सर उठाए कहा |
             "इसमें परेशानी की क्या बात है, अगर अच्छे और बुरे दोनों कर्म-
समान हैं तो इसे स्वर्ग और नर्क दोनों की सैर करादो, यह जहां रहना चाहे रहे, हमारा
क्या जाता है | हमें तो इसे एक जगह रखना ही है"| धर्मराज ने व्यवस्था दी |
             "जो आज्ञा महाराज"| कह कर धर्मराज उठ खड़े हुए | मुझे साथ -
लिया और चल दिये" | कह कर सतनाम जी रूक गए | मेरा कलेजा मुंह को आगया
मेरी उत्कंठा शीर्ष पर थी मुझे उनका इस तरह रूकना अच्छा नहीं लग रहा था | मगर
मैं कर भी क्या सकता था | चुपचाप पड़ा रहा |
          "कक्ष से बाहर निकल कर चित्रगुप्त जी ने मुझसे पूछा कि मैं पहले स्वर्ग
देखना चाहूंगा या नर्क," स्वर्गीय सतनाम जी ने कुछ उदास होकर कहा | मुझे लगा -
शायद कुछ गड़बड़ हुई है | मेरी उत्कंठा आसमान छूने लगी |
          मैंने तुरन्त सवाल किया,"तो फिर आपने क्या जवाब दिया"|
          "यहीं तो जीवन में पहली बार गच्चा खा गया मित्र, मैंने पहले स्वर्ग को
देखने का दांव खेलकर बहुत बड़ी गलती करदी | अगर बाद में स्वर्ग देखता तो लौटते -
समय मैं अपनी रणनीति पर पुनर्विचार के लिये कुछ समय तो पा जाता"|
          "कृपया आगे बताएं क्या हुआ|" मैंने उतावली में पूछा |
          "आगे क्य़ा होना था, चित्रगुप्त ने तुरन्त सारथी को स्वर्ग चलने का आदेश
दे दिया पलक झपकते स्वर्ग का द्वार सामने था शायद यह धर्मराज (यमराज) के कार्या-
लय के सन्निकट ही था |"
          " फिर |" मेरा कलेजा मुंह तक आ गया |
          "स्वर्ग का द्वार भव्य तो था मगर बड़ा सूना था न कोई प्रहरी न चोबदार-
शायद भले लोगों के वहां पहूंचने के कारण कोई हंगामा होता ही न हो इस लिये वहां कोई
सुरक्षा प्रबन्ध न रहा हो|" सतनाम जी ने कारण बताते हुए बात आगे बढाई," मेरे ऊपर
इस खामोशी और सन्नाटे भरी उदासी का कुछ अच्छा असर नहीं पड़ा | पहला इम्प्रेशन -
ही गलत पड़ जाने से मन खट्टा हो गया|" सतनाम जी लगातार उदास हो रहे थे | उन
की यह दशा मेरी उत्कंठा में लगातार वृद्धि होती जा रही थी जिसे मैं छिपा भी नहीं पा -
रहा था |
           "फिर क्या हुआ मान्यवर|" मैंने उनसे संसदीय भाषा में पूछा |
           "अरे होना क्या था मैं लगातार यमराज प्रशासन के जाल में उलझता जा
रहा था|" वे फिर उदास हो गये |
           मेरा कलेजा मुंह को आ गया | मगर मैंने अपने आप को रोक कर पूछा,
           "फिर|"
           "क्या फिर-फिर लगाए पड़े हो, मेरी बरबादी की दास्तान शांति से नहीं-
सुन सकते हो|"
           "क्षमा करें मान्यवर|" कह कर मैं चुप हो गया | सतनाम जी थोड़ी देर
लम्बी सांस लेकर स्वंय को व्यवस्थित करते रहे फिर बोले,"माफ करना मित्र जीवन भर
मैं लोगों को झांसे देता रहा उन्हें ठगता रहा यह पता नही था कि भगवान के प्रशासन में
भी वही लटके झटके हैं जो भारत में आम हैं | सारांश यह कि मुझे तीन घन्टे बाद आने
को कह कर चित्रगुप्त वापस चले गए | मैं सूने पड़े रास्ते पर स्वर्ग के अन्दर प्रवेश कर
गया | अन्दर तो और भी बुरा हाल था | बांई तरफ बैठीं कुछ जवान और अधिकतर बूढी
महिलाएं आंख बंद किये माला फेर रही थीं | मीलों तक यही आलम न शराब का कोई-

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झरना और न परियों के झुण्ड | न कम उम्र लड़कों की कतार न नाचने वाली अप्सराएं
हर तरफ अपने में मगन धार्मिक व दीनदार नर नारियों के झुण्ड पूजा या इबादत में लगे
दिखे | मेरा दिमाग खराब हो गया मुझे वहां एक पल भी गुजारना मुश्किल हो गया, -
मैं घबरा कर वापस दरवाजे पर आ गया | निर्धारित समय पर चित्रगुप्त आए और बिना
कुछ कहे मुझे वापस स्वर्ग से बाहर ले आए|"
         स्वर्ग के सूने दरवाजे के बाहर मुझे लेजाने के लिये रथ तैयार खड़ा था | चित्र-
गुप्त ने मुझे बड़ेआदर के साथ रथारूढकिया और सारथीको चलने का इशारा किया | रथ के
चलते ही मुझे लगा कि कहीं मैं स्वर्ग का परित्याग कर कोई गलती तो नहीं कर रहा हूं | -
जब तक मैं कुछ निर्णय ले पाता रथ स्वर्ग से काफी दूर आ चुका था |
         लगभग एक घन्टे की ताबड़तोड़ यात्रा के उपरान्त दूर से नर्क के द्वार का शिखर
नजर आने लगा | नर्क के नाम से ही मेरा दिल बैठने लगा मुझे विश्वास होने लगा कि मैंने
एक बहुत बड़ी गलती करली है | पता नहीं क्यों मेरे मन में यह विचार आने लगा कि मैं-
किसी जाल में उलझता जा रहा हूं |
                  अब नर्क का गेट साफ नजर आने लगा था | गेट पर अपार भीड़ और स्वा-
गत की अनेक तैयारियां देख कर मेरा हृदय गदगद हो रहा था आखिर नेता को चाहिए भी
क्या थोड़ी सी भीड़ और गर्मजोशी से स्वागत | मेरा मन बल्लियों उछलने लगा |धीरेधीरे रथ
नर्क द्वार के टीकसामने जाकर रूका | हजारों की भीड़ स्वागत की तख्तियां हाथों मे हिलाती
हुई रथ के चारों ओर इकट्ठी हो गई | सतनाम जिन्दाबाद से नर्क लोक की दीवारें हिल गईं |
मुझे अपने निर्णय पर अब गर्व होने लगा ,मुझे लगा गलती तो मैं कर ही नहीं सकता हूं |"
          सतनाम जी अचानक ख्यालों से बाहर आए और उदास हो गए | मुझे उनकी उदासी
कुछ अजीब सी लगी |
           मेरी जिज्ञासा का कोई अन्त नहीं था | उनकी निमिष मात्र की चुप्पी मेरी
उत्कंठा को हजारों गुना बढा रही थी | उधर सतनाम जी पता नहीं किन ख्यालों में गुम -
कुछ सोचने में लगे थे | जब काफी देर हो गई तो मुझसे नहीं रहा गया | हिम्मत कर के
मैंने उन से कहा,"कहां खो गए सतनाम जी |"
           "ऐं", मानों वे अन्धे कुएं से बोले | "मुझे अपनी बरबादी के घटनाक्रम से
बाहर तो आने दो मित्र, तभी तो कुछ बता पाउंगा |" वे कुछ झुंझला कर बोले | मुझे -
लगा शायद मैं कुछ अधिक उतावला हो रहा हूं |
           मैंने शर्मिन्दगी के भाव चेहरे पर लाते हुए माफी मांगी तो वह कुछ सामान्य
होते हुए बोले,"सारी मित्र, घटनाक्रम को याद करते हुए कुछ अधिक भावुक हो गया था |-
जब चार सौ बीस को कोई आठ सौ चालीस मिल जाए तो जो हाल चार सौ बीस का होता है,
वही दशा मेरी हो गई थी | तेजी से घट रहे घटनाक्रम में मैं अनजाने स्वंय उलझता चला जा
रहा था और मुझे पता भी नहीं चला कि मैं एक ऐसे दलदल में फंस चुका था जहां से निकल
पाना असंभव था |"
            मेरी उत्कंठा फिर से आसमान छूने लगी | सब कुछ तो ठीक चल ही रहा
है तो फिर आखिर ऐसा क्या हुआ कि सतनाम जी जैसे सागर को विचलित होना पड़ गया |
मैं जानना चाहता था मगर सतनाम जी का मूड देख कर कुछ कहने की हिम्मत नहीं जुटा -
पा रहा था | कुछ क्षणों की चुप्पी वर्षों का अन्तराल बन गई | आखिर सतनाम जी अपने
चुप्पी कवच से बाहर निकले | उठ कर बाथ रूम गए मुंह धोकर आये शायद रोकर जी हल्का
करके आए थे | मैं चुप्पी मारे शांत लेटा रहा |
            "सो गए क्या"| उन्होंने पूछा |
            "जी नहीं,सुन रहा हूं |" मैं तुरन्त बोला |
            "ठीक है, फिर सुनों |" कहकर उन्होंने सुनाना प्रारम्भ किया |
            "सूर्यास्त तक स्वागत समारोह चलता रहा मेरा प्रशस्तिगान होता रहा और मैं
मूढमति प्रसन्न होता रहा, धर्मराज और चित्रगुप्त के जाल में फंसता और उलझता चला-
जा रहा था, वह भी स्वेच्छा से | शायद औरों को भी इसी तरह फंसा कर नर्क लाया जाता

                                      - 6 -
 रहा होगा इसका अन्दाज मुझे बाद में हुआ | खैर किस्सा कोताह ये कि सूर्यास्त होते-होते
भीड़ मुझे स्वर्ग के मुख्यद्वार के अन्दर ले गई | एक बार फिर नर्क में स्वेच्छा से जाने का सह-
मतिपत्र मुझसे भरवाया गया | उस पर हस्ताक्षर करने के पलों में मेरी अन्तरात्मा ने एक
बार फिर रोका मगर मुझ मूढमति को अक्ल नहीं आई | सहमतिपत्र लेकर चित्रगुप्त ने अ-
पनी जेब में रखा और मुझे गले लगा कर रूंधे गले से आशीर्वाद दिया," भगवान तुम्हारी -
रक्षा करें |" मैं उनके इस व्यवहार से चकित रह गया | मैं जाति से कायस्थ और चित्र-
गुप्त कायस्थों के आदिपुरूष, शायद जाति और नस्ल एक होने का ख्याल उन्हें अन्दर तक -
भिगो गया था | यह तो मैं अगले दिन समझा कि उनकी आंख में आंसू क्यों थे |"
          "अगले दिन आप के साथ क्या हुआ और आप क्या समझे,कृपया बताएं"
मुझ से रहा नहीं गया तो मैं पूछ ही बैठा |
          "बताता हूं, बताता हूं इतने उद्विग्न क्यों हो अभी तो मेरे पास काफी वक्त है तुमसे
बात करने के लिये |"
          " आप अपनी सुविधा से बताएं",मैंने अपने हथियार डालते हुए कहा |
          "चित्रगुप्त तो सहमति पत्र लेकर चले गए और भीड़ मुझे लगातार अन्दर की ओर
 अवस्थित एक बड़े द्वार की ओर तेजी से लेजाने लगी | आन्तरिक द्वार पर सैनिक -
और लम्बे-चौड़े डरावने अधिकारी जैसे मेरा ही इन्तजार कर रहे थे | द्वार पर पहुंच कर एक
सैनिक से दिखने वाले व्यक्ति ने भीड़ में से निकल कर मेरा हाथ पकड़ कर एक कागज और
 मेरा हाथ द्वार पर खड़े एक अधिकारी के हाथ में दे दिया | अचानद भीड़ पीछे हट गई और
आन्तरिक द्वार के अधिकारियों ने मुझे घेरे में ले लिया और अन्दर की ओर ले जाने लगे | द्वार
खुला तबतक अंधेरा हो चुका था अन्दर शायद बिजली चली गई होगी मैंने सोचा इसीलिए
कुछ नजर नहीं आ रहा है | यह तो मुझे सुबह पता चल पाया कि मेरे साथ कितना बड़ा गेम
खेला जा चुका था |"
              "कैसा गेम, क्या हुआ आपके साथ |" मैं उतावली से बोला |
              "अब आज नहीं आज का समय समाप्त हो गया है | अब चाह कर भी तुम्हे कुछ
बता नहीं पा उंगा | जल्दी ही नर्क प्रशासन से अनुमति मिलते ही तुमसे बात कर पा उंगा |
तब तक के लिए विदा | विदा मेरे मित्र |" मुझे लगा कुर्सी पर बैटी उनकी आकृति धीर-धीरे
 धुंधली होकर गायब हो गई | मुझे अपने जकड़े हुए हाथ पैर भी खुल गए लगे | मैं हड़बड़ा
कर उठ बैठा | मुझे लगा मैं कोई सपना देख रहा था | मगर ऐसा नही था | मेरी छठी इन्द्री
बता रही थी कि मैं जाग रहा था और सतनाम जी से बातें करता रहा था | मैंने उठ कर एक
 ग्लास पानी पिया | आकर बिस्तर पर लेटा | इस बार मुझे सोने में थोड़ा समय लगा | मगर
जब नींद आई तो वह गहरी थी,बहुत गहरी | मुझे लगा मुद्दतों बाद मुझे इतनी गहरी नीं द
आई थी |      
          सतनाम जी से बात किये हुए तीन दिन बीत चुके थे | मुझे विश्वास था कि
आज रात वे अवश्य मुझ से बात करेंगे | उनसे बात करने की उत्कंठा का आलम यह था
कि अभी शाम के छह ही बजे थे मगर मैं बिल्कुल तैयार बैठा था | खाना भी शाम को साढे
पांच बजे ही खा लिया था | पता नहीं कब वे आ जाएं | यही सोच कर मैं आज पलंग पर
भी नहीं लेटा था | मैं चाहता था कुछ नोट्स ले लूं ताकि वक्त जरूरत पर काम आएं | इसी
लिये मैं अपनी लिखने वाली मेज पर नोट बुक कलम आदि रख कर कुर्सी पर सतर्क बैठा -
था | समय काटे नहीं कट रहा था | घड़ी की सुइयों ने मानों सरकना बन्द कर दिया था |
           अभी नौ ही बजे थे मगर मुझे लगा कि शायद पूर्व की भांति ग्यारह बजे -
ही वे आएंगे इस लिये कमर सीधी करली जाए | मैं न चाहते हुए भी उठा और पलंग पर
जा लेटा, लेटते ही लगा पूरा कमरा एक तेज प्रकाश से भर उठा | टेलीफोन की घंटी से -
मिलती जुलती संगीतमय ध्वनि की धीमी आवाज कानों में रस घोलने लगी | एक अजीब
सी मदहोशी मुझ पर छाने लगी | बहुत प्रयास किया कि आंखें खुली रहें मगर सम्भव न
हो सका | धीरे-धीरे आंखें बंद हो गईं | हाथपैर हिलाने की कोशिश की तो हिला न सका |
मैं समझ गया सतनाम जी से मिलने की बेला आ चुकी है | मैंने अपना शरीर ढीला छोड़

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दिया | दो चार मिनट यह स्थिति रही | अचानक स्वर्गिक संगीत बन्द हो गया और सत-
नाम जी की आवाज आई -
           "कैसे हो राज" |
           "प्रणाम मान्यवर, आप ही का इन्तजार कर रहा था, आदरणीय"| मैंने
अपनी उत्कंठा पर काबू रखते हुए जवाब दिया |
           "हालांकि समय ज्यादा नहीं है, इसलिये मैं तुम्हे संक्षेप में तो नहीं मगर
तेजी से बिना रूके आप बीती सुनाने का प्रयास करूंगा | बिना किसी भूमिका के प्रारम्भ -
करता हूं | सुनो"|
           एक ठंडी सांस लेकर उन्होंने प्रारम्भ किया,"मेरे साथ दिया गया कागज -
नर्क के अधिकारियों ने नर्क के आन्तरिक द्वार पर दे दिया | दो मिनट हमें वहां लिखा -
पढी के लिए खड़ा रहना पड़ा और फिर एक स्लिप बना कर एक अधिकारी के हाथ में थमा
दी गई उस अधिकारी ने मुझे गौर से देखा और मेरा हाथ थाम कर बोला आओ | मैने -
महसूस किया कि आन्तरिक द्वार से अन्दर आते ही मुझ से व्यवहारित आदर का भाव -
समाप्त हो चुका था | एक साधारण कैदी से जैसे भारत की जेल में व्यवहार किया जाता है
वही व्यवहार मुझसे प्रारम्भ हो चुका था | मैं कसमसा कर रह गया | कर भी क्या सकता था
 अब तो 'रजिया गुण्डों में फंस ही चुकी थी'| अभी हम नर्क के आन्तरिक भाग में दो-
चार कदम ही बढे होंगे कि पूरा नर्क नियोन ला इटों जैसी रोशनी से जगमगा उठा | मैं एक
नजर में जो चारों ओर देख सका देख कर कलेजा मुंह को आ गया | मैं धर्मराज और चित्र गुप्त
की मीठी चाल में फंस चुका था | शायद कुछ नेताओं ने नर्क जाने में उछल कूद और    बबाल
करने की आदतों को ध्यान में रखते हुए मुझे बड़े लोक भावन तरीके से नर्क भेजा गया था |
खैर अब हो भी क्या सकता था | अब तो यहां की परिस्थितियों से मुझे  स्वंय ही अपने विवेक
से निबटना और निकलना होगा |"    
             
       
           

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