बुधवार, 19 सितंबर 2012


     


       पर्यावरण की हिन्दी गजल
               - राज सक्सेना
मादक-मलय मस्त-मस्त,  मंद-मंद  लिए-
करता काम-केलि,     हिमश्रृंग पर आता है|
शीतल, सहज-शांत,  तन में  सौन्दर्य समा-
बहु - विधि, बादल, बहार, बन  जाता  है|
पानी  नहीं, प्रीत के प्रतीक पंख - पांवड़े -
पूर्णिमा के पुण्य ,  पूर्ण - पथ में बिछाता है|,
दूर कहीं दुंदुभी -  निनाद - संवाद   कर-
प्रेम के प्रसून, प्रेम - पुष्ट   बरसाता   है|
अविरल, अनन्त - अवशेष रह जाय  यह-
क्रम किस भांति, कौन किसका निभाता है|
पर्यावरण परिपूर्ण 'राज',  पूरित हो पूर्व सा-
आज यह दायित्व सब, हम  पर आता है|

 धन वर्षा,हनुमान मन्दिर, खटीमा-262308 (उ०ख०)
मोबा०- 09410718777, 7579289888, 8057320999




          साथ तुम्हारा
                  -राज सक्सेना
रससिक्त छंद कुछ कविता के,
कर रहा समर्पण प्रिय तुमको |
चाहो,  उर मे रख, दुलरा कर,
संरक्षित  कर  लेना  इनको |

यूं तो तुम स्वंय अकल्पित हो,
ऐसा  प्रिय रूप,  तुम्हारा है |
लगता है स्वंय , विधाता  ने,
रच-रच कर तुम्हें  संवारा है |

है अंग सुगढ, हर  सांचे सा,
हर मानक पर है, खरा-खरा |
मधु-सिक्त, साथ में वाणी को,
रख दिया कंठ में, प्रियम्वरा |

हर रोम अलंकृत - प्राकृतिक,
क्या बाह्य,अलंकृत कर पाए |
देखे  जो  एक नजर तुमको,
हतप्रभ-जड़वत सा हो जाए |

हिम-उज्जवल रूप तुम्हारा है,
छूने से,   मैला  हो जाए |
आना धरती पर सार्थक  हो,
सानिध्य तुम्हारा मिल पाए |

 धन वर्षा,हनुमान मन्दिर, खटीमा-262308 (उ०ख०)
मोबा०- 09410718777, 7579289888, 8057320999

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