रविवार, 16 सितंबर 2012

रोष नहीं क्या ?


 रोष नहीं क्या ?
       - राज सक्सेना
रूठ  गई  बरसात  पुनः  फिर,
इसमें सबका दोष नहीं  क्या ?
रीत गया है बादल या फिर-
उसमें जल का कोष नहीं क्या ?

सागर ने कर दिया बन्द क्या-
ऋण देना अब बादल को ?,
या धरती से स्नेह - भाव  में-
पहले सा परितोष नहीं  क्या ?

नदियां  हैं , बीमार   सरीखी-
सभी छरहरी , कुम्हलाई  सी ?
कड़े ताप में,  मानो    उनको-
तनमन का भी होश नहीं क्या ?

पर्यावरण   रौंद   कर    हमने -
वातावरण   बदल  सब  डाला,
चेत जांय जिससे जगकर सब-
सबल-सहज अनुघोष नहीं क्या ?

वस्त्र - हीन कर दिया धरा को-
'आत्म- केन्द्रित  बौनेपन'  ने,
'आज' गया तो गया 'राज' पर-
'कल' जाने का रोष नहीं क्या ?

 सम्पर्क-धनवर्षा,हनुमान मन्दिर,खटीमा-262308 (उ.ख.)
मोबा.- 9410718777,  7579289888,  8057320999
email- raajsaksena@gmail.com


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