बुधवार, 22 अगस्त 2012

देह सुनेहरी,स्वर्गिक-सरगम -डा.राज सक्सेना देह सुनेहरी,स्वर्गिक-सरगम | होंठ रसीले, रस - छंदों से | रक्त-वर्ण, मधुरिम कंदों से | दिप-दिप दमकें दंत धवल ये,- शुभ्र हिमालय के, शिखरों से | चन्दन-वन ले आई जैसे, सांस तुम्हारी मद्धम-मद्धम | नहीं ठहरती, एक जगह ये | चितवन लगती तितली जैसे | कांप - कांप उठती है धरती -, अन - जाने, आंचल के ढलते | आननअंकित स्वेदबिन्दु कुछ, हीरकतल पर लगते शबनम | कटि अतिक्षींण स्वांस गरमाए | देह-धरातल , मन पिघलाए | गति मधुमय गजगामिनि तेरी, पग-पग पर पायल बन जाए | आमंत्रण प्रेषित करती है -, मधुशाला सी मोहक अनु


         देह सुनेहरी,स्वर्गिक-सरगम
                          -डा.राज सक्सेना
          देह सुनेहरी,स्वर्गिक-सरगम |
होंठ  रसीले, रस - छंदों  से |
रक्त-वर्ण, मधुरिम  कंदों  से |
दिप-दिप दमकें दंत धवल ये,-
शुभ्र हिमालय के, शिखरों से |
                चन्दन-वन ले  आई  जैसे,
         सांस तुम्हारी मद्धम-मद्धम |
नहीं  ठहरती,  एक जगह  ये |
चितवन लगती तितली  जैसे |
कांप - कांप उठती है  धरती -,
अन - जाने, आंचल के ढलते |
                आननअंकित स्वेदबिन्दु कुछ,
         हीरकतल पर लगते शबनम |
कटि अतिक्षींण स्वांस गरमाए |
देह-धरातल , मन   पिघलाए |
गति मधुमय गजगामिनि तेरी,
पग-पग पर पायल बन जाए |
                आमंत्रण  प्रेषित  करती है -,
         मधुशाला सी मोहक अनुपम |

सम्पर्क- धनवर्षा,हनुमानमन्दिर,खटीमा-262308(उ.ख.)
   दूरसम्पर्क- 9410718777, 8057320999    
     email- raajsaksena@gmail.com

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