बुधवार, 29 अगस्त 2012

अज्ञेय-उत्तराखण्ड परिप्रेक्ष्य में


          अज्ञेय-उत्तराखण्ड परिप्रेक्ष्य में
                          -डा.राज सक्सेना
              यूं तो उत्तराखण्ड (नगाधिराज हिमालय) पर महाकवि कालिदास से लेकर
उत्तराखण्ड के ही चित्रकार-कवि मौला राम, लोकरत्न पंत'गुमानी',महादेवी वर्मा और सुमित्रा
नन्दन पंत सरीखे काव्यमर्मज्ञों ने बहुत कुछ लिखा है | यहां तक कि उर्दू के सुप्रसिद्ध
शायर अल्लामा इकबाल तक ने भी हिमालय स्तुति की है | उन्हें भी कहना पड़ा-
           ऐ  फ़सील - ए - किश्वर -ए- हिन्दोस्तां,
           चूमता है तेरी पेशानी को झुक  के आस्मां |
                   मगर प्रयोगवाद के पोषक और समर्थक कविवर अज्ञेय ने जो अपनी -
उत्तराखण्ड पर 'नन्दा देवी' शीषर्क से हिमालय को प्रतीक मान कर उत्तराखण्ड पर कहा
है वह एक इतिहास बन गया है | उपरोक्त सन्दर्भित कवियों और अन्य कवियों ने भी
जिनका ऊपर सन्दर्भ नहीं है ने भी हिमालय व उत्तराखण्ड के विभिन्न अंगों-प्रसंगों पर
बहुत कुछ लिखा है किन्तु वास्तविकता यह है कि 'अज्ञेय' ने अपनी प्रसिद्धि के अनु-
रूप उत्तराखण्ड के सन्दर्भ में हिमालय को प्रतीक रूप देकर जो लिखा वह न केवल -
अनूठा है अपितु सटीक और सार्थक भी है |
                  हिमालय की पर्वत श्रंखला की सबसे ऊंची भारतीय चोटियों में से एक
नन्दा-सुनन्दा श्रंखला का अपना एक अलग सौन्दर्य तो ही, इसका अपना एक महत्व
भी है | वस्तुतः नन्दादेवी उत्तराखण्ड और उसकी अपनी संस्कृति का जीवन्त उदाहरण
है | 'अज्ञेय' ने अपने उपनाम को सार्थक करते हुए जो भगीरथ प्रयत्न इन छोटी-
छोटी १५ कविताओं के माध्यम से किया है, वह प्रयोगवादी कविता के एक सुन्दरतम
उदाहरण के रूप में तो उभरता ही है, कथ्य-अकथ्य सभी कुछ, उत्तराखण्ड के संदर्भ
में कह जाता है | देखा जाय तो कवि ने इन कविताओं के माध्यम से उत्तराखण्ड की
पीड़ा और भविष्य को जग जाहिर करने की सार्थक पहल भी की है |
                अज्ञेय स्वंय में एक विवादित व्यक्तित्व का नाम है | निःसन्देह प्रतिभा
के धनी सच्चिदानन्द हीरानन्द वात्स्यायन 'अज्ञेय' अपने नाम के अनुरूप ही विराट
व्यक्तित्व के स्वामी थे |07 मार्च 1911 को उत्तर प्रदेश के देवरिया जिले के कुशीनगर
नामक ऐतिहासिक स्थान पर जन्मे अज्ञेय ने अपने जन्म स्थान के ही अनुरूप इति-
हास में अपना नाम हिन्दी साहित्य के स्वर्णाक्षर के रूप में दर्ज कराया | असामान्य
प्रतिभा सम्पन्न कवि,कथाकार,पत्रकार,ललित निबन्धकार,सम्पादक और सफल  -
अध्यापक के रूप में उन्होंने अपनी प्रतिभा का जो प्रर्दशन किया वह सामान्यतः अनु-
पलब्ध ही होता है | लखनऊ,कश्मीर,बिहार और मद्रास में बचपन बीता | बी.एस.
सी. करके अंग्रेजी में एम.ए. करने का अनोखा निर्णय लेकर आपने अपने विवादा-
स्पद व्यक्तित्व की झलक का प्रदर्शन कर दिया | इसी समय क्रान्तिकारी आंदोलन से
जुड़े और फरार हो गए | 1930 में पकड़ भी लिए गए | जापानी कविता हायकू  के
अनेक हायकू अनूदित कर हिन्दी साहित्य को एक नई दिशा दी | आज, शायद जि-
तने हायकू जापान में लिखे गए हों, उससे अधिक हिन्दी में लिखे जा चुके हैं |                                    
                 अज्ञेय नई कविता और प्रयोगवाद को हिन्दी साहित्य में सजाने और-
प्रतिष्ठित कराने वाले कवि हैं | वे केवल साहित्यकार ही नहीं थे, सत्यान्वेषी पर्यटक
और छिद्रान्वेषी फोटोकार भी थे | अज्ञेय ने युगान्तरकारी काव्य संकलन,'तार-सप्तक',
'दूसरा तार-सप्तक'और 'तीसरा तार-सप्तक' हिन्दी साहित्य की श्री वृद्धि के लिए प्र-
स्तुत किए | इसी की अगली कड़ी 'चौथा तार सप्तक' में देहरादून के कवि अवधेश -
कुमार नेगी ने भी स्थान पाकर उत्तराखण्ड का नाम साहित्य पटल पर रखा |
                 यदि सही अर्थों में सन्दर्भ लिया जाय तो यह अतिशयोक्ति नहीं होगी
कि हिन्दी साहित्य में एक युग परिवर्तन भारतेन्दु हरिश्चन्द्र ने किया तो दूसरा आधु-
निक युग परिवर्तन अज्ञेय के करकमलों से हुआ | मात्र परिवर्तन ही नहीं, इसे हम
दिशा परिवर्तन भी कह सकते हैं | जिसने हिन्दी साहित्य में प्रयोगवाद, हायकू और
नव कविता को न केवल प्रतिष्ठ्त ही किया, उन्हें हिन्दी साहित्य में एक अलग  -
                           - 2 -
स्थान भी प्राप्त हुआ |
                 मैथिली शरण गुप्त के सन्दर्भ में अज्ञेय ने कवि के विषय में एक -
साक्षात्कार में कहा था,"महान कवि की पहचान के लिए जो कसौटियां मैं रखता हूं,
मैं मानता हूं कि उसको बहुत लिखने वाला होना चाहिए | जिसने बीस-पचास कवि-
ताएं लिख दीं, सभी  अच्छी और निर्दोष, इससे कोई महान कवि नहीं हो जाता |
मात्रा की दृष्टि से मैं समझता हूं कि उन्होंने (मैथिली शरण गुप्त) बहुत लिखा | एक
कसौटी तो यह होती है प्रतिभा की, उसमें सब अच्छा नहीं हो, लेकिन निरी मात्रा -
का भी एक महत्व मैं मानता हूं ------ |"
               उत्तराखण्ड में अज्ञेय ने कुछ काल 'भीमताल' के निकट प्रवास किया,
कहा तो यह जाता है कि उन्होंने स्थायी रूप से रहने के लिए ही वह भवन क्रय -
किया था | वास्तविकता क्या है भगवान जाने | यद्दपि अज्ञेय ने उत्तराखण्ड के सं-
दर्भ में कुछ अधिक नहीं लिखा है | किन्तु मात्र 'नन्दा देवी' शीर्षक से ही रची गईं
१५ कविताएं सन्दर्भ के प्रसंग में'गागर में सागर'का प्रस्तुतिकरण करने में सक्षम हैं |
              "कविता को कवि का परम वक्तव्य" बताने वाले अज्ञेय ने अपने इस -
कथन की प्रामाणिकता 'नन्दा देवी' में प्रस्तुत करदी है | प्रणय को जीवन की सर्वो-
च्च उपलब्धि मानने वाले अज्ञेय मानव देह की सार्थकता'प्यार पाने और देने में मानते
हैं | अज्ञेय की कविताओं का मानव ऐसा सत्यान्वेषी मानव है जो इयत्ता और अस्मिता
का दीप लिए जीवन पथ पर आगे बढता है | स्नेह भरा प्राण दीप अकेला ही जगम-
गाता है | व्यष्टि और समष्टि के सम्बन्ध को,"नदी के द्वीप" और "यह दीप अकेला"
में उन्होंने स्पष्ट किया है |
              प्रकृति सृष्टि का वह अनन्त विस्तार है जिसकी ओर स्वतः ही मानव -
उन्मुख होता है | यदि परीक्षण करें तो अज्ञेय की कविताओं में प्रकृति के तीन रूप
प्रकट होते हैं | पहला-दर्शनाभिव्यक्ति, दूसरा उद्दीपक स्वरूप और तीसरा-सौन्दर्यपरक
प्रेमाभिव्यक्ति हेतु मानवी रूप |'अहं' के बन्धन से निकल कर'मैं' आत्मारूप में
सर्वव्याप्त हो जाता है | 'सत्य' का अनुसंधान कवि जीवन की गहराइयों में डूब कर
पकड़ने के लिए सागर और मछली के'बिम्ब'दोहराता है | विवाह के रूपक में विराट
और जीवात्मा का सम्बन्ध'चक्रान्त शिला'में प्रकट करता है | हेमन्त का गीत में
'काल' का'काल के कबाड़ी' के रूप में रूपात्मक प्रयोग करता है |
            अज्ञेय की कविताओं में संध्या और रात्रि के बीच सायुज्य सम्बन्ध है |
'नन्दा देवी' में भी ऐसे बिम्बों का बाहुल्य है | प्रतीक उनकी कविताओं में प्रखर -
हो उठे हैं | उनके प्रतीक अपने साथ स्तर के एकाधि अर्थ लिए रहते हैं | मछली -
सागर,द्वीप,दीप,काक,पत्र,चिड़िया, औंधाखोखल,रेत,नदी आदि शब्द उनकी कविताओं
को विशिष्ट अर्थ और गरिमा प्रदान करते चलते हैं | वैदिक प्रतीकों का भी प्रयोग  -
अज्ञेय की कविताओं में मिलता है |
          " सा काष्टा सा परागति ....."
          अज्ञेय शब्द - स्रष्टा और शब्द-साधक कवि हैं | वे तदभव, तत्सम, -
देशी-विदेशी, लोक शब्दावली, वैज्ञानिक शब्दावली जैसी मानव निर्मित सीमाओं की -
खींची गई परिधियों से हट कर ही इनका सम्विद और सार्थक प्रयोग करने में सफल
रहे हैं | इसके बावजूद वे अनाभिव्यक्ति को अभिव्यक्त न कर पाने की पीड़ा की अनु-
भूति से ग्रसित रहते हैं | वस्तुतः अज्ञेय की कविता 'मौन' की अनुभवि और  -
'शब्दों के बीच की नीरवताओं' में भी अनवरत बही है,बहती रही है |
                'नन्दा देवी' का सन्दर्भ वस्तुतः उत्तराखण्ड चित्रण का जीवन्त प्रमाण
है | उत्तराखण्ड का प्रकृति चित्रण, उत्तराखण्ड का प्रकृति दोहण, उत्तराखण्ड के पर्या-
वरण का प्रदूषण और असन्तुलन, अभाव और पीड़ा, अव्यक्त विवशता,जिन्दगी का
यथार्थ, मन की चंचलता, पर्वतीय बाला की विरह वेदना,भविष्यदृष्य और चित्रण-
अनूठे प्रतीक, कठिन पर्वतीय जीवन शैली, मस्त और संगीतमय जीवन, मिलन
और विरह, अनुपम प्रकृति और सौन्दर्य के साथ दर्शन का वर्णन, अनूठा जीवन -
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दर्शन, जीवन के हर पक्ष का सार्थक दर्शन रूप और इन्हीं सब के बीच उनकी अ-
पनी मनःस्थिति और उसका जीवन्त वर्णन इन कविताओं में स्पष्ट झलकता है |
             नन्दा देवी की प्रथम कविता में ही प्रकृति चित्रण का अनूठा रूप
अज्ञेय की मानसिकता के अनुरूप प्रकट होता है -
                 ऊपर तुम, नन्दा,
                नीचे तरु-रेखा से
               मिलती हरियाली पर
               बिखरे रेवड़ को
               दुलार से टेरती सी
               गड़रिये की बांसुरी की तान ;
             इससे आगे वे चित्रण के साथ पर्यावरण की घातक स्थिति तक -
पहुंचते हैं -
                और भी नीचे
               क़ट गिरे वन की चिरी पट्टियों के बीच से
               नए खनि-यंत्र की
               भट्टी से उठे धुंए का फन्दा
               नदी की घेरती-सी वत्सल कुहनी के मोड़ में
               सिहरते-लहरते शिशु धान |
               चलता ही जाता है यह
               अन्तहीन, अनसुलझ
               गोरख धन्धा |
               दूर, ऊपर तुम, नन्दा !
                     इससे सुन्दर और सजीव पर्वतीय सौन्दर्य, जीवन शैली,प्रकृति -
चित्रण,संगीत प्रेम और वन सम्पदा का दोहण तथा दार्शनिक अन्दाज क्या हो सकता है |
             पर्वतीय समाज की पीड़ा और अभाव का सजीव चित्रण उनकी'नन्दा-
देवी-२' कविता में झलकता है -
                वहां दूर शहर में
               बड़ी भारी सरकार है
               कल की समृद्धि की योजना का
               फैला कारोबार है,
                 और यहां
               छोटी से छोटी चीज की दरकार है,
                 आज की भूख-बेबसी की
               बेमुरव्वत मार है |
             आगे वे पर्वतवासियों की अव्यक्त पीड़ा को साकार करते हैं-
                 कल के लिए हमें
               नाज का वायदा है -
                आज ठेकेदार को पेड़ काट लेजाने दो;
                कल हाकिम
               भेड़ों के आयात की
               योजना सुनाने आवेंगे -
                आज बच्चों को
               भूखा ही सो जाने दो |
             आगे अज्ञेय पर्यावरण और जिन्दगी के यथार्थ का सजीव चित्रण -
करते मिलते हैं-
                 जहां तक दीठ जाती है
               फैली हैं नंगी तलैटिया -
                                   - 4 -
                 एक-एक कर सूख गए हैं
               नाले, नौले और सोते |
               कुछ भूख, कुछ अज्ञान, कुछ लोभ में
               अपनी सम्पदा हम रहे हैं खोते |
               जिन्दगी में जो रहा नहीं
               याद उसकी
               बिसूरते लोक-गीतों में
               कहां तक रहेंगे संजोते !
             'नन्दा देवी' की तीसरी कविता में दर्शन है, मन की चंचलता का
चित्रण है -      
                 तुम
               वहां हो
               मन्दिर तुम्हारा
               यहां है |
                और हम -
                हमारे हाथ, हमारी सुमिरनी-
                यहां है-
                और हमारा मन
               वह कहां है ?
         इसी क्रम में  कविता में पर्वतीय बाला के विरह का दारूण चित्रण
करने में अज्ञेय सर्वथा सफल रहे हैं | इस कविता में उन्होंने अव्यक्त भाव से दर्शन
का भी समावेश और प्रकृति चित्रण का अंश प्रस्तुत करने में महारत प्रकट की है -
           वह दूर
          शिखर
          यह सम्मुख
          सरसी
          वहां दल के दल बादल
          यहां सिहरते
          कमल
          वह तुम | मैं
          यह मैं | तुम
          यह
          एक मेघ की बढती लेखा
          आप्त सकल अनुराग,व्यक्त ;
          वह
          हटती धुंधलाती क्षिति-रेखा;
          सन्धि-सन्धि में बसा
          विकल निःसीम विरह |
         'नन्दा देवी' की पांचवी कविता तो मानों सम्पूर्ण उत्तराखण्ड का जीवन -
दर्शन और उसकी सजीव झांकी है-
           समस्या
          बूढी हडिडयों की नहीं
          बूढे स्नायु - जाल की है |
          हडिड्यां चटक जाएं तो जाएं
          मगर चलते-चलते ;
           देह जब गिरे तो गिरे
          अपनी गति से
                           - 5 -
          भीतर ही भीतर गलते-गलते |
          कैसे यह स्नायु-जाल उसे चलाता जाए
          आयु के पल-पल ढलते-ढलते |
          तुम्ही पर,तुम्ही पर,तुम्ही पर
          टिके रहें थिर नयन-आत्मा के दिये-
         अन्त तक जलते-जलते |
         छठी कविता में तो मानो अज्ञेय ने उत्तराखण्ड के दोहण का सजीव चित्रण
करते हुए उत्तराखण्ड के भविष्य की झांकी का चित्रण ही कर दिया है |वे कहते हैं-
           नन्दा
          बीस-तीस-पचास वर्षों में
          तुम्हारी वन-राजियों की लुगदी बना कर
          हम उस पर
          अखबार छाप चुके होंगे
          -----------
            नन्दा
           जल्दी ही-
           बीस-तीस-पचास वर्षों में
          हम तुम्हारे नीचे एक मरू बिछा चुके होंगे
          और तुम्हारे उस नदी-धौत सीढी वाले मन्दिर में
          जला करेगा
          एक मरू दीप !
         दृश्यचित्रण की अनुपम क्षमता और सटीक प्रतीक का चुनाव अज्ञेय की अपनी
एक अलग विशेषता रही है | उत्तराखण्ड में पेड़ों के तनों पर चारों और पुआल के गट्ठर
बांध कर उन्हें गोलाकार बांध दिया जाता है ताकि जब हरियाली खत्म हो जाए तो इस -
पुआल को जानवरों को खिलाया जा सके | यह पुआल ऊपर से तने से बंधा होता है |
कवि की कल्पना और सटीक प्रतीक के रूप में घाघरे(लंहगे) का चयन अनुपम है |
                सातवीं कविता कठिन महिला जीवन और अंत में जीवन दर्शन को भी  -
प्रकट करती है-
           पुआल के घेरदार घाघरे
          झूल गए पेड़ों पर |
          वन-कन्यायें
          पैर साध मेड़ों पर |
                  चला चल डगर पर |
                  नन्दा को निहारते |.......
                  .............
          एक सुख है सब बांटने में
          एक सुख सब जुगोने में,
           जहां दोनों एक हो जांए
          एक सुख है वहां होने में
          चला चल डगर पर
          नन्दा को निहारते |
          आठ्वीं कविता प्रतीकों के माध्यम से पूर्ण दर्शन है | इसी प्रकार नवीं -
कविता भी दर्शन  ही है -    
          कितनी जल्दी
           तुम उझकीं
           झिझकीं
           ओट हो गई नन्दा |
                             - 6 -
         उतने ही में बीन ले गईं
          धूप-कुन्दन की
          अन्तिम कनिका ......
         फिर तन गई
          धुन्ध की झीनी यवनिका |
         दसवीं कविता का अर्द्धभाग पर्वतीय प्रकृति और पर्वतीय परिवेश का उप-
मेय चित्रण है | जिसे आगे चल कर कवि ने अपनी मनःस्थिति और दर्शन से जोड़
दिया है | कविता का उत्तरार्द्ध -
        जहां भी दोराहा आता है
         मैं दोनों पर चलता हूं |
        सभी जानते हैं कि यों
         मैं चरम वरण को टालता
         और अपने को छलता हूं |
        पर कोई यह तो बताए
         कि क्या कवि
         वही नहीं है जिसे पता है
         कि मैं ही वह वनानल हूं
         जिससे मैं ही
         अनुपल जलता हूं |
        ऐसा होगा तो
         कि फिर मिल जाएंगी दोनों राहें !
          ...............
          प्रपात की धार सा
         एक ही गुंजार करता
         अद्वैत
         बहेगा ?
          'नन्दा देवी' की ग्यारहवीं कविता तो प्रकृति चित्रण में दर्शन की एकात्मता
का अनूठा मिश्रण है -  
         कमल / खिला / दो कुमुद / मुंदे / नाल / लहराई / सिहरती / झील/
गहरायी / कुहासा / घिर गया |
              हंस ने / डैने / कुरेदे / ग्रीवा झुला / पल भर को / निहारा / विलगता/
फिर / तिर गया |
              इसी प्रकार बारहवीं और तेरहवीं कविता भी प्रकृति चित्रण एंव प्रतीकों के  -
माध्यम से जीवन दर्शन है |
                      'नन्दा देवी' चौदहवीं कविता में विशुद्ध भारतीय दर्शन का प्रतीक बन-
जाती है -
             निचले
            हर शिखर पर
            देवल ;
            ऊपर
           निराकर
           तुम
           केवल ......
          अन्तिम और पन्द्रहवीं कविता में अज्ञेय जीवन दर्शन के साथ नन्दा देवी
को उत्तराखण्ड के गौरव का प्रतीक मानते हैं | अपने मन्थन और नन्दा देवी से एकात्म
इस कविता की विशेषता है | उत्तराखण्ड वस्तुतः नन्दा देवी के बिना अधूरा है,निष्क्रिय
है, शीशविहीन है | शब्दों का चयन प्रतीकों का रूप और दर्शन उत्तराखण्ड के परि-प्रेक्ष्य
                            - 7 -
में अलौकिक है -
           रात में
          मेरे भीतर सागर उमड़ा
          और बोला ;
           तुम कौन हो ? तुम क्यों समझते हो
          कि तुम हो ?
           देखो, मैं हूं, मैं हूं,
           केवल मैं हूं ......
           मैं खो गया
          सागर उमड़ता रहा
          उसकी उमड़न में दबा
          मैं सो गया
          सोता रहा
          और सागर
          होता रहा, होता रहा, होता रहा.......
           भोर में
          जब पहली किरन ने नन्दा का भाल छुआ,
           तो नन्दा ने कहा ; यह देखो, मैं हूं ;
           मैं तो
          तुम्हारे भीतर कभी सोयी नहीं हूं |
           तुम न खोजो, पर मैं कभी खोयी नहीं हूं |
           मैं हूं तो
          तुम्हारा माथा
          कभी भी नीचा क्यों होगा ?
         तब किरण ने मुझे भी छुआ ;
         मैं हुआ |
                    मात्र 'नन्दा देवी' की पन्द्रह कविताओं में 'अज्ञेय' ने पूरा उत्तराखण्ड -
पाठकों के सम्मुख सजीव कर दिया, उसका सौन्दर्य, उसकी विशिष्टताएं, उसकी सम्वे-
दनाएं, उसकी वेदनाएं, प्रदूषण, भविष्य और गौरव का इतना प्रखर व सटीक वर्णन-
प्रदर्शन सब कुछ गागर में सागर का प्रतीक बन जाता है | यही तो थी 'अज्ञेय' की
विशेषता और शब्दों तथा प्रतीकों के चयन में विशिष्टता |

   सम्पर्क- धनवर्षा,हनुमानमन्दिर,खटीमा-262308(उ.ख.)
सचल-09410718777, 07579289888, 08057320999    
     email- raajsaksena@gmail.com

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