रविवार, 10 जून 2012

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 विज्ञान-कुण्डलियां
गाड़ी पर उल्टा लिखा, एम्बुलेंस क्यों मित्र |
आगे  गाड़ी जा रही, मिले मिरर को चित्र |
मिले मिरर को चित्र, सदा   उल्टा आएगा ,
सीधा लिख दें अगर,  पढा   कैसे जाएगा |
कहे'राजकविराय',  इसी से उल्टा लिखते,
बैकव्यु मिरर में देख, उसे हम सीधा पढते |









 64      
जले बल्ब स्विचआन से,ट्यूब लगाये देर |
पप्पू के मस्तिष्क में,घूम रहा  यह फेर |
घूम रहा यह फेर, सुनो पप्पू   विज्ञानी,
ट्यूब बिजली के मध्य चोक,स्टार्टर ज्ञानी |
कहे'राजकविराय',पहुंचती जब दोनों  में,
लेती थोड़ी देर , इसी से वह उठने  में |










 65        
पप्पू मारे हाथ, समझ में कुछ न आता |
क्यों आता है ज्वार,और क्यों आता भाटा |
और् क्यों आता भाटा,लहर यूं बनती क्यों है,
ऊंची उठती लहर,पुनः फिर गिरती क्यों है |
कहे'राज' जब गुरुत्वचन्दा ज्यादा हो जाता,
इसी वजह से नित्य,ज्वार और भाटा आता |












66
         
पप्पू फ्रिज जब खोलता,फ्रीजर ऊपर होय |
सब में ऊपर देखकर,सिर धुनना ही होय |
सिरधुनना ही होय,खेल ये समझ नआया ,
फ्रीजर ऊपर बना रहा है,हर फ्रिज  वाला |
कहे'राज'हवा गर्म, नीचे से ऊपर उठती,
ऊपर फ्रीजर से टकराकर, ठंडी हो  जल्दी |










67
         
पृथ्वी अपने अक्ष पर, झुक साढे  तेईस |
करती है वह परिक्रमा,गिन कर पूरी तीस |
गिनकर पूरी तीस,ऋतु बदले सूर्य किरन से,
मध्य, मकर, कर्क रेखा पर चाल बदल के |
कहे'राजकविराय', गर्म-ठंडी या तम देखो,
सीधी पड़ती गर्म , नही तो ठंडा क्रम देखो |













        68  
गरम करो जब दूध को,उफन सिरे से जाय |
पानी जितना भी करो, ना उफने जल जाय |
ना उफने जल जाय, भेद यह समझ नआया,
पप्पू ने पापा को, अपना यह प्रश्न  बताया |
कहे'राज'दूध में जमती परत भाप न निकले,
अन्दर भभके  भाप, दूध संग लेकर उफने |


अब भारत है तुम्हें  बचाना


अपनों से लुटपिट कर हम तो,
नही लिख सके नया फसाना |
भारत  की   समृद्द     संस्कृति,
बच्चो अब    है तुम्हें बचाना ||

मची   हुई   है खुली  लूट जो,
कैसे  उस  पर  रोक लगेगी |
बापू   ने    जो सपना    देखा,
वैसी   दुनिया   कभी मिलेगी ?
117
सत्य, अहिंसा, प्रेम देश में,-
सिर्फ तुम्हारे जिम्मे लाना |
भारत  की समृद्द संस्कृति,
बच्चो अब है तुम्हें बचाना |

सिर्फ  लंगोटी  जैसी   धोती,
मन में लेकर स्वप्न सुहाना |
बुनना   चाहा  था  बापू   ने,
इस    भारत का ताना-बाना |

बापू    के   सारे सपने अब,-
खींच धरा पर तुमने लाना |
भारत की    समृद्द संस्कृति,
बच्चो अब है तुम्हें बचाना |
118
भारत मां के लाज वस्त्र तक,
लूट रहे हैं   मिल कर सारे |
हाथ बांध      हम देख रहे हैं,
इनके हर   करतब टकियारे |

चट  करने की  ना है सीमा ,
खाते हैं पशु  तक का दाना |
भारत की   समृद्द - संस्कृति,
बच्चो अब   है तुम्हें बचाना |


   मानव सेवा
मानव सेवा में निज मन को,
हर समय सदा तैयार रखो |
तन और किसी के काम आये,
यह सोच सदा हर बार रखो |

जीवन है चन्द  बहारों का,-
इन चन्द बहारों को लेकर  |
आनन्द उठाओ जीने  का,
हर घड़ी समर्पण से जीकर |

हर पल हर सेवा में तत्पर,
तन,मन,धन,परिवार करो |
मानव सेवा में निज मन को,
हर समय सदा तैयार रखो |
120
कुछ जीते जीवन बदतर सा,
इनको तुम जीना सिखलाओ |
जो नर्क   भोगते    जीवन में,
एक झलक स्वर्ग की दिखलाओ |

जो दीन दुखी हैं सड़कों पर,
उनका भी तुम सत्कार  करो |
मानव सेवा में निज मन को,
हर समय सदा तैयार रखो |



  अप्रैल फूल बनाया
चतुर्थ मास के प्रथम दिवस को,
उल्लू     के    मन   आया |
रहे  बनाते   उल्लू     हमको,
दिवस      हमारा     आया |

मैं भी आज    स्वंय  सरीखा,
उल्लू        इन्हें    बनाऊं |
अपने    मोबा इल से  झूठे,
कुछ       मैसेज  भिजवाऊं |
124
भैंस वती को  'मैसेज'   भेजा,
ब्युटी  पार्लर         जाओ |
क्रीम  बनाई एक    उन्होंने,
गोरी     तुम   हो   आओ |

गधे राम को   भेजा 'मैसेज',
सुन्दर - वन   में    जाओ |
वहां  जमी  है अक्लघास एक,
चर कर      अक्ल  बढाओ |

'मैसेज  भेजा चूहे   जी को,
लोमड़  -  वैद्य     पटाओ |
सिंह - राज जो खाते  गोली,
खाकर   कैट       भगाओ |
125
बिल्ली   को  भेजा 'संदेसा',
'बन्दर्-मुनि' पर    जाओ |
सम्मोहन का मंत्र सीख कर ,
मोटे - रैट        पटाओ |

भेज  संदेशे   उल्लू - राजा,
मन ही मन       इतराये |
सन्देशे   सब   भेजे    समझे,
सैण्ड बटन को   बिना दबाये |



 सफलता-सूत्र
नन्हे  बच्चे  सा भोलापन,
लेकर तुम मनके आंगन में |
रस वर्षा ओस समान करो,
इस धराधाम के  प्रागंण में |

रख कोमलमन कछुए जैसा,
ऊपर से सदा  कठोर रहो |
गतिमान रहो मछली जैसे,
साहस में बाघ समान रहो | |

सागर से सीखो आत्मसात,
भरपूर हलाहल पी जाना |
बदले में  मोती और   वर्षा ,
अनवरत सभी पर बरसाना |

फैलो तो गगन सरीखे हो-,
पूरी धरती को ढक डालो |
जो मिले तुरत प्रतिदान करो,
अमृत की वर्षा कर डालो |

सेवा निःस्वार्थ पवन से लो,
अविराम रहे  जो सेवा में |
रख सोच यही अपने मन में,
लगजाओ सततजनसेवा में |

बांटो जग भर को प्रकाश ,
दीपक से भाव जगाओ तुम |
निर्लिप्त भाव से उजियारा,
सारे जग पर बरसाओ तुम |

धरती से ले लो वीत-राग,
दुःखदर्द सहन करके जीना |
मिलते हों दर्द अगर कोई,
हंसते - हंसते   आंसू  पीना |

झरने से सीखो सुख-वर्षा,
बरसो नित पूरी धरती में |
दुख भरी अगर आएं घड़ियां,
उनमें भी नाचो मस्ती में |

चन्दा से लेकर शीतलता ,
भावों में अपने भर डालो |
तारों से सीखो अविचलता,
दृढ रहो जो निश्चय कर डालो |

वृक्षों   से   बनो   उदारमना,
मारें पत्थर तुम फल दे दो |
तपती दोपहरी आए पथिक,
छाया उसको   शीतल दे दो |

कोयल समान    मीठी बोली,
अविरल बहने दो   वाणी में |
श्वानों से स्वामिभक्ति लेकर,
भर दो जग के हर प्राणी में |

ये  मंत्र  सफलता  पाने   के,
जीवन   में जो    अपनाएगा |
निर्लिप्त  सुखी और सद्-जीवन,
वह  अपना  सदा  बिताएगा |



6
                                             

समीक्षा बाल गंगा
‘बाल गंगा‘ डाॅ० राज सक्सेना द्वारा रचित बाल गीतों का संकलन है

जिसके समर्पण  में सक्सेना जी ने लिखा है-
बाल गंगा का समर्पण आपको श्रीमान है,
है    नहीं    संजाल    शब्दों    का,
हृदय        का       गान      है।
बालपन में लौटकर जो कुछ स्वयं अनुभव किया,
भाव वह मैंने सशक्त हर समर्पण कर दिया।
बालगंगा में लगभग 110 बालगीत संग्रहीत हैं। निश्चय ही यह रचनाएंे
उन्हीं अनुभवों को आधार बनाकर लिखी गई हैं जिसे हर आदमी ने
अपने बचपन में कभी न कभी जिया है। इन बाल गीतों में बचपन के
 अनेक रंग हैं। हर बच्चे को स्कूल जाने का झंझट परेशान करता है।
 सक्सेना जी ने लिखा है-
‘सूरज तुम क्यों रोज निकलते
छुट्टी  कभी नहीं  क्यों  जाते
भोर  हुई  माँ चिल्ला  उठती
उठ  बेटा  सूरज  उग आया
आँखें  खोलो झप-झप जातीं
सिकुड सिमट अलसाती काया‘
अपने घर को देखकर हर किसी ने बचपन में सोचा होगा कितना अच्छा
होता कि घर में पहिए लगे होते जहाँ मन चाहा उठा ले जाते-
‘माँ पहिए लगवाले घर में
सचल  भवन  हो जाएगा
पापा रखलें एक ड्राडवर
जो  हर  जगह घुमाएगा‘
पुराने नाते नए विचारों के साथ कैसा अनूठा प्रयोग है-
कैसा मामा, किसका मामा
चंदा लगता किसका मामा
×××××××××××××××
कभी नहीं बाजार घुमाया
कभी नहीं पिज्जा खिलवाया
न बन्दर की खों-खों करके
जब रोते हम कभी हंसाया′
मगर इन गीतों में केवल मनोंरजन ही नहीं है बल्कि इनमें ज्ञान विज्ञान
 के भंडार को बड़ी सहजता से प्रस्तुत किया गया है जिसे बच्चे बड़ी
 आसानी से ग्रहण कर सकते हैं। विज्ञान कुंडलियाँ इनका श्रेष्ठ उदाहरण हैं-
′गाड़ी पर उल्टा लिखा एम्बुलैंस क्यों मित्र
आगे गाड़ी जा रही मिले मिरर को चित्र
मिले मिरर को चित्र सदा उल्टा आएगा
सीधा लिख दे अगर पढ़ा कैसे जाएगा
कहें ‘राज कविराय‘ इसी से उल्टा लिखते
वैकव्यु मिरर में देख उसे हम सीधा पढ़ते′
डाॅ० राज की विज्ञान कुंडलियाँ उनके विज्ञान संबंधी ज्ञान को दर्शाती हैं।
बाल गंगा में बालकों के ज्ञानबर्द्धन के लिए उनसे संबंधित सभी विषयांे
पर बड़ी सरल, सहज भाषा में लेखनी चलाई गई है। माँ सरस्वती की वंदना,
 उज्जवल उत्तराखण्ड से प्रारम्भ से एक सवाल-हिन्दु,मुस्लिम क्या होते हैं?
 हिमालय, नहीं समझते कम, आज सुना एक नई कहानी, बाल दिवस पर
सुनले नानी-रविवार शीर्षक से कविताएं हैं। आज़ादी सुन मेरी बात, में बच्चे
 अमीरों के नहीं गरीबों के भी हैं जो झोपडियों में रहते है उनके दर्द को बड़ी
 खूबसूरती से शब्दों में पिरोया है-
‘ये स्लम बस्ती है भारत की इसको सब कहते हैं कलंक
कितनी कोठी खाली सूनी-दिन रात यहा मनता बसन्त
परिवार आठ का रहता है एक आठ-आठ के कमरे मंे
पीढ़ी कमरे में जनी गई त्यौहार मने सब कमरे में‘
एक से एक बढकर कविताएं हैं। दुखियों पर दया, तीनों बन्दर, जन्म दिवस,
आदर्श दिन-चर्या, बच्चों को नैतिक शिक्षा प्रदान करती हैं। गौरेया, हरित बनाएं,
 पेड न होते, पर्यावरण संबंधी कविताएं हैं। गणतंत्र दिवस, बाल दिवस, कथा
शहीद ऊधम सिंह की, चन्द्रशेखर आज़ाद मंे राष्ट्रीयता के स्वर हैं।
सभी गीत सरल, सुबोध भाषा में रचे गए हैं जिनमें प्रचलित शब्दांे को भले
ही वह वैज्ञानिक शब्दावली के हों के साथ यथावत प्रस्तुत किया है जिन्हें बच्चे
 आसानी से समझ सकते है। गीतों में लयात्मक एवं ध्वन्यात्मकता का सम्पूर्ण
 ध्यान रखा हैं। बाल गंगा के सभी गीत नवीन विचार शैली लिए हुए उत्कृष्ट कोटि हैं।
 बाल साहित्य के भंडार को समृद्ध करने के लिए राज सक्सेना को हृार्दिक बधाई।
सभी विद्यालयों में बाल गंगा पुस्तक संजोई जाए ऐसा मेरा अभिमत है।
                           
स्नेह लता
1/309,विकास नगर, लखनऊ










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