रविवार, 17 जून 2012

उत्तराखण्ड की राजधानी एक विडम्बना


          उत्तराखण्ड की राजधानी एक विडम्बना
                               - डा.राज सक्सेना
          वस्तुतः भारत की स्वतन्त्रता और उत्तराखण्ड का प्रथक अस्तित्व लगभग
समान विडम्बनाओं के अधीन हुआ है|  न भारत का स्वतन्त्र अस्तित्व लेने से पहले
तत्कालीन नेताओं ने कोई होमवर्क किया था और न ही परिस्थितियों के दबाव में बिना
सोचे समझे तात्कालिक राजनैतिक लाभ के लिये उत्तराखण्ड को प्रथक अस्तित्व देने से
पूर्व ही किया गया|  दोनों बार अपने अहम के नशे में चूर सत्तामद से परिपूर्ण,व्यक्ति-
गत हानिलाभ को सामने रख कर कोई भी ठोस निर्णय लेने से बचने वाली,विवादों से
परे रहने की मानसिकता से ग्रसित नौकर शाही पर सबकुछ छोड़ देने की घातक प्रवृति
के अधीन अफसरों पर यह सिरदर्द छोड़ कर राजनीति चादर तान कर सो गई| फलस्व-
रूप अपने प्लाटों और भवनों की मूल्यवृद्धि और मसूरी और देहरादून के मंहगे पब्लिक
स्कूलों में पढ रहे अपने बच्चों के सानिध्यलाभ को दृष्टिगत कर इनके द्वारा देहरादून को
अस्थाई राजधानी के रूप में स्वीकार कराकर कुछ विभागीय भवनों को अधिग्रहित कर
और कुछ किराए के भवनों में राज काज एक दीर्घगामी योजना के अधीन प्रारम्भ कर
दिया गया| यह भी नहीं देखा गया कि सर्वसुखसुविधासम्पन्न राजनीतिकों को तो कोई
फर्क नहीं पड़ा किन्तु कुमांऊ के तवाघाट से खटीमा के सुदूर पूर्ववर्ती क्षेत्र के और के-
वल उनके ही नही पूरे पर्वतीय क्षेत्रों और कुमाऊं की तराई के सभी नागरिकों को किन
कठिनाइयों का सामना करना पड़ेगा यह नहीं सोचा गया | यदि उस समय ही गैर-
सैण में उपलब्ध भवनों और संसाधनों को दीर्घगामी योजना के अन्तर्गत अधिग्रहित
करके एक विकेन्द्रीयित राजधानी की स्थापना कर दी गई होती तो आज स्थिति ही -
दूसरी होती| राजधानी के विकेन्द्रीयित कार्यालयों को हाई टैक टैक्नालौजी के अन्तर्गत
गैर सैण में अवस्थित मुख्य राजधानी जिसमे मात्र विधान सभा और सचिवालय ही
होता से प्रदेश के विभिन्न क्षेत्रों में अवस्थित विभागाध्यक्षों के कार्यालयों से जोड़
 और वीडियोकांफ्रैंसिंग के माध्यम से एकीकृत करके कार्यसंचालन की परियोजना
पर काम किया जाता तो प्रदेश की स्थिति ही दूसरी होती|
                     इससे एक ओर तो देहरादून जैसे शान्त और सुन्दर नगर का कंक्रीट
के जंगल में परिवर्तन हो गया तो दूसरी ओर उसके एक मंहगे शहर के रूप परि-
वर्तन के कारण छोटे-छोटे कामों के लिए भी अपने घर से देहरादून जाने को -
मजबूर आर्थिक रूप से विपन्न नागरिकों के लिये राजधानी जाना और वहां दो
दिन मात्र रूकना भी असंभव हो गया| स्थिति यह है कि पिथौरागढ के उत्तर सी-
मावर्त्ती क्षेत्र से देहरादून जाने वाले व्यक्ति को देश की राजधानी दिल्ली जाना ज्यादा
आसान है| अपेक्षाकृत ज्यादा सस्ता भी|
                       वैसे सत्यता यह भी है कि गैर सैण में राजधानी की परिकल्पना -
भावात्मकरूप से तो ठीक थी साथ ही प्रदेश के हर क्षेत्र से लगभग समान दूरी भी
इसका धनात्मक पक्ष था किन्तु एकीकृत राजधानी के रूप में इसके कई बहुत ही


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ऋणात्मक पक्ष भी थे जिन पर भावावेश में विचार किया भी गया तो उन्हें भी -
समस्याओं के अपने आप निराकरण की मानसिकता के चलते दरकिनार कर दिया
गया| शायद यही कारण है कि अधिक व्यवहारिक न होने के कारण मजबूरी में ही
सही देहरादून की स्वीकार्यता में अभिवृद्धि हो रही है और शायद दस साल के बाद
तो इसका नाम लेवा भी न रहे, अगर राजनीति आड़े न आए तो|
                   उत्तराखण्ड वस्तुतः तीन भिन्न सांस्कृतिक संस्कृतियों से मिल कर
बना है| कुमांऊनी,गढवाली और मैदानी| यहभी एक विडम्बना ही है कि तीनों -
अपनी पहचान और संस्कृति के प्रति बहुत भावनात्मक लगाव तो रखते ही उसे
बनाए रखने के प्रति भी बहुत जागरूक रहते है| राजधानी गढवाल के अन्दर हो
जाने से कुमाऊंनी और गढवाली संस्कृतियों में टकराव की आशंका बढ गई है|एक
खामोश तनातनी देहरादून में बसे गढवाली,कुमाऊंनी और मैदानी प्रशासनिक अमले
में महसूस होती है,जो कोई गुल खिलाए या न खिलाए एक अव्यवस्था तो पैदा-
कर ही सकती है अब न सही कभी भी?
           यदि उत्तराखण्ड के सृजन के समय थोड़ा सा होमवर्क करके अस्थाई
राजधानी कालागढ की सहज उपलब्ध इरीगेशन कालोनी जो कुमाऊं,गढवाल के पर्व-
तीय और मैदानी क्षेत्रों का प्राकृतिक संगम है तथा संस्कृतियों का भी स्वाभाविक -
संगम होनेके नाते,बनाई जाती तो कुछ वर्षों में सहज स्वीकार्य हो जाती बिना किसी
सांस्कृतिक,आर्थिक , राजनैतिक , सामाजिक और क्षेत्रमूलक समस्या के|  यद्यपि  -
इससे गैरसैण में राजधानी न बन पाने की कसक बिल्कुल तो खत्म नहीं होती मगर
अत्यल्प जरूर हो जाती और क्षेत्रीय असंतुलन की शिकायत के निराकरण के साथ-
साथ हर सुदूरवर्ती क्षेत्र से समान दूरी इसकी विशेषता बन जाती| कम धन से ही
राजधानी का चहूंमुखी विकास संभव होता अलग से|
                        खैर 'बीती ताहि बिसार दे आगे की सुधि लेय'अब समय आ गया
है कि बाकी बचे देहरादून पर इतना दबाव न डाला जाय कि वह फट पड़े| इसका -
सब से सस्ता और सरल उपाय यह है कि थोडा अधिक होम वर्क करके, देहरादून में
अवस्थित कार्यालयों का विकेन्द्रीयकरण करके उन्हें या तो कमिश्नरी मुख्यालयों(गढ-
वाल के लिये ये ऋषिकेश अवस्थित खाली पड़े गो लोक,आई.वी.आर.आई कालोनी)
में स्थानान्तरित किया जाय या फिर नष्ट हो रही कालागढ कालोनी के मरम्मतयोग्य
भवानों में| साथ ही सिटीजन चार्टर बना कर क्षेत्रीय और जिलास्तरीय अधिकारियों
को अधिक शक्तियां प्रदान कर उन्हें अपने क्षेत्र के ग्रामों में कमसे कम तीन माह में
एक रात्रि शिविर करके स्थानीय समस्याओं के स्थलीय निराकरण को विवश किया
जाय| इस कार्य को उनके प्रोन्नत नियमों में प्राथमिकता प्रदान की जाए| ताकि -
वास्तव में कार्य और जनता का दुख-दर्द समझने वाले अधिकारी हैं, ही प्रोन्नति पा
सकें अपने को जनता का शासक समझने वाले अधिकारियों की नाक में नकेल भी
डाली जा सके|
                                               सम्पर्क-धनवर्षा,हनुमान मन्दिर,खटीमा-262308
                                                     मो. 9410718777,8057320999
       

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