मंगलवार, 12 जून 2012

कवित्त


           
             कवित्त
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             हिन्दी
जन्मी जहां हिन्दी,जिन्दगी के श्रेष्ट दिन,
दासी के समान हाय,रोकर बिताए है |
हिन्दी में बोलना हिन्द में ही हीन हुआ,
बोलता जो दण्ड और ठोकर  खाए है |
अंग्रेजी अमरबेल,अफसर सहयोग से,
बरजोर होके हिन्दी तरु पर छाए  है |
बेबस है'राज'अब,निर्धन कान्वेन्ट में,
'चिल्ड्रेन'नौकरी की आसकर पढाए है |

हिन्दी ही हिन्द में हेय हुई हाय क्यों?,
राजरानी आसन पर आज हम धर दें |
हिन्दी का ध्वजदण्ड गाढदें जगह-जगह,
इसकी पताका को प्रचण्डतम कर  दें |
रंग बदरंग जो किये हैं राजनीति ने,
आओ नवरंग हर ओर हम  भर  दें |
एक साथ मिलकर पुकार उठें'राज'हम,
भाषा है राष्ट्र की, घोष हम कर  दें |

हिन्दी को दीन-हीन,करते जो बुद्धिहीन,
सत्ता से विहीन, ऐसे दुष्ट  कर वाइए |
भारत की खाते और गाते इंग्लैण्ड की,
ऐसे राष्ट्रद्रोही इस,  राष्ट्र से भगाइए |
बेचरहे मां को निजस्वार्थ के अधीन जो,
ऐसे सत्तासीन सब,  पद से हटाइए |
हिन्दी से प्यार करें,हिन्दी में बात करें,
हिन्दी में काम करें,ऐसे लोग लाइए |



            प्रदूषण
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धूसरित वसुधा, हरित हम कर दें,
दूषणप्रदूषण का जहां नहीं भय हो |
सप्त रंग भर के बना दें इसे दर्शनीय,
आपस में सब की तालमेल लय हो |
देती प्रकृति हमें,अन्न,जल,वायु सभी,
तारतम्य इनका,कभी भी नहीं क्षय हो |
धरती को जिसने बनाया रूपवान उस,
निराकार,निर्देह ईश्वर  की  जय हो |

चित्र की तरह इस धरा को सजा दें हम,
हो गए जो रंग-बदरंग  फिर  भर  दें |
कण-कण की कोख से फूटे हरियाली अब,
उसकी  ऐसी स्थिति अब हम कर  दें |
पीढियां याद रखें  हमको हमेशा  बस,
प्रकृति को दर्शनीय श्रेष्टता  शिखर  दें |
बोल उठे आप हरियाली  संगीत-मय,
ऐसी नवचेतना के, हम इसे स्वर दें |  

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