शुक्रवार, 8 जून 2012

समीक्षा- अवधी तथा कश्मीरी लोकगीतों मे लोकतत्व




           समीक्षा-   अवधी तथा कश्मीरी लोकगीतों मे लोकतत्व
                                         समीक्षक-डा.राज सक्सेना
        किसी सामान्य से विषय पर जिस पर बहुत कुछ लिखा जा चुका हो लिख लेना
बहुत सामान्य सी बात है|  इस तरह के लेखन में कोई बहुत ज्यादा मेहनत की भी आव-
श्यकता नहीं होती सामान्य पत्रिकाओं में भी अनेक सन्दर्भ मिल जाते हैं जिन्हें उठा कर
कहीं भी फिट कर देना भी एक सामान्य सी बात है|  किन्तु एक सामान्य से विषय  को
यदि अतिविशिष्ट स्तर देकर उस पर अतिविशिष्ट सामग्री, सन्दर्भ और समन्वित सदभाव -
का समुच्चय कर उसे अतिविशिष्ट लोगों के लिये लिखा जाय तो वह एक यादगार बन -
जाता है, अमर हो जाता है और विषय का दर्पण हो जाता है, और तो और सम्पूर्ण -
विषय की लाल किताब बन जाता है|
         उपरोक्त शब्दों को अगर डा.बीना बुदकी की सद्यप्रकाशित सामान्य विषय
की असामान्य पुस्तक,' अवधी तथा कश्मीरी लोकगीतों में लोकतत्व - समाजिक,
सांस्कृ-तिक एंव धार्मिक सन्दर्भ में ' पर परीक्षित किया जाय तो सम्भवतः आग्रहों के
साथ पुस्तक देखने वाले दुराग्रही को भी कथन में नब्बे प्रतिशत से अधिक सत्यता लगेगी|
         प्रारम्भ करते हैं आवरण से|  आवरण का चयन, उसका रंग संयोजन और
आंतरिक पाठ्य सामग्री की स्पष्ट झलक मारते चित्र लेखिका की सुरूचिपूर्ण सोच और
स्पष्ट नजरिये की दुहाई पुस्तक पकड़ते ही दे देते हैं| पाठक पुस्तक हाथ में लेते  ही
उसे खोलने और पढने के लिये विवश न हो जाए तो रचना ही क्या| यह कथन भी
पुस्तक हाथ में लेते ही सत्य प्रतीत होने लगता है| सोने पर सुहागा अच्छा और -
मंहगा कागज त्रुटिहीन सुन्दर अक्षरों में छपाई पुस्तक को पाठक की नजर में कुछ -
अधिक महत्वपूर्ण बना देते हैं| एक सौ तिहत्तर पृष्टों की किताब को इस समयाभाव-
ग्रसित जनसामान्य के लिये पढने के लिये खोलना ही एक साहसिक कार्य है| किन्तु
पुस्तक खोल कर एक नजर  देखने का खतरा मोल लेना ही पाठक के गले पड़ जाता
है और एक पंक्ति पढ कर पढना बन्द कर देने के इरादे से पुस्तक खोलने वाला पंक्ति
दर पंक्ति पढने के लिये विवश हो जाता है| किसी अत्यन्त महत्वपूंर्ण काम से पढना
बन्द कर देने वाला भी पहली फुरसत में मौका मिलते ही आगे पढना प्रारम्भ कर -
देता है| यह तो हुई इस असामान्य सामाजिक,सांस्कृतिक और धार्मिक विवेचना लोक
गीतों के सन्दर्भ में करने वाली विशेष पुस्तक के बाह्य कलेवर की बात  और अब बात
करें आन्तरिक पठनीय सामग्री की |
                  इस असामान्य विवेचना-ग्रंथ का मन्तव्य् भी एक असामान्य हस्ती ने लिखा
है| जिन्हें हिन्दी  का  साहित्य जगत मसीहा की तरह मानता और जानता है| श्रद्धेय -
राजेन्द्र अवस्थी जी ने पुस्तक के पूर्वपृष्ठ में ही पुस्तक का सार और लेखिका का मन्तव्य
स्पष्ट करके इसे सामान्य श्रेणी की पुस्तकों से अलग घोषित कर इसकी असमान्यता को -

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भी स्पष्ट कर दिया है और यही घोषणा की है प्रस्तावना में कश्मीरी साहित्यप्रवर और प्र-
खर वक्ता प्रो.चमन लाल सप्रू जी ने|
        और अब आती है बारी इस असामान्य पुस्तक की  लेखिका की| सामान्य से
कुछ अलग हट कर सृजन करने वाली विद्वान लेखिका ने पुस्तक की भूमिका में ही स्पष्ट
करने का प्रयास किया है कि सामान्य विषयों से अलग हट कर लिखने की लालसा और
अदम्य जिज्ञासा तथा विकट धैर्यपूर्ण साहस ने ही उनसे इस कालजयी रचना का सृजन
कराया है| अवध की निराली शाम और धरती के स्वर्ग दोनों का निकटता से रसपान -
करने वाली लेखिका ने सम्भवतः सामान्य विषय को, असामान्य विषय और सामग्री के
साथ असामान्य प्रस्तुतीकरण की कला, इन दोनों असामान्य क्षेत्रों के समन्वय से ही प्राप्त
की है| कश्मीर में स्वंय भोगे यथार्थ का भी प्रभाव तो पड़ना ही था,सो पड़ा ही| यह
भी इसे असामान्य बनाने में सहायक ही हुआ है, केवल सहायक ही नहीं हुआ है अपितु
मन को विषय से जोड़ने में सफल भी हुआ है|
           लेखिका ने दो संस्कृतियों को साथ जिया है, प्रारम्भ में मन से कश्मीर
और भौतिक वातावरण का पूर्वांचलीय परिवेश उनसे, अलग हट कर सृजन का आग्रह ही
करता रहा होगा जिसकी परिणति इस पुस्तक के रुप में सामने आती है| उल्लेखनीय है
कि लेखिका ने स्वंय स्वीकार किया है, "य़ूं तो बचपन से घर का माहौल तथा कश्मीरी
 भाषा ही बोली जाती थी| लेकिन हमेशा मह्सूस होता कि मेरी एक नहीं दो मांऐं हैं, एक
 अवधी दूसरी कश्मीरी| दोनों के प्रति मेरी ममता थी|" ध्यान दें यहां भी लेखिका ने परम्परा
से ह्ट कर मातृभाषा को दूसरा स्थान दिया है| अवधी को पहला स्थान देकर अपनी विलक्ष-
णता का खुला प्रदर्शन बीना जी ने कर ही दिया| यही राष्ट्रीयता और सार्वभौमिकता का प्रतीक
है जो उन्हें और उनके साहित्य को अलग तथा असामान्य बनाता है|
                     सीधे विषय पर आने से पूर्व लेखिका ने यह उचित समझा कि जन-
सामान्य पाठक को लोक का अर्थ और परिभाषा के साथ दोनों भाषाओं का संक्षिप्त
किन्तु स्पष्ट परिचय कराया जाए ताकि पढते समय कहीं दिग्भ्रमित होने की नौबत न
आए| यह आवश्यक सुकर्म करने के उपरान्त ही वे मुख्य विषय पर आती हैं और कश्मीरी के
धार्मिक लोकगीतों से प्रारम्भ कर जन्म से मृत्यु संस्कार  तक के लोकगीतों का समुच्चय
प्रस्तुत करती हैं| हिन्दू संस्कृति में मनुष्य के सोलह संस्कार सुनिश्चत हैं,वस्तुतः यही
सोलह संस्कार जन्म से पूर्व से ही समाज को नवागत और जन्म के पश्चात नवागत को
समाज से अंतरंगता के कारक बनते हैं| इनकी भौतिक महत्ता जो बाहर से नहीं समझी
जाती किन्तु हमारे ऋषियों ने इस मनोविज्ञान को समझा और एक जटिल तथा अटूट -
सामाजिक ढांचे की संरचना में गर्भाधान से ही उसे सामाजिक मान्यता और अंतरगता
प्रदान करदी|  संस्कृति के इसी स्वरूप ने भयक़ंर झंझावातों में भी संस्कृति को बिखरने
नहीं दिया बल्कि  उसे और मजबूती से बांध दिया|  स्थानीय लोकगीतों के माध्यम से

                                              -3-
महिलाओं ने इस मशाल को आज भी जला रखा है,अक्ष्णु रखा है|  इन्हीं लोकगीतों के
माध्यम मात्र से जो गर्भाधान, पुंसवन और सीमन्तोन्नयन(तीनों जन्मपूर्व)संस्कार
से पुत्र जन्म,श्रान सौ'दर(छठी पर),मास नेथर(एक माह पर),अन्न प्राशन(छैः-
माह पर),ज़रकासय(मुण्डन),विद्यारम्भ पर,यज्ञोपवीत(आठ वर्ष पर), विवाह -
संस्कार पर और इन संस्कारों से सम्बन्धित उपकर्मों के समय गाये जाते हैं,महि-
लाएं अपने स्तर से अपनी सांस्कृतिक विरासत को पीढियों तक सहेजे रहती हैं| यूं
तो मृत्यु के उपरान्त भारतीय उपमहाद्वीप में विभिन्न जातियों उप जातियों में शोक
प्रकट करने के तरीके हैं किन्तू लेखिका ने कश्मीर कि विशिष्ट पारम्परिक विरासत के
रूप में मृत्योपरान्त गाये जाने वाले लोकगीतों का बड़ा सजीव व मार्मिक वर्णन -
किया है| लेखिका के अनुसार यह गीत आम महिलाएं नहीं गाती हैं बल्कि कुछ पे-
शेवर महिलाएं जिन्हें 'वारेन्य' या 'वानुवाजेन्य'कहा जाता है गाती हैं| इन शोक -
गीतों को पुरूष नहीं गाते हैं अपितु वारेन्य महिलाओं के एक पंक्ति गाने पर अन्य
उपस्थित महिलाएं उसे दोहराती हैं| यह है कश्मीर की एक विशिष्ट परम्परा जिसे -
लेखिका ने अन्य लोगों को अवगत कराया है| इसी क्रम में इस संस्कार के अन्य
कर्मकाण्डों के समय भी गाए जाने वाले लोकगीतों का सजीव वर्णन लेखिका द्वारा
करके कश्मीरी संस्कृति का विशिष्ट पक्ष उजागर किया गया है|
            अवधी में भी मुहर्रम के अवसर पर हसन और हुसैन की शहादत से
सम्बन्धित लोकगीतों पर खोज कर और उन्हे पाठको को इस पुस्तक के माध्यम से
उपलब्ध करा कर भी विद्वान लेखिका ने एक नई पहल की है और इन गीतों को भी
लोकगीतों में सम्मिलित कर दिया है| क्या यह असामान्यता का प्रतीक नहीं है?.
           सामान्य विषय को और असामान्य बनाते हुए लेखिका लोकगीतों की
गहराई में जाकर वहां से कश्मीर के विभिन्न जातियों, कृषि सम्बन्धी,बच्चों के खेल-
गीत, गरीबी और धार्मिक गीतों का अलबेला पिटारा पाठकों के सम्मुख प्रस्तुत करती
हैं, जिससे नायाब और दुर्लभ मोती निकल कर पाठकों को सोच की एक नई दिशा
उपलब्ध कराते हैं| लेखिका यहीं नहीं रुकती वे यह मोती अवधी में भी खोज लाती हैं
और उन्हें अवधी में विभिन्न जातियों के लोकगीतों के रूप में परोसती हैं|
            अपने अध्ययन और मनन को विराट रूप देते हुए वे लोकगीतों पर
ही केन्द्रित नहीं रह्तीं अपितु  लोकगीतों के आनुषंगिक क्षेत्र का भी अध्ययन प्रस्तुत
करके अधूरापन पूरा करती हैं| कश्मीरी और अवधी के लोक संगीत और लोक नाटक
अध्याय के रूप में| मुस्लिम लोकगीतों का भी समावेश इस पुस्तक को पठनीय और
संग्रहणीय बनाता है|
                      अन्तिम अध्याय में विद्वान लेखिका ने अवधी और कश्मीरी लोकगीत
का सामाजिक, सांस्कृतिक और साहित्यिक अवदान पर अपने विचार बड़े स्पष्ट रूप

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से रखे हैं| विराट अध्ययन और गंभीर विमर्श के उपरान्त उन्होंने जो मन्थनोपरान्त
मन्तव्य निकाला है वह भारत की अनेकता में एकता की पुष्ठि करता है| वे लिखती
हैं,"कुल मिलाकर यदि देखा जाय तो भारतीय संस्कृति की जो अन्तःसलिला अवध
प्रदेश में अज्स्त्ररूप में प्रवाहित है,उसी प्रकार की सांस्कृतिके और सामाजिक अन्तः-
सलिला कश्मीर में भी निरन्तर प्रवाहित हो रही है| विभिन्न प्रकार के सामाजिक -
और आर्थिक ताने बाने का एक जैसा ही रूप दोनों ही भाषाओं में विद्यमान है जो
कुल मिला कर भारतीय संस्कृति की एकता परिलक्षित करता है|"
          जैसा कि मैंने प्रारम्भ में कहा है यह एक सामान्य विषय की असामान्य
पुस्तक है, इसे मैं पुनः दोहराते हुए इन शब्दों के साथ अंत करता हूं कि अवधी और
कश्मीरी लोकगीतों में लोकतत्व एक धरोहर है, जो हर समाज शास्त्र मे रुचि लेने वाले
जागरूक नागरिक के संग्रह में होना आवश्यक है जिससे जब जो चाहे सम्बन्धित प्रमाण
का खजाना खोल कर इससे उद्धरण ले सके|
          कुल मिला कर पुस्तक निश्चित रूप से असामान्य सामाजिक और सां-
कृतिक सरोकारों के लोकतत्वों का कोष है जो हर घ्रर में रखे जाने योग्य है|
                                           -धनवर्षा,हनुमान मन्दिर,खटीमा-262308 (उ.ख.)                                
           
         

         

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