मंगलवार, 8 मई 2012


          मां
             -डा.राज सक्सेना
माता का मन है विरल,विरल सौम्य प्रतिरुप |
जिसको जैसा चाहिये, बांट रही   सम-रूप |
        -०-
धैर्य धरा सा धारती,धर ममता का रूप |
संतति पर संकट दिखे, धरे चण्डिका रूप |
         -०-
कमल सरीखा अमल है, मां का कोमल गात |
तेजोमय प्रतिरूप पर, टिके नहीं द्दग्-पात |
         -०-
वसुन्धरा सी शक्ति ले, सहती सब प्रतिघात |
बज्र सरीखा हो गया, मां का स्वर्णिम गात  |
         -०-
मां का हृदय विशाल है, संतति का मन नीच |
कमल सरीखी खिल रही, पंक सरोवर   बीच |
         -०-
निज के तन का मूल्य है,पर अमूल्य है मात |
माता का तन मनुज को, दाता की   सौगात |
         -०-
मां का तन छोटा भले,मन है बहुत विशाल |
संतति रक्षा पर अड़ी, मां से भागे   काल |
         -०-
दाता की हर देन में, जननी मिली अमूल्य |
माँ के रिश्ते  के बिना ,रिश्ते सब निर्मूल्य  |
         -०-
माता का मन आईना, स्वच्छ सरल छवि देख |
शिलालेख है भाग्य का, उज्जवल हर अभिलेख  |
         -०-
माता में भगवान का, छिपा हुआ  प्रतिरूप  |
चरणों में सब सुख भरे, कर हैं स्वर्ग स्वरूप |
         -०-

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