शनिवार, 14 अप्रैल 2012

ग़ज़लगो-भारतेन्दु हरिश्चन्द्र


     डा.राज सक्सेना                            सम्पर्क-धनवर्षा,हनुमान मन्दिर,
(डा.राज किशोर सक्सेना)                                               खटीमा-262308 (उ.ख.)
पूर्व परियोजना निदेशक,न.वि.अभिकरण,                                फोन-05943252777
पिथौरागढ,पूर्व अधिशासी अधिकारी,मसूरी,                             मोबा.- 9410718777
पूर्व सहा.नगर आयुक्त नगर निगम देहरादून
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            ग़ज़लगो-भारतेन्दु हरिश्चन्द्र
                           - डा.राज सक्सेना
        यूं तो ग़ज़ल हिन्दी कवियों की अब मुख्य कविता विधा बनती जा रही है किन्तु है
यह फ़ारसी से उर्दू में आकर उर्दू की मुख्य काव्यविधा ही | अधिकांश हिन्दी समर्थकों ने इसे
अभारतीय मानते हुए इस का बहिष्कार ही किया | किन्तु अब इसकी लोकप्रियता में लगा-
तार वृद्धि हो रही है | बहुत कम लोग जानते हैं कि स्थापित ग़ज़ल विरोध परम्परा को कि-
नारे कर भारतेन्दु ने ग़ज़लें भी लिखी है किन्तु यहां भी लीक से हट कर उन्होंने ग़ज़ल के
अर्थ को ही बदल कर हिन्दी कवियों के लिये एक नया रास्ता खोल दिया | एक ऐसा रास्ता
जिससे चारों ओर राहें खुली हुईं थीं | ग़ज़ल को उन्होंने परम्परागत इश्क,जुदाई,समर्पण,
मिलन और प्रेमी(प्रेमिका के खुदा से भी बुलन्द दर्जे) को जन सामान्य की सर्वदिशामय -
कविता का रूप दे दिया | भारतेन्दु कालजयी व्यक्तित्व थे -
            वे - हम जिधर भी चल पड़ेंगे रास्ता बन जाएगा |  के प्रतीक थे |
           हिन्दी गद्य को तो उन्होंने नई दिशा दी ही कविता के भी नए प्रतिमान पैदा किये |
सम्भवतः लक्ष्मी सागर वार्ष्णेय ने इसी लिये उनके लिये कहा,"भारतेन्दु केवल अंग्रेजी ही -
नहीं,संस्कृत, अरबी,फ़ारसी के खुले खजाने से लूट मचाकर निज भाषा भण्डार भरने के -
कट्टर पक्षपाती थे | उनकी इसी सोच ने आज ग़ज़ल को हिन्दी भाषा का एक आभूषंण
बना दिया है | इस सम्बन्ध में यह भी कहना उचित होगा कि भारतेन्दु जी सामान्यतः
हिन्दी के क्लिष्ट रूप के लिये कभी आग्रही नहीं रहे | उन्होंने अधिकतर सामान्य बोल-
चाल की भाषा का ही प्रयोग किया जिसे उस समय देवनागरी लिपि में लिखी उर्दू  ही -
समझा जाता था | इसीलिये ब्रजरत्न दास ने उनके लिये कहा,"भारतेन्दु जी,उर्दू के सच्चे
शायर थे,... उन्होंने उर्दू भाषा में कविता भी काफी की है और इनकी हिन्दी कविता पर
भी इस उर्दू जानकारी का जो असर पड़ा है वह भी उल्लिखित हो चुका है |(भा.ह.च.-
ब्रज रत्न दास)| भारतेन्दु के इस समन्वयवादी दृष्ठिकोण की विशेषता के कारण ही आचार्य
राम चन्द्र शुक्ल ने उल्लेखित किया कि,"साहित्य के एक नवीन युग के आदि में प्रवर्तक
के रूप में खड़े होकर उन्होंने यह भी प्रदर्शित किया कि नये या बाहरी भावों को पचाकर -
इस प्रकार मिलाना चाहिए कि अपने ही साहित्य के विकसित अंग से लगें | प्राचीन-नवीन
के उस सन्धिकाल में जैसी शीतल कला का संचार अपेक्षित था वैसी ही शीतल कला के साथ
भारतेन्दु का उदय हुआ, इसमें संदेह नहीं |"(हि.सा.का इतिहास-आ.रा.च्.शुक्ल)|
         भारतेन्दु की इस समन्वयवादी विशेष नीति के मूल में लगता है कि वे समझ
गए थे कि हिन्दू मुस्लिम एक जुटता से ही अंगेजी और अंग्रजों का विरोध किया जा सकता
था तथा यह भी कि हिन्दी भाषा का शब्द भंडार बढाने के लिये यह भी आवश्यक था   कि
उसमें अन्य भाषाओं विशेष रूप से सदियों से साथ पल बढ रही उर्दू के सरल शब्दों को भी
लिया जाय | कुछ अरबी, फारसी के शब्द भी लिये जाएं ताकि यह एक समर्थ और सर्व-
ग्राही भाषा का रूप ले सके |
          जहां तक ग़ज़लगोई का प्रश्न है वे 'रसा' उपनाम से ग़ज़लें लिखा करते थे |
अनेक विद्वानों ने उनकी ग़ज़लों को सराहा है और वे उन्हें हिन्दी ग़ज़लगोई की एक सशक्त
कड़ी के रूप में उल्लिखित करते है | डा.रमा सिंह के अनुसार,"हिन्दी ग़ज़ल का प्रारम्भ
वैसे तो अमीर खुसरो से माना जाता है परन्तु अमीर खुसरो ने भी हिन्दी भाषा में बहुत -
ग़ज़लें नहीं कहीं |अमीर खुसरो से लेकर भारतेन्दु पूर्व तक ग़ज़लें कही तो गईं किन्तु हिन्दी
ग़ज़ल की दृष्टि से इस काल को अंधकार का काल कहा जाता है | हिन्दी साहित्य में आधु-
निक काल के जन्मदाता भारतेन्दु से ही ग़ज़ल का प्रारम्भ माना जाता है |"(हिन्दी ग़ज़ल के
विविध आयाम-सरदार मुज़ावर)| हिन्दी में ग़ज़ल की विधिवत शुरुआत डा.राम कुमार कृषक
भी भारतेन्दु से ही मानते हैं |
          परम्परागत ग़ज़ल के क्षेत्र बहुत सीमित थे | इस परम्परा में भारतेन्दु का
सबसे उल्लेखनीय योगदान परम्पराओं के संकीर्ण दायरों को तोड़ने का रहा है | शाश्वत -
विषय प्रेम के साथ नायिका ही केन्द्रबिन्दु रहती थी जिसके वियोग में नायक का हृदय हर
समय तड़पता रहता था | इश्क मिजाज़ी से निकली तो सूफ़ियों की इश्क हक़ीक़ी मे उलझ
कर रह गई | किन्तु भारतेन्दु ने सामाजिकता,दार्शनिकता और भक्तिभाव के साथ-साथ ही
पूर्व स्थापित परम्पराओं का भी कहीं-कहीं निर्वहन किया है | यही भारतेन्दु की इस संबध
मे व्यापक विशेषता रही है | इस संबध में विष्णुकांत शास्त्री जी का कथन दृष्टव्य है-
"मेरी दृष्टि में भारतेन्दु की उर्दू को सबसे बड़ी देन यह है कि उन्होंने उसमें भी भारतीय -
भावना और रीति-नीति की कविताएं लिखी हैं | परम्परागत ग़ज़लगोई का उदाहरण देखें-
         ग़ज़ब है सुरमः देकर आज वो बाहर निकलते हैं |
               अभी से कुछ दिलेमुज़्तर पर अपने तीर चलते हैं |
               ज़रा देखो तो ऐ अहले सुख़न ज़ोर-ए-सनाअत को,
         नई बंदिश है मजमूं नूर के  सांचे में   ढलते हैं |
         कृष्ण भगवान पर कही गई अपनी ग़ज़ल में भारतेन्दु सीधे ब्रह्मवाद और भक्ति-
वाद पर उतर कर उसे सूफी विचारों का जामा भी पहना देते प्रतीत होते है | यह है सच्चा
समन्वय जो भारतेन्दु जी ने ब्रह्मवाद और सूफ़ीवाद में करके दिखा दिया है |
         जहां देखो वहां मौजूद मेरा कृष्ण प्यारा है |
         उसी का सब है जलवा जो जहां में आशकारा है |
         भला मखलूक ख़ालिक की सिफ़त समझे कहां कुदरत,
     इसी से नेति-नेति ऐ यार वेदों ने पुकारा है |
         आगे वे कहते हैं-
         तेरा दम भरते हैं हिन्दू,अगर नाकूस बजता है,
         तुझे ही शेख ने प्यारे अजां देकर पुकारा है |
                जो बुत पत्थर है तो काबे में क्या जुज ख़ाको पत्थर है,
         बहुत भूला है वह इस फ़र्क में सर जिसने मारा है |
                न होते जलवःगर तुम तो,यह गिरजा कब का गिर जाता |
                निसारा को भी तो आखिर तुम्हारा ही सहारा  है |
                तुम्हारा नूर है हर शै में कह से कोह तक यारो,
         इसी से कहके हर-हर तुमको हिन्दू ने पुकारा है |
         इस ग़ज़ल के माध्यम से कवि भारतेन्दु सीधे और सरल शब्दों में पाठक या
श्रोता के दिलों   में  हिन्दू धर्म की महत्ता प्रमाणित करते हुए धर्म समन्वय के अपने
पुनीत मिशन में सफल हुए हैं | जब मनुष्य मृत्यु के सन्निकट होता है तब उसे सांसा-
रिक निस्सारता,नश्वरता और अनावश्यकता का आभास होता है | वे कहते हैं-
                  आ गई सर पर क़ज़ा लो सारा सामां रह गया |
          ऐ फ़लक़ क्या-क्या हमारे दिल में अरमां रह गया |
                      *
          ऐ अज़ल जल्दी रिहाई दे,न बस ताख़ीर कर,        
          ख़ान-ऐ-तन भी मुझे अब क़ैदख़ाना हो गया |    
          ख़्वाबेग़फ़लत से ज़रा देखो तो कब चौंके हैं हम,
          क़ाफ़िला मुल्के अदम को जब रवाना हो गया |  
          या फिर-
          रिहा करता नहीं सय्याद हम को मौसिम-ऐ-गुल में,
          कफ़स में दम जो घबराता है सर दे दे पटकते हैं |
          हिन्दी के पहले ग़ज़लगो के रूप में भारतेन्दु ने हिन्दी ग़ज़ल को उर्दू ग़ज़ल
की परम्परागत छवि के साथ एक नया रूप दिया है | बिना हिन्दी शब्दों के प्रति आग्रह -
पाले उन्होंने उर्दू और फ़ारसी शब्दों का भरपूर प्रयोग किया है | भारतेन्दु की ग़ज़ले दो -
प्राचीन संस्कृतियों के बीच समन्वय स्थापित करती हैं,सौहार्द उत्पन्न करती और अलिखित
तारतम्य भी बनाए रखती हैं | यही भारतेन्दु की ग़ज़लगोई की विशेषता है |
         ग़ज़ल के क्षेत्र में भारतेन्दु ने चहुंमुखी पैंतरेबाजी की तो वे ग़ज़ल की हास्य-
व्यंग्य विधा को कैसे छोड़ देते यह तो बहुत कम लोगों को ही मालूम है | उनकी हास्य की
ग़ज़लें कम हैं मगर है | जिनका प्रयोग अपवाद स्वरूप उन्होंने अपने गद्य व्यंग्य के साथ
भी किया है | उनके व्यंग्य आलेख 'मुशायरा' में उनकी इस कला के भी साक्षात दर्शन -
होते हैं | उनका काल्पनिक कवि क्या कहता है-
         फिर उन्हें हैज़ा हुआ फिर सब बदन नीला हुआ |
                फिर न आने का मेरे घर में नया  हीला  हुआ |
                क़हरे हक नाज़िल हुआ पत्थर पड़े वे मर गये ,
         अब्र का टुकड़ा उन्हें तबरम  अबा-बीला  हुआ |
                फिर उन्हें आया पसीना सब बदन  ठंडा  हुआ ,
         मुफ़लिसी में फिलमसल आंटा अजी गीला हुआ |
                नाम सुनते ही टिकस का आह करके मर गए,
         जान ली कानून ने, बस मौत का हीला  हुआ |
               आप शेखी पर चढे थे मसले अफगानाने बद्,
         ख़ूब शुद गदक़ों के मारे सब बदन ढीला  हुआ |
                क़ैसरे हिन्दोस्तां अब जान इनकी बख्श   दो,
         देख लो रंज़िश से सब,इनका बदन पीला हुआ |
          और अब देखिए कम पढे लिखे किसी शोहदे की भाषा और उसी के भावों को
भारतेन्दु जी की व्यंग्य ग़ज़ल में-
          सान सौकत तेरे आसिक की मेरी जान जे है |
                 होंगे  सुलफा  इसी दरवाजे पे अरमान जे है |
                 कहीं सुह्दे भी पिचकते हैं  भला   झांपों के,
          आ तो डंट जा अभी खम ठोक के मैदान जे है |
                 गैर के कहने पै हजरत को न मुतलक हो ख्याल,
          बंचो एक एक को बहकाता है सैतान   जे है |
                 आके हम लोगों से मांगे न टिकस  मोटे मल,
          रख दूं धुनके उन्हें बनियों प फकत सान जे है |
                  आज  मामूर  है  आलम  के  नमूदारों  में,
          लुत्फ अल्लाह का सर पर तेरे  खाकान जे है |
   
           

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