शनिवार, 21 अप्रैल 2012

दोहे


            दोहे
जिस आंचल से ढांक सर, आई वधू निकोर |
वही  महाजन के यहां,मिला सिसकता भोर |
           -०-
फिरा खोजता न मिला,किसी वृक्ष पर ठौर |
वापस  पंछी आ गया,फिर पिंजरे की ओर |
           -०-
गिरती हुई दिवार का,हुआ भाग्य भी चूर |
बच्चे तक रहने लगे,उस से कोसों  दूर  |
           -०-
सिसक रही है संस्कृति,लुप्त वेद का ज्ञान |
ज्ञान बांटते फिर रहे, बाइबल और कुरान |
           -०-
पिंडली,जंघा,कटि,उदर,दिये वक्ष तक खोल |
रखा कहां पर आवरण,नवल सभ्यता बोल  |
          -०-
जिन्हे घ्रणा से देखते, बना अजब संयोग |
हुकम चलाते शीर्ष से,वे उत्पाती   लोग  |
          -०-

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