शनिवार, 7 अप्रैल 2012

भारतीय संस्कृति की अवधारणाएं


  डा.राज सक्सेना                            सम्पर्क-धनवर्षा,हनुमान मन्दिर,
 (डा.राज किशोर सक्सेना)                                               खटीमा-262308 (उ.ख.)
पूर्व जिला परियोजना निदेशक,न.वि.अभिकरण, पिथौरागढ,              फोन-05943252777
पूर्व अधिशासी अधिकारी,मसूरी,                                         मोबा.- 9410718777
पूर्व सहा.नगर आयुक्त नगर निगम देहरादून                                                          -8057320999
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          भारतीय संस्कृति की अवधारणाएं
                                                           - डा.राज सक्सेना                          
        समाज में सामान्य रूप से 'संस्कृति' शब्द को,सुरुचि और शिष्ट व्यवहार के
रुप में लिया जाता है | विस्तृत अर्थों में संस्कृति की परिभाषा इस प्रकार दी जा सकती
है-"संस्कृति किसी एक समाज में पाई जाने वाली उच्चतम मूल्यों की वह चेतना है,जो
सामाजिक प्रथाओं,व्यक्तियों की चित्तवृतियों, भावनाओं,मनोवृतियो,आचरण के साथ-साथ
उसके द्वारा भौतिक पदार्थों को विशिष्ट स्वरूप दिये जाने में अभिव्यक्त होती है |"
       संस्कृति शब्द का दूसरे अर्थों में सभ्यता के परिप्रेक्ष्य में भी प्रयोग किया जाता
है | किन्तु अधिकतर संस्कृति के ऊंचे स्वरूप के अर्थों में | यथार्थ में-"सभ्यता,मानव
के सांस्कृतिक विकास  की वह स्थिति है,जिसमें नगर कहे जाने वाले जनसंख्या के क्षेत्रों
में जब वे रहना प्रारम्भ कर देते हैं और उच्च श्रेणी के भौतिक जीवन या उच्च जीवन -
स्तर के प्रतीक हो जाते हैं | किन्तु उच्च स्तर के भौतिक जीवन में संस्कृति का अंश
तब ही आता है जब वह उसमें संश्लिष्ट हो या उच्च नैतिक मूल्यों को प्राप्त करने का कोई
माध्यम बने | जब ऐसा जीवन नैतिक मूल्यों में से किसी एक के प्रतिकूल होता है या
ऐसे किसी नैतिक मूल्य से दूर रहता है तब वह सांस्कृतिक विकास का अवरोधक बन -
जाता है | ऐसे अवरोधक कभी-कभी लहलहाती संस्कृतियों के समूल नष्टीकरण के कारक
बन जाते है |" इतिहास ऐसे उदाहरणों से भरा पड़ा है |
                   आलेख में हम संस्कृति के इसी पक्ष का भारतीय परिप्रेक्ष्य में उपलब्ध
साक्ष्यों के आधार पर मूल्यांकन करने का प्रयास करते हैं |
       जनविज्ञानियों ने संसार की समस्त जातियों को मुख्य्तः तीन नस्लों में -
बांटा है | प्रथम को जन विज्ञान में काकेशियन कहा जाता है यह गोरे लोगों की नस्ल
है | दूसरी नस्ल मंगोलायड कहलाती है जिसका रंग पीला होता है और तीसरी नस्ल
इथोपियन परिवार कही जाती है जिनका रंग काला होता है | इस प्रकार दुनिया   में
गोरे,पीले और काले तीन प्रकार के लोग मुख्यतः पाये जाते हैं या फिर किसी एक -
रंग की प्रधानता लिये इनमें से किन्ही दो या अधिक का सम्मिश्रण |
       भारतीय उप महाद्वीप में इन तीनों नस्लों के लोग तो हैं ही इनके सम्मि-
श्रित लोग भी बहुतायत में पाये जाते है | इस दृष्टि से भी भारतीय परिवेश संसार
में एक विशिष्ट स्थान रखता है | इससे थोड़ा हट कर जनविज्ञान की दूसरी दृष्टि से
विचार करें तो भारत वर्ष में चार प्रकार के लोग मिलते हैं | पहले वे जिनका कद
छोटा,रंग काला,बाल घुंघराले और नाक चौड़ी होती है | इस तरह के लोग मुख्यतः
जंगलों में आदिम जनजातियों के रूप में पाये जाले हैं | दूसरी तरह के वे लोग हैं
जिनका रंग काला,मस्तक लम्बा,बाल घने और काले,नाक खड़ी मगर चौड़ी होती है,
ये द्रविड़ जाति के लोग हैं जो विन्ध्याचल से दक्षिण में पाए जाते हैं | अगर आर्य
भारत में बाहर से आये मान लिये जायें जैसा कि कई विद्वानों का विश्वास है तो ये
लोग आर्यों से भी पहले भारत आये होंगे और इन्होंने ही भारत में व्यवस्थित नगर
नगर व्यवस्था की नींव डाली होगी ऐसा विश्वास किया जाता है | मोहन जोदड़ो और्
हड़्प्पा प्रमाण हैं | तीसरी जाति के लोगों का कद लम्बा,रंग गोरा या गेहुंआ,दाढी
व मूंछ घनी,मस्तक लम्बा तथा नाक पतली तथा नुकीली होती है | ये आर्य जाति
के लोग कहे जाते हैं | अन्य जातियों से वैवाहिक सम्बन्धों के कारण उत्पन्न इनकी
संतानों का रंग गेहुंआ अथवा हल्का गोरा हो रहा है | चौथे प्रकार के लोग जो असम,
भूटान,सिक्किम,पूर्वोत्तर राज्यों और उत्तर प्रदेश,उत्तराखण्ड,हिमाचल,पंजाब,उत्तरी -
बंगाल,कश्मीर के उत्तरी किनारे के कुछ हिस्सों में बहुतायद से पाए जाते हैं | इनका
रंग पीला,कद छोटा, नाक चपटी-चौड़ी और रोम विहीन चेहरा होता है | सदियों -
पहले आर्यो के आगमन के उपरान्त ये मंगोल नस्ल के लोग चीन और तिब्बत  से
पलायन कर हिमालय के निचले हिस्से या तराई में बस गए | इन तथ्यों के आधार
पर भारतीय समाज आर्य,द्रविड़,मंगोल और आदिवासी लोगों का समाज है | आज
हम जिन्हें आदिवासी मानते हैं उनमें से कुछ को छोड़ कर अधिकांश नीग्रो और -
औष्ट्रिक जातियों से मिलकर बने लोग हैं | जो अंण्डमान नीकोबार,मध्य भारत और
देश के अगम क्षेत्रों में पाए जाते हैं | इसी प्रकार मंगोल नस्ल के लोगों का पौरा-
णिक नाम किरात माना जाता है |
        भाषा की दृष्टि से विवेचना में हम पाते हैं कि भारत में 76.4  प्रतिशत
आर्य भाषी,20.6 प्रतिशत द्रविड़ भाषी और 03 प्रतिशत शबर-किरात भाषी लोग -
निवास करते हैं | मंगोल नस्ल के लोगों की मूल भाषा तिब्बती या चीनी मूल की
है | जहां तक द्रविड़ भाषा का प्रश्न है,विन्ध्याचल से उत्तर में इससे मिलती जुलती
दो भाषायें एक बलूचिस्तान में ब्रहुई और दूसरी बिहार के ओरांव जनजाति के लोगों
की भाषा मुण्डा द्रविड़ परिवार की भाषायें लगती हैं | यह सिद्ध करता है कि  पूरे
भारत में द्रविड़ संस्कृति का प्रभाव अवश्य था | समाज विज्ञानियों और मानव -
विज्ञानियों ने भी इस तथ्य को स्वीकार किया है | यदि आर्य भाषा संस्कृत का -
साक्ष्य स्वीकार करें तो उसमे किरातों का उल्लेख यह सिद्ध करता है कि आर्यों के
आने से पूर्व किरात भारत आ चुके थे | किन्तु अगर यह मानलें कि आर्य भारत
से ही अन्य देशों में फैले तो सारी समस्याओं का निदान स्वंय हो जाता है | हिन्द
जर्मन परिवार की भाषाओं में जो अद्भुत साम्य है वह भी यह सिद्ध करता है कि -
ये एक मूल की भाषायें हैं | भारतीय आर्यों का ऋगवेद दुनिया की सबसे प्राचीन
पुस्तक होने का गौरव प्राप्त कर चुका है | संस्कृत को सभी आर्यवंशियों की  मूल
भाषा सिद्ध करते हुए सुप्रसिद्ध विद्वान मैक्समूलर ने लिखा है-"संसार भर की सब
आर्य भाषाओं में जितने शब्द हैं, वे संस्कृत की सिर्फ पांच सौ धातुओं से निकले-
हैं |" भी यह सिद्ध करने में योगदान करता है कि आर्य मूल रूप से भारत के ही
निवासी थे और यहीं से दुनिया भर में फैले |
       आर्य संस्कृति एक उदार संस्कृति के रूप में सामने आती है | आर्यों ने
समय-समय पर भारत में किसी भी रूप में आईं जातियों और संस्कृतियों को समा-
हित करने में जो बुद्धिमानी और महानता का परिचय दिया है वह कहीं  और  नहीं
मिलता है | इस विषय में जय चन्द्र विद्यालंकार के कथन का उल्लेख आवश्यक हो
जाता है | उन्होंने कहा-"भारत वर्ष की जनता,मुख्यतः आर्य और द्रविड़ नस्लों की
बनी हुई है और उसमें थोड़ी सी छौंक शबर और किरात (मुण्ड और तिब्ब्त-बर्मी)-
की है |" यह वास्तविकता भी है कि रक्त,भाषा और संस्कृति,सभी दृष्टियों से भारत
की  जनता अनेक विभिन्नताओं के रहते हुए भी सम्मिश्रित है |
        भारत के बारे में अटकलों का बाजार बहुत गर्म रहा है | एक अटकल के
अनुसार भारत में सबसे पहले बरास्ता ईरान अफ्रीका से नीग्रो आये | यह भी माना
गया कि जब आर्य इस देश में आए उस समय तक नीग्रो जाति समाप्त हो चुकी थी |
नीग्रो जाति का कार्यकाल अब से सात हजार से दस हजार वर्ष पूर्व माना गया | -
अगर बाहर से आने की थ्योरी को मान लिया जाय तो नीग्रो के बाद आग्नेय (आ-
स्ट्रिक) इनके बाद द्रविड़ और फिर आर्य आए | आर्यों के आने के बाद ही भारत में
समन्वय की थ्योरी पर कार्य प्रारम्भ हुआ | एक मिश्रित संस्कृति का जन्म हुआ,
जिसमे देश में उपलब्ध समस्त संस्कृतियों को उचित और सम्मानपूर्ण स्थान प्राप्त -
हुआ और वे भारत में रच-बस गईं |
       अगर हम किसी अटकल,अनुमान या कथन से परे एक निष्पक्ष दृष्टि -
इतिहास और धटनाओं के तारतम्य पर डालें तो हम पाते हैं कि आर्य और द्रविड़्
नाम से अभिहित किये गये भारत वासियों का धर्म एक है,भाव और सोच एक है,
संस्कार भी एक ही हैं यहां तक कि जीवनशैली और उसके प्रति उनका दृष्टिकोण भी
समान है | गहनता से पर्यावलोकन करें तो वैष्णव,शैव-शाक्त,बौद्ध और जैन ये
आर्य भी थे और द्रविड़ भी | इनके धार्मिक विश्वासों के अतिरिक्त इनकी साहित्यिक
गतिविधियां रचनाधर्मिता,भाव और शैली में समानता | प्राचीन मन्दिरों का शिल्प,
मूर्तियों की समरूपता जीवन की आवश्यक और मनोरंजन साधनों और वाद्य यन्त्रों
में थोड़े विभेद के अतिरिक्त गहरी समानता मिलती है | कुछ स्थानीय परिस्थितियों
के वशीभूत मामूली अन्तर तो लगता है किन्तु जाति या संस्कारगत भेद बिल्कुल
नहीं हैं |
        यदि इस प्रश्न पर विचार करें कि आर्यों के साहित्य में धर्म का जो स्व-
रूप वर्णित है,संस्कृति की जो व्याख्या आर्यग्रन्थों में दी गई है उसका वास्तविक
स्वरूप कहां है तो उसका सर्वश्रेष्ठ स्वरूप दक्षिण में द्रविड़ों में ही उपलब्ध होता  है |
इस तथ्य के अधीन क्या यह अनुमान पुष्ट नहीं होता कि यदि द्रविड़ आर्यों से पूर्व
के निवासी हैं तो फिर हिन्दू संस्कृति भी आर्यों से पूर्व की है,या आर्यों की संस्कृति
को द्रविड़ों ने इसप्रकार समाहित कर लिया कि शिष्य गुरू से आगे निकल गया,या
फिर कोई कहीं से नही आया इसी देश की मिट्टी में वातावरण,प्रकृति और परि-
स्थिति के अधीन शारिरिक रूप से थोड़ी भिन्नता लिये दो प्रजातियों का उदय हुआ
और वे पली बढीं समान मान्यताओं और विश्वासों की एक छतरी के नीचे,एक -
संस्कृति के अधीन |
        आर्य कहां से आए, द्रविड़ कौन थे इस सम्बन्ध में कोई प्रमाण प्राप्त
नहीं है मात्र अनुमान और अटकलों से इस गंभीर प्रश्न को जब हल करना है तो
फिर यह मानने में क्या हर्ज है कि न द्रविड़ बाहर से आए न आर्य | ये यहीं
पैदा हुए और इन्होंने मिलकर एक साझा संस्कृति को जन्म दिया जो मनोवैज्ञानिक्
परिवेश में तर्क और विज्ञान के आधार पर विश्वासों की एक-एक ईंट जमा कर
खड़ी की गई थी ,जो हजारों साल से मात्र मामूली परिवर्तनों के साथ आज भी -
जिन्दा है और सर्वश्रेष्ठ मानी जाती है |जबकि इसके साथ फली फूली या इसके बाद
अस्तित्व में आई सभ्यताएं आज कहां हैं कोई नहीं जानता ?
       

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