बुधवार, 4 अप्रैल 2012

' नथ'


     डा.राज सक्सेना                            सम्पर्क-धनवर्षा,हनुमान मन्दिर,
 (डा.राज किशोर सक्सेना)                                               खटीमा-262308 (उ.ख.)
पूर्व जिला परियोजना निदेशक,न.वि.अभिकरण, पिथौरागढ,              फोन-05943252777
पूर्व अधिशासी अधिकारी,मसूरी,                                         मोबा.- 9410718777
पूर्व सहा.नगर आयुक्त नगर निगम देहरादून                                                          -8057320999
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            पति की मंगलकामना प्रतीक ' नथ'
                                            - डा.राज सक्सेना
      भारत के हिन्दी भाषी और उससे संलग्न हिन्दी समझने वाले क्षेत्रों में
'नथनिया ने हाय राम बड़ा दुख दीना' लोकगीत का, सदियों से पसंदीदा
लोकगीत की श्रेणी में बना रहना, भारतीयजनमानस के आभूषणप्रेमी समाज के -
नाक में पहने जाने वाले आभूषण 'नथ' के प्रति विशेष लगाव का प्रदर्शन -
करता है | यूं तो नथ सम्पूर्ण भारत मे सुहाग और सौभाग्य का प्रतीक मानी
जाती है किन्तु उत्तर भारत के पर्वतीय क्षेत्रों तथा उसमें भी उत्तराखण्ड के गढ-
वाल और कुमाऊं सम्भाग में इसे आभूषणों में विशेष महत्ता प्राप्त है |
     वैसे तो भारतीय परिप्रेक्ष्य में नारी स्वंय बहू के रूप में परिवार का
गहना है, पर गहनों से लदी बहू तो परिवार की समृद्धि का साक्षात प्रदर्शन ही
है | क्षेत्रो के अनुसार शरीर के विभिन्न भागों में पहने जाने वाले विशेष -
गहनों का अपना महत्व है किन्तु उत्तराखण्ड के आभूषण-फ्रेम में जो सर्वो-
परि स्थान नथ को प्राप्त है वह किसी अन्य आभूषण को प्राप्त नहीं है |
     वस्तुतः उत्तर भारत के उत्तराखण्ड के कुमांऊं और गढ्वाल दोनो -
खण्डों में थोड़ी सांस्कृतिक विभिन्नता होने पर भी कुछ और समानताओं
के साथ नथ का महत्व भी समान ही है | जैसे सुन्दर बहू परिवार की नाक
है वैसे ही सुन्दर बहू की नाक में पड़ी नथ की विशालता परिवार की ऊंची -
नाक का प्रतीक मानी जाती है | परम्परागत विश्वास के अनुसार उत्तराखण्ड
में 'नथ'  सुहाग,सौभाग्य और समृद्धि की प्रतीक है, किन्तु इन दोनो प्रखण्डों
में परिवार की समृद्धि के खुले प्रदर्शन के रूप में इसकी विशालता और भार
ने परिवार की बहुओं पर जो जुल्म विगत काल में किये हैं उनका साक्षात
वर्णन महान कहानीकार शिवानी की कई कहानियों में मिलता है |
       'भूषण बिन न बिराजई कविता,बनिता,भित्ति'
             जहां एक ओर साहित्यिक सौन्दर्यवृद्धि के लिये आभूषण को आव-
श्यक बताता है वहीं नारी सौन्दर्य के लिये भी उतना ही जरूरी समझता है |
उचित मात्रा और आकार जहां सौन्दर्य द्विगुणित करते हैं वही मात्रा और आकार
का आधिक्य विषमता का प्रतीक हो जाता है | भारत के विभिन्न अंचलों में
स्त्रियों की सौन्दर्य अभिवृद्धि के साथ गहनों को पति की  मंगलकामना का
प्रतीक भी माना गया है |पंजाब में सिर पर चौक और कानों के पास फूल -
नामक दो छोटे आभूषण, राजस्थान में लाख का चूड़ा और हाथीदांत की चूड़ियां
और बालों में मांग के आगे'पोड़',दक्षिण भारत,महाराष्ट्र,गुजरात में काले -
मोतियों से बनी दो लड़ी माला'मगल सूत्र',बगांल मे लोहे का कड़ा और शंख
की चूड़ी, बिहार व उत्तर प्रदेश में पांव के बिछुए और कश्मीर में डिजारू या
डिजहरू नामक कान में पहनने वाला विशेष बुन्दा सौभाग्यवती स्त्रियों और -
सुहाग की निशानी माना जाता है | इसी प्रकार सम्पूर्ण उत्तराखण्ड मे 'नथ'
को सौभाग्यवती स्त्रियों के सुहाग का प्रतीक माना जाता है |उल्लेखनीय है कि
कुमाऊं और गढवाल में माथे पर बिंदी,मांग में सिन्दूर के साथ नाक मे -
हैसियत के अनुसार नथ धारण करना सौभाग्य चिन्ह का प्रतीक है | अब से
कुछ वर्ष पूर्व तक उत्तराखण्ड में विवाह के समय वर पक्ष की ओर से वधु को
पहनाई जाने वाली नथ सुहाग का पवित्रतम आभूषण माना जाता था और -
नथ का भार और उसका घेरा वर पक्ष की आर्थिक स्थिति का परिचायक होता
था |
               कुमाऊं में नथ के वर्चस्व को अत्यन्त लोकप्रिय गीत की इन
पंक्तियों से समझा जा सकता है-
       हाय तेरि रुमाला,गुलाबी मुखड़ी,
       के भलि सजी रे,नाक कि नथुली |
             नावै गलोबन्द,हात कि धगुली,
       तेरी चमचम चम्की रै,माथे की बिंदुली |
                यहीं साथ में तराई-भाबर की गर्मी से त्रस्त पर्वत की बेटी अपने
पिता से प्रार्थना करती है कि मेरा विवाह बिलौरी (तराई) में मत करना वहां
बहुत घाम(धूप) लगती है -
          छान्ना बिलौरी जन दिया बाज्यु,
          लागला   बिलौरी  का   घाम |
                 लागला बिलौरी का घाम ओ बाज्यू,
          लागला   बिलौरी  का   घाम |
                  नाक का नथुली नाक में रौली,
          लागला   बिलौरी  का   घाम |
                 छान्ना बिलौरी जन दिया बाज्यु,
          लागला   बिलौरी  का   घाम |
           लोक गीतों में जीजा साली की नोंक झोंक का नथ से सीधा
सम्बन्ध जोड़ कर रखा गया है | साली अपने जीजा (भीना) की प्रशंसा में
गाती है-
           नाक में नथुली कान में बाली छन,
           हाथों चुड़ी बाजली ,   खना-खन |
                   लमकना दाढी,चमकना जूंगा छन,
           मेरा भीना लाखों में   एक  छन |
                   मैं उनूकी साली उन मेरा भीना छन |

       कुमाऊं के क्षेत्र में नाक में पहने जाने वाले आभूषणों में फुल्ली-
( इसे फूली,लौंग, लौंगफली अथवा कील भी कहा जाता है) यह ऊपर से
फूल जड़ित एक सोने या चांदी की कील होती है जो महिलाये अपने
बाएं नासापुट में किये गये छेद में पहनती हैं | दूसरा आभूषण नाक-
बाली कहलाता है| एक सोने का छोटा सा रिंग जिसे बिना झुलनी या
छोटी सी झुलनी के साथ जो अधर के ऊपरी भाग पर झूलता रहता है
पहना जाता है| तीसरा आभूषण बुलांकी या बुलांक़ कहलाता है| यह्
नासाग्र विभाजक अस्थि के मध्य में लटकता रहता है इसमें भी लट-
कन हो सकती है जो अधरों पर झूलती रहती है| चौथा आभूषण नथ-
निया है जो नथ का छोटा और नाक बाली का बड़ा रूप होता है| अब
आते हैं पांचवें अन्तिम आभूषण पर , और यह है हमारे आलेख का
मुख्य बिन्दु 'नथ' | जहां नथनिया एक तोला तक की हो सकती  है,
वहीं नथ पर भार या आकार की गोलाई का कोई प्रतिबंध नहीं है |
यह परिवार की आर्थिक हैसियत के अनुरूप किसी भी भार की और
किसी भी विशाल गोलाई की हो सकती है| उत्तराखण्ड में तो यह -
कहावत आम है कि बहू को सौ तोले की नथ न दी तो क्या
दिया|
          उत्तराखण्ड में सौभाग्य आभूषणों में सोने की काले मोतियो से बनी
माला(मंगलसूत्र) पहनने का प्रचलन आज भी जारी है |बहुत समय पूर्व मूंगे की
माला पहनना सौभाग्य का प्रतीक था | गले में गुलोबन्द,हंसुली,हाथों में धगुले-
(चूड़े) भी अत्यन्त प्रचलित थे | माथे पर मांग से लटका सोने या चांदी का -
टीका भी सौभाग्य का प्रतीक चिन्ह रहा है | आज समय-समय पर हुए सामा-
जिक परिवर्तनों के चलते सभी अन्य गहनों का प्रचलन कम हुआ है किन्तु नथ
अपना स्थान आज भी अक्षणु रखे है | हर समय तो नहीं मगर त्योहारों अथव
सामाजिक समारोहो आदि में मांग में टीका,नाक में नथ और गले में मंगलसूत्र
पहनना आज तक सुहागिनों के लिये अनिवार्य हैं |गढवाल के सन्दर्भ में सुप्र-
सिद्ध साहित्यकार डा.शिवानन्द नौटियाल ने अपने ग्रन्थ गढवाल की झलकियां
एक लेख में नथ को सामाजिक और आर्थिक हैसियत के रूप में प्राप्त महत्ता के
सन्दर्भ में लिखा है -"मैंने स्वंय ऐसी कई महिलाओं को देखा है,जिनकी पहले
पांच तोले की नथ थी जो बढते-बढते एक किलो वजन तक के रूप में परिवर्तित
हो गई है | ऐसी सौभाग्यवती महिलाओं की नाक का मांस चाहे कट कर भले
ही नीचे आ जाय,परन्तु सौभाग्य और समृद्धि की प्रतीक नथ के वजन को कम
नहीं किया जा सकता,क्योंकि ऐसा करना उस समृद्धिशाली परिवार के लिये 'नाक-
का सवाल' हो जाता है |"
           सौभाग्य और सामाजिक हैसियत के साथ नथ को सौन्दर्य में
भी प्रधान महत्ता प्राप्त है -  
           चन्द्र मुख पर तलवार की धार समान नाक में पड़ी सोने की
नथ में जड़े बहुमूल्य नगों की झलक जब सुन्दरी के बुरांस के समान गुलाबी
लाल गालों पर पड़ती है तो बरबस यह लोकगीत सामने आ जाता है-
           तड़तड़ी सी नाकुड़ी वींकी,खांडा धार सी पैंडी,
           नथुली पंवोर वींकी,झलकद जनी पूनो की जून | और -
           नथुली का भारन नाकडांडी लांदी झोल,
           ओंठड़ी देखेली तैंकी दाड़िमा को सी फूल,
           नथुली झलकेली तैंकी ओंठणियों का मूल |
           केवल नथ ही नहीं गढवाली लोकगीतों में नथ धारक सुन्दरी
की सुन्दरता का भी खूब चित्रण मिलता है - नथ पहनने से चन्द्रमुखी  के
गुलाबी गालों पर सोने का कस (मैल)लग जाने के कारण बदरंगी छाप पड़
जाती है जिससे उसका सौन्दर्य मद्धम पड़ जाता है -
           रोटि को कतर्- अ
             नथुलि को कस लगे,गल्वाड़ियों पर
             मधूली रूमाझु मधुली |
           गढवाली लोकगीतों में बहुतायत से नथ के माध्यम से प्रणय
निवेदन की परम्परा रही है,यथा- प्रिये तुम्हारी सुन्दरता वृद्दि के लिये एक
सौ तोले की नथ,तेरी पहाड़ सी ऊंची नाक की श्री वृद्दि के लिय अर्पण करूंगा
पर तू मेरी हो जा |
           इसी प्रकार - फौंकी जन हलकणी,इनी च नथुली झलकणी |
नायक को पेड़ की शाखा समान नाक में नथ का झूलना अतीव सुन्दर प्रतीत
होता है |यही नहीं उसे-
           हुंगारा लगौंद भग्यानी,नाक की नथुली | अर्थात-
नायिका की नाक में हिलती झलकती नथ बार-बार नायिका के मन की बात
बताने के लिये ही उसको चुनौती देती प्रतीत होती है |
           यूं तो अब तक उत्तराखण्ड की प्राण रेखा गंगा में बहुत पानी बह
चुका है | पुराने रीति रिवाज और पुरानी सोच तथा मान्यताओं के साथ-साथ -
सौन्दर्य और आभूषणों के मानकों में क्रान्तिकारी परिवर्तन आ चुके हैं | सुन्दरता
के प्रतिमान कुछ के कुछ हो चुके हैं | संसार और देश के साथ उत्तराखण्ड भी
बदल रहा है | इस परिवर्तन के परिप्रेक्ष्य में कुमांऊ और गढवाल के निवासियों
की सोच भी परिवर्तित हुई है | मगर सुहाग और सौभाग्य की पर्याय नथ के
प्रति अभी भी उत्तराखण्ड की नारी का आकर्षण और समर्पण कम नही हुआ है |
आज भी सामाजिक सरोकारों विशेष रूप से धार्मिक और सामाजिक सुकृत्यों में
उत्तराखण्ड की पर्वतीय वनितायें नथ के साथ लहंगा,ओढनी और मंगल सूत्र तो
अवश्य पहनती हैं | अपने आप को अधुनातन सिद्ध करने की होड़ में कुछ -
जीन्स टाप धारी महिलाएं इनसे परहेज करें यह अपवाद है | मगर अन्दर से
उनके अन्दर की पर्वतपुत्री थोड़े से आग्रह पर नथ,लंहगा और मंगलसूत्र धारण
कर फोटो खिंचा कर अपनी सहेलियों और मित्रगणों को दिखाती फिरे यह अलग
बात है और यही बात उसे अनन्यता प्रदान करती है | यही तो उत्तराखण्ड की
विशेषता है | साथ ही पर्वतीय नथ की सार्वभौमिकता भी |

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