गुरुवार, 5 अप्रैल 2012


बन गये अमर
दिनकर हिन्दी के अस्तहीन,
'कमलाप्रसाद'तुम भाषा के |
सतरंग छटा के इन्द्र-धनुष,
तुम शीर्षशिखर परिभाषा के |

तुमने शोभा को दुगना कर,
हिन्दी को गौरववान किया |
दूरस्थ 'फिजी' से   देशों में,
हिन्दी को शत-सम्मान दिया |

तुम बढे,बढी हिन्दी  आगे,
बन गई नियति आगे बढना |
हिन्दी को गरिमा प्राप्त हुई,
शत-श्रेष्ठ बना हिन्दी पढना |

बन चुके अमर जीवित रहते,
हिन्दी की सतत कहानी में |
पन्नों में तुम,गीतों में तुम,
जीवित हम सबकी वाणी में |
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        अभिनन्दन है
कविकुन्दन,कविवर'कमलाप्रसाद',
कविताकिसलय,कवि कोविद तुम |
सृज कर कविताएं, दस हजार ,-
बन गये सृजक,जन-सेवक  तुम |
             ले जन्म 'विशेषी' में फिजि के,
             मथुरा   -  वृंदावन   शिक्षा      ली |
             कर सतत साधना हिन्दी की,
             'आयुर्वेद - शिरोमणि'  भी  ले  ली |
             शुक,व्यास सरीखे फिजि के तुम,
             शेखर , भगत , अशफाक   बने |
             लगन, परिश्रम, विद्वता बल पर ,
             तुम राष्ट्र -  कवि, निर्विवाद   बने |
हे महा-प्राण शत-शत प्रणाम,
कर बद्ध  हृदय से  वन्दन है |
हिन्दी प्रति त्याग तपस्या  का,
इस धरती पर अभिनन्दन है |


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