शनिवार, 28 अप्रैल 2012

सेवा में,
            संयुक्त सचिव महोदय,
            उच्चतर शिक्षा विभाग, 
            मानव संसाधन विकास मंत्रालय ,भारत सरकार
            शास्त्री भवन, नई दिल्ली 
                                                                                                        दिनांक - २७-०४-२०१२ 
विषय - द्वै मासिक पत्रिका 'भाषा' का विक्रय केंद्रीय हिंदी निदेशालय, पश्चिमी खंड-७, आरके पुरम से कराने 
             के सम्बन्ध में  ।
महोदय,
             निवेदन है की भाषा पत्रिका का संपादन केन्द्रीय हिंदी संस्थान के आर के पुरम मुख्यालय से होता 
है । जब की इसकी बिक्री नियंत्रक प्रकाशन विभाग सिविल लाइन्स दिल्ली जो विधान सभा दिल्ली के  -
पीछे अत्यंत दुरूह एवं मुख्य मार्ग से लगभग २ किलोमीटर पैदल चलने के उपरांत आने वाले प्रकाशन 
विभाग से होता है जिससे 'भाषा' की फुटकर बिक्री लगभग शून्य होती है और खरीदारी के लिए जाने वाला 
इतना अधिक परेशान होता है की फिर दोबारा जाने का नाम ही नहीं लेना चाहता ।
              मैं स्वयं तीन  बार वहां जाकर इतना परेशान हो चूका हूँ और ऐसे अनेक व्यक्तियों/साहित्यकारों 
को जनता हूँ जो कई बार परेशान हो कर पत्रिका खरीदने से तौबा कर चुके हैं ।
              अतः मेरा आपसे सानुरोध निवेदन है की कृपया 'भाषा' का विक्रय प्रबंध केन्द्रीय हिंदी निदेशालय 
आर के पुरम नई दिल्ली से जो अत्यंत सुगम पहुँच  में है से ही करने का कष्ट करें । यह जन हित में भी -
होगा ।        
               आदर सहित ।
                                                                                                                   भवदीय ,


                                                                                                              (डा.राज सक्सेना )
                                                                                              वरिष्ठ साहित्यकार एवं पूर्व नगर आयुक्त,
                                                                                              धनवर्षा , हनुमान मंदिर,खटीमा-262308 
                                                                                                                 ( उत्तराखंड )
प्रतिलिपि- निदेशक केन्द्रीय हिंदी निदेशालय,
पश्चिमी खंड-७,राम कृष्ण पुरम नई दिल्ली-६६ को सूचनार्थ एवं आवश्यक अग्रिम कार्यवाही हेतु प्रेषित ।

सोमवार, 23 अप्रैल 2012

'पदमावत'चौपाई हो ?

 डा.राज सक्सेना                            सम्पर्क-धनवर्षा,हनुमान मन्दिर,
(डा.राज किशोर सक्सेना)                                               खटीमा-262308 (उ.ख.)
पूर्व परियोजना निदेशक,न.वि.अभिकरण,पिथौरागढ                   फोन-05943252777
,पूर्व अधिशासी अधिकारी,मसूरी,                                      मोबा.- 9410718777,8057320999
पूर्व सहा.नगर आयुक्त नगर निगम देहरादून
--------------------------------------------------------------------------------------------------------------------------       
              'पदमावत'चौपाई हो ?
                                        डा.राज सक्सेना 
'सतसईया' का दोहा हो या,  'पदमावत'चौपाई हो ?
या बच्चन की 'मधुशाला'की,सबसे श्रेष्ठ रुबाई हो ?
           केश-कज्जली,छवि कुन्दन सी,
           चन्दन जैसी   गंध   लिये |
           देवलोक    से     पोर-पोर में,
           भर    लाई   क्या  छंद प्रिये | 
चातक चक्षु,चन्द्रमुख चंचल,चन्दनवन से आई हो ?
या बच्चन की 'मधुशाला'की,सबसे श्रेष्ठ रुबाई हो ?
           रक्त - कपोल ,   नासिका तीखी, 
           अधर  पगे, मधु    प्याले से |
           क्षण-क्षण मुस्कानों से पूरित-,
           मृग-नयना ,   मतवाले    से |
मदमाती,मदमस्त,मुखर सी,मस्त-मस्त अंगडाई हो ?
या बच्चन की 'मधुशाला'की, सबसे  श्रेष्ठ रुबाई हो ?
           देह-कलश  से बरस    रही है, 
          यौवन   की   रसधार    प्रिये  |
          पुष्प - लता सी  स्वर्ण-देह में,
          घुंघरू   सी   झनकार   प्रिये |
मलयागिरि से चली मस्त हो,  मंद वही पुरवाई हो ?                                                                      
या बच्चन की 'मधुशाला'की ,सबसे श्रेष्ठ रुबाई हो ?
          हे  सुमुखि तुम  क्यों आई हो ?,
          धरती पर  नव-छन्द लिए |
          महक रहा  जो  मधुर गंध  से,
          अमृत-घट  निज  संग  लिए |
सप्त-लोक के सप्त-सुरों की , सतरंगी  -  शहनाई हो ?
या बच्चन की 'मधुशाला'की ,सबसे श्रेष्ठ रुबाई हो ?

शनिवार, 21 अप्रैल 2012

दोहे


            दोहे
जिस आंचल से ढांक सर, आई वधू निकोर |
वही  महाजन के यहां,मिला सिसकता भोर |
           -०-
फिरा खोजता न मिला,किसी वृक्ष पर ठौर |
वापस  पंछी आ गया,फिर पिंजरे की ओर |
           -०-
गिरती हुई दिवार का,हुआ भाग्य भी चूर |
बच्चे तक रहने लगे,उस से कोसों  दूर  |
           -०-
सिसक रही है संस्कृति,लुप्त वेद का ज्ञान |
ज्ञान बांटते फिर रहे, बाइबल और कुरान |
           -०-
पिंडली,जंघा,कटि,उदर,दिये वक्ष तक खोल |
रखा कहां पर आवरण,नवल सभ्यता बोल  |
          -०-
जिन्हे घ्रणा से देखते, बना अजब संयोग |
हुकम चलाते शीर्ष से,वे उत्पाती   लोग  |
          -०-

तुलसी की चौपाई हो ?

            
     डा.राज सक्सेना                            सम्पर्क-धनवर्षा,हनुमान मन्दिर,
(डा.राज किशोर सक्सेना)                                               खटीमा-262308 (उ.ख.)
पूर्व परियोजना निदेशक,न.वि.अभिकरण,पिथौरागढ                   फोन-05943252777
,पूर्व अधिशासी अधिकारी,मसूरी,                                      मोबा.- 9410718777,8057320999
पूर्व सहा.नगर आयुक्त नगर निगम देहरादून
--------------------------------------------------------------------------------------------------------------------------       
              तुलसी की चौपाई हो ?
सतसैया का दोहा हो या,  तुलसी  की चौपाई हो ?
इन्द्र-लोक से सीधे चलकर  , आई मदिर रूबाई हो ?
      केश कज्जली, रंग कुन्दन सा,
      चन्दन जैसी   गंध   लिये |
           देवलोक    से     पोर-पोर में,
           भर    लाई   क्या  छंद प्रिये |
मंद सुगन्धित पुरवाई की, मस्त-मस्त अंगड़ाई हो  ?
सतसैया का दोहा हो या,  तुलसी  की चौपाई हो ?
      रक्त-कपोल, नासिका शुक सी,
      अधर पगे मधु से लगते हैं |
           क्षण-क्षण मुस्कानों से पूरित,
      धवलदन्त  दिपदिप करते हैं |
माखन हो या मधु का गोला ,मिश्री की बन आई  हो ?
सतसैया का दोहा हो या,  तुलसी  की चौपाई हो ?
      देह कलश  से बरस    रही है, 
          यौवन   की   रसधार    प्रिये  |
      पुष्प - लता सी  स्वर्ण-देह में,
          घुंघरू   सी   झनकार   प्रिये |
देवलोक का सारा वैभव ,  सजा देह  पर  लाई हो ?
सतसैया का दोहा हो या,    तुलसी की चौपाई हो ?
            अहा !  सुन्दरी आई हो   तुम,
        धरती पर  नव-छन्द लिए |
            महक रहा  जो  मधुर गंध  से,
            अमृत-घट  निज  संग  लिए |
सप्त-लोक के सप्त-सुरों की , सतरंगी  -  शहनाई हो ?
सतसैया का दोहा हो या,    तुलसी की चौपाई हो ?




            




मंगलवार, 17 अप्रैल 2012

 डा.राज सक्सेना                            सम्पर्क-धनवर्षा,हनुमान मन्दिर,
 (डा.राज किशोर सक्सेना)                                               खटीमा-262308 (उ.ख.)
पूर्व जिला परियोजना निदेशक,न.वि.अभिकरण, पिथौरागढ,              फोन-05943252777
पूर्व अधिशासी अधिकारी,मसूरी,                                         मोबा.- 9410718777
पूर्व सहा.नगर आयुक्त नगर निगम देहरादून                                                          -8057320999
________________________________________________________________________________  


                 क्या बन्दर थे हनुमान 
                                             -  डा.राज सक्सेना                            
          आम मान्यता है और जगह-जगह मन्दिरों में स्थापित हनुमान जी की 
मूर्तियों को देख कर 99.999 प्रतिशत हिन्दू और शत प्रतिशत विधर्मी विश्वास करते 
हैं कि भगवान के रूप में प्रतिस्थापित हनुमान बानर(बन्दर) थे या हैं | वस्तुतः यह 
एक भ्रान्त धारणा है | इस भ्रान्त धारणा के स्थापन में तुलती रामायण'राम चरित-
मानस' के अर्थों का अनर्थ निकालने और जनमानस के समक्ष उसी रूप में प्रस्तुत 
कर कुछ अल्प बुद्धि और अल्प ज्ञानी पोंगापंडितों का हाथ रहा है | जनसाधारण की 
तत्कालीन भाषा अवधी में रचित इस महाकाव्य में महर्षि बाल्मीकि विरचित'रामा-
यण'के आधार पर तत्कालीन आवश्यकता के अनुरूप, मुस्लिम अत्याचारों के अधीन 
नैराश्य ग्रसित भारतीय जनता को अवलम्बन प्रदान करने की पुनीत भावना को लेकर 
महाकवि तुलसी दास ने, बाल्मीकि रामायण के इतिहास पुरूष राम को विष्णु के अव-
तार मर्यादा पुरूषोत्तम राम के अतीन्द्रीय देव भगवान राम के रूप में प्रस्तुत किया है |
यही नहीं तुलसी ने राम चरित मानस के कुछ मुख्य पात्रों को भी देवस्वरूप या फिर 
सर्वशक्तिमान भगवान स्वरूप प्रस्तुत किया है | इनमें सबसे अधिक प्रमुखता वीरवर 
हनुमान के पात्र को प्रदान करते हुए सूर्य की कृपा से पवनपुत्र बताया गया है | -
सम्भवतः यह उनकी तीव्रतम चाल(गति)के लिये अलंकारिक विशेषण हो किन्तु कुछ
पोंगा पंडितों ने अर्थ का अनर्थ कर उन्हे हवा हवाई बना कर रख दिया | आज एकाध 
भक्त को छोड़ कर लगभग सभी अन्धभक्त उन्हें बन्दर ही मानते हैं और उनके वंशज 
मानकर बन्दरों के प्रति श्रद्धा भाव रखते है | एक अनर्थ का कितना बड़ा दुश्परिणाम | 
जबकि लंका में सीता को खोज लेने के पश्चात जब हनुमान उन्हें अपनी पीठ पर बैठा
कर ले जाने का प्रस्ताव करते हैं तो सीता पर पुरूष स्पर्श के महापाप की भागी होने
के स्थान पर उस नर्क में ही रहना ज्यादा उचित समझती हैं | इससे अधिक प्रमाण
की क्या आवश्यकता है |
           रामायण में राक्षसों के बाद बानर जाति का सवसे अधिक उल्लेख -
हुआ है |थी तो वह भी दक्षिण भारत की एक अनार्य जाति ही किन्तु इस जाति ने 
आर्यों(राम) के विरोध के स्थान पर राक्षसों से आर्यों के युद्ध में राम का साथ दिया
सिर्फ यही नहीं उन्होंने तो पूर्व से ही आर्य संस्कृति के तमाम आचरण स्वीकार कर 
रखे थे | बाली से रावण का युद्ध और बाली तथा सुग्रीव के क्रिया कलाप तथा तत्का-
लीन बानर राज्य की बाल्मीकि द्वारा प्रदर्शित परिस्थितियों से यह दर्पण के समान -
स्पष्ट हो जाता है | वास्तविकता यह है कि विंध्यपर्वत के दक्षिण में घने वनों मॅं 
निवास करने वाली जनजाति थी बानर | वे बनचर थे इस लिये वानर कहे गये या
फिर उनकी मुखाकृति वानरों से मिलती जुलती थी अथवा अपने चंचल स्वभाव के -
कारण इन्हें वानर कहा गया या फिर इनके पीछे लगी पूंछ के कारण(इस पर आगे - 
चर्चा करेंगे)ये बानर कहलाए | यह इतिहास के गर्भ में है | केवल नामकरण के ही
आधार पर बन्दर मान लेना उचित नहीं होगा | इस सम्बन्ध में केवल एक उदाहरण 
ही पर्याप्त होगा | दक्षिण में एक जाति'नाग'पाई जाती है | क्या वे लोग नाग(सर्प) हैं | 
नागों का लंका के कुछ भागों पर ही नहीं प्राचीन मलाबार प्रदेश पर भी काफी दिनों तक 
अधिकार रहने के प्रमाण मिलते हैं | रामायण में सुरसा को नागों की माता और समुद्र 
को उसका अधिष्ठान बताया गया है | मैनाक और महेन्द्र पर्वतों की गुफाओं मे भी  ये 
निवास करते थे |समुद्र लांघने की हनुमान की घट्ना को नागों ने प्रत्यक्ष(५/१/८४-
बा.रामा.)देखा था | नागों की स्त्रियां अपनी सुन्दरता के लिये प्रसिद्ध थीं(५/१२/२१-
बा.रा.)| नागों की कई कन्याओं का अपहरण रावण ने किया था(५/१२/२२ बा.रा.)|
रावंण ने नागों की राजधानी भोगवती नगरी पर आक्रमण करके(७/२३/५,६/७/९,-
३/३२/१४)वासुकी,तक्षक,शंख और जटी नामक प्रमुख नागराजों को धूल चटाई थी |
कालान्तर में नाग जाति के इक्का दुक्का को छोड़कर प्रथम शताब्दी में प्रभुत्व में आई 
चेर जाति में समाहित होने के प्रमाण हैं(सप्तम ओरिएंटल कांफ्रेन्स विवरणिका-१९३३-
सा उथ इन्डिया इन द रामायन-वी.आर.रामचन्द्र )|
         स्वंय तुल्सी दास ने लंका की शोभा का वर्णन करते हुए लिखा है -
               वन बाग उपवन वाटिका सर कूप वापी सोहहिं,
               नर नाग सुर गंधर्व कन्या रूप मुनि मन मोहहिं | 
           इसी प्रकार बाल्मीकि रामायण में रावण को जगह-जगह दशानन,दश-
कन्धर,दशमुख और दशग्रीव आदि पर्यायों से सम्बोधित किया गया है | इसका शाब्दिक 
अर्थ दस मुख या दस सिर मानकर रावण को दस सिरों वाला अजूबा मानलिया गया |
जबकि बाल्मीकि द्वारा प्रयुक्त इन विशेषणों का तात्पर्य-"द्शसु दिक्षु आननं(मुखाज्ञा)-
यस्य सः दशाननः अर्थात रावण का आदेश दसों दिशाओं में व्याप्त था | इसी लिये वह
दशानन या दशमुख कहलाता था | यही नहीं कवि ने पक्षीराज जटायु के मुख से  ही 
कहलाया है कि वह दशरथ का मित्र है | रामायण में घटे प्रसंगो और घटनाओं से ही 
स्पष्ट हो जाता है कि जटायु गिद्ध नहीं मनुष्य था | कवि ने आर्यों के आदरसूचक -
शब्द आर्य का कई बार जटायू के लिये प्रयोग किया है | रामायण में जगह-जगह -
जटायू के लिये पक्षी शब्द का प्रयोग भी किया गया है | इसका समाधान ताड्यब्राह्म्ण 
से हो जाता है जिसमें उल्लिखित है कि-"ये वै विद्वांसस्ते पक्षिणो ये  विद्वांसस्ते  पक्षा"
(ता.ब्रा.१४/१/१३)अर्थात जो जो विद्वान हैं वे पक्षी और जो अविद्वान(मूर्ख) हैं वे पक्ष-
रहित हैं |जटायु वान प्रस्थियों के समान जीवन व्यतीत कर रहे थे | ज्ञान तथा कर्म 
उनके दो पक्ष थे जिनसे उड़कर(माध्यम से)वे परमात्मा प्राप्ति का प्रयास कर रहे थे |
अतः उनके लिये पक्षी का सम्बोधन सर्वथा उचित है |
         वानरों का अपना आर्यों से मिलता जुलता राजनैतिक संगठन था इसका
वर्णन बाल्मीकि ने अनेक प्रसंगों में किया है | उल्लेख कपि राज्य के रूप में किया 
गया है | जिससे स्पष्ट होता है कि उनकी एक सुसंगठित शासन व्यवस्था थी एक -
प्रसंग में तो बाली के पुत्र अंगद ने सुग्रीव से प्रथक वानर राज्य गठन का विचार तक 
कर लिया था (०४/५४/०१)| सीता की खोज में दक्षिण गए वानरों के समूह से समुद्र 
की अलांघ्यता महसूस कर अंगद कहते है-          
                  कस्य प्रसाद्दारांश्च पुत्रांश्चैव गृहाणि च |
                  इतो निवृत्ता पश्येम सिद्धार्थाः सुखिनो वयम् |(०४/४६/१७)
अर्थात- किसके प्रसाद से अब हम लोगों का प्रयोजन सिद्ध होगा और हम सुख पूर्वक -
लौटकर अपनी स्त्रियों,पुत्रों अट्टालिकाओं व गृहों को फिर देख पाएंगे |
          विभिन्न स्थानों पर बाल्मीकि ने वानर नर नारियों की मद्यप्रियता का भी उल्लेख
 किया है | वानरों के सुन्दर वस्त्राभूषणों का भी हृदयग्राही वर्णन स्थान-स्थान पर
 आता है | सुग्रीव के राजप्रसाद की रमणियां"भूषणोत्तम भूषिताः (०४/३३/२३)थीं |
          वानर पुष्प,गंध,प्रसाधन और अंगराग के प्रति आग्रही थे|किष्किंधा का
वायुमण्डल चंदन, अगरु और कमलों की मधुर गंध से सुवासित रहता था (चन्दनागुरु-
पद्मानां गन्धैः सुरभिगन्धिताम्(०४/३३/०७)|  
         सुग्रीव का राज्याभिषेक जो बाल्मीकि जी ने(समकालीन एंव इतिहासवेत्ता-
होने के कारण)वर्णित किया है शास्त्रीय विधिसम्मत परम्परागत प्रणाली के अधीन ही 
सम्पन्न हुआ था | इस तथ्य का द्योतक है कि वानर आर्य परम्पराओं और रिति -
रिवाजों का पालन करते थे अर्थात आर्य परम्पराओं के हामी थे | बाली का आर्यरीति 
से अन्तिम संस्कार और सुग्रीव का आर्य मंत्रों और रीति से राज्याभिषेक भी सिद्ध -
करता है कि चाहे वानर आर्येतर जाति हों थे उनके अनुपालनकर्ता मानव ही बन्दर -
नहीं | यहां यह भी उल्लेख करना आवश्यक होगा कि बाल्मीकि रामायण जो तत्का-
लीन इतिहास ग्रंथ के रूप में लिखा गया था के अनुसार वानरों की जाति पर्याप्त सु-
संस्कृत और सुशिक्षित जनजाति थी | सुग्रीव के सचिव वीरवर हनुमान बाल्मीकि -
रामायण के सर्वप्रमुख-उल्लिखित वानर हैं | जिन्होंने अपनी विद्वतता से मर्यादा पु-
रुषोत्तम श्री राम को सबसे अधिक प्रभावित किया और उनके प्रियों में सर्वोच्च स्थान 
भी प्राप्त करने में सफल रहे | वह वाक्यज्ञ और वाक्कुशल(०४/०३/२४) तो थे ही 
व्याकरण,व्युत्पत्ति और अलंकारों के सिद्धहस्ता भी थे | उनसे बात करके श्रीराम ने
यह अनुमान लगा लिया कि- जिसे ऋग्वेद की शिक्षा न मिली हो, जिसने यजुर्वेद 
का अभ्यास न किया हो तथा जो साम वेद का विद्वान न हो वह इस प्रकार की -
सुन्दर भाषा का प्रयोग( नानृग्वेदविनीतस्य नायजुर्वेदधारिणः | नासामवेद्विदुषः शक्य-
मेवं विभाषितुम् || नूनं व्याकरणं कृत्स्नमनेन बहुधा श्रुतम् | बहु व्याहरतानेन न
किंचिदपशव्दितम् ||०४/०३/२८-९) नहीं कर सकता | हनुमान उन आदर्श सचिवों 
में सर्वश्रेष्ठ थे जो मात्र वाणी प्रयोग से ही अपना प्रयोजन प्राप्त कर सकते थे |     
         सार संक्षेप में हनुमान एक पूर्णमानव,बल,शूरता,शास्त्रज्ञान पारंगत,
उदारता,पराक्रम,दक्षता,तेज,क्षमा,धैर्य,स्थिरता,विनय आदि उत्तमोत्तम गुणसम्पन्न
(एते चान्ये च बहवो गुणास्त्वय्येव शोभनाः|०६/११३/२६) पूर्ण मानव थे अर्ध मा-
नव या बन्दर नहीं थे |
          और अब अन्त में उस तथ्य पर विचार जिसके आधार पर वानरों और 
विशेषकर वीरवर हनुमान की बन्दर स्वरूप की कल्पना हुई | अर्थात उनकी पूंछ  के
यथार्थ पर विचार करें |
          "वानर शब्द की इस जाति के लिए बाल्मीकि रामायण में १०८० बार -
आवृति हुई है तथा इसी के पर्याय स्वरूप'वन गोचर','वन कोविद','वनचारी'और 
'वनौकस'शब्दों का भी प्रयोग किया गया है | इससे स्पष्ट होता है कि वानर शब्द -
बन्दर का सूचक न होकर वनवासी का द्योतक है | इसकी व्युत्पत्ति इस प्रकार करनी 
चाहिये-वनसि(अरण्ये)भवः चरो वा वानरः=वनौकसः,आरण्यकः |  वानरों के लिये -
हरि शब्द ५४० बार आया है |इसे भी वनवासी आदि समासों से स्पष्ट किया गया है |
'प्लवंग'शब्द जो दौड़ने की क्षमता का व्यंजक है,२४० बार प्रयुक्त हुआ है | वानरों 
की कूदने दौड़ने की प्रवृत्ति को सूचित करने के लिये प्लवंग या प्लवंगम् शब्द का व्य-
हार उपयुक्त भी है | हनुमान उस युग के एक अत्यन्त शीघ्रगामी दौड़ाक या धावक थे |
इसीलिये उनकी सेवाओं की कईबार आवश्यकता पड़ी थी | कपि शब्द ४२० बार आया 
है,जो सामान्यतः बन्दर के अर्थ में प्रयुक्त होता है | क्योंकि रामायण में वानरों को -
पूंछ युक्त प्राणी बताया गया है,इसलिये वे कपयः थे | वानरों को मनुष्य मानने में -
सबसे बड़ी बाधा यही पूंछ है | पर यदि सूक्ष्मता से देखा जाय तो यह पूंछ हाथ पैर 
के समान शरीर का अंग न होकर वानरों की एक विशिष्ट जातीय निशानी थी,जो संभवतः
बाहर से लगाई जाती थी | तभी तो हनुमान की पूंछ जलाए जाने पर भी उन्हें कोई 
शारिरिक कष्ट नहीं हुआ | रावण ने पूंछ को कपियों का सर्वाधिक प्रिय भूषण बताया 
था-'कपीनां किल लांगूलमिष्टं भवति भूषणम्(०५/५३/०३)"-(रामायणकालीन समाज-
शांति कुमार नानूराम व्यास) |
  
          इस संबन्ध में यह अवगत कराना भी उचित होगा कि पूर्वोत्तर राज्यों में 
अभी भी ऐसी कई जातियां हैं जो अपने सर पर जंगली पशुओं के दो सीग धारण करके 
अपनी शक्ति और वीरता का परिचय हर उत्सव के समय  देते हैं तो क्या उन्हें जंगली
भैंसा या बैल मानलिया जाय | मध्य प्रदेश की मुण्डा जनजाति में भी यही परिपाटी है |
शायद शक्ति प्रदर्शन के साथ ही यह सर की सुरक्षा का एक सरल उपाय होता हो |जिस 
प्रकार क्षत्रिय या सैनिक अपनी पीठ पर सुरक्षा के लिये गैंडे की खाल से बनी ढाल को 
पहनते रहे हैं हो सकता है वानर वीर भी अपने पृष्ट भाग क़ी सुरक्षा हेतु बानर की पूंछ 
के समान धातु या फिर लकड़ी अथवा  किसी अन्य हल्की वस्तु से बनी दोहरी वानर -
पूंछ को पीछे से जिधर आंखें या कोई इन्द्रिय सजग नहीं होती होतीं की ओर से हमला
बचाने के लिये लगाया जाता हो | क्योंकि बाली,सुग्रीव या अंगद की पूंछ का कहीं पर 
भी कोई जिक्र नही आता है यह भी अजीब बात है या नहीं ? इस विषय पर भी खोज 
और गहरा  अध्ययन आवश्यक है |ताकि कारणों का पता चल सके |
         यहां यह स्पष्ट करना भी उचित होगा कि बाल्मीकि रामायण में किसी भी 
जगह या प्रसंग में वानरों की स्त्रियों के पूंछ होने का उल्लेख या आभास तक नहीं है |
          यह भी उल्लेखनीय है कि अन्वेषकों ने पूंछ लगाने वाले लोगों या जातियों 
का भी पता लगा लिया है |बंगाल के कवि मातृगुप्त हनुमान के अवतार माने जाते थे,
और वे अपने पीछे एक पूंछ लगाए रहते थे (बंगाली रामायण पृष्ट्-२५,दिनेश चन्द्र सेन)
भारत के एक राजपरिवार में राज्याभिषेक के समय पूंछ धारण कर राज्यारोहण का 
रिवाज था ( वही )| वीर विनायक ने अपने अण्डमान संसमरण में लिखा है कि वहां 
पूंछ लगाने वाली  एक जनजाति रहती है(महाराष्ट्रीय कृत रामायण-समालोचना)|
         उपरोक्त तथ्यों से इस भ्रान्ति का स्पष्ट निराकरण हो जाता है कि वानर 
नामक जनजाति जिसके तत्कालीन प्रमुख सदस्य वीरवर हनुमान थे एक पूर्ण मानव 
जाति थी ,  बन्दर प्रजाति नहीं | हां उनकी अत्यधिक चपलता,निरंकुश और रूखा -
स्वभाव,चेहरे की (संभवतः पीला रंग और मंगोलायड मुखाकृति जो थोडी बन्दरों  से 
मिलती होती है)बनावट के कारण ही तथा अनियमित यौन उच्छृंखलता,वनों,पहाड़ों 
में निवास,नखों और दांतों का शस्त्र रुप में प्रयोग और क्रोध या हर्ष में किलकारियां
मारने की आदत के कारण उन्हें एक अलग पहचान देने के लिये ही आर्यों ने उनके 
लिये कपि या शाखामृग विशेषण का प्रयोग किया गया हो और जो आदतों पर सटीक
बैठ जाने के कारण आमतौर से प्रयोग होने लगा हो | जिसने इनके पूर्व जातिनाम 
का स्थान ले लिया हो | इस जनजाति के किसी अन्य जाति में विलय या संस्कृति 
नष्ट हो जाने के उपरान्त कपि शब्द ने, पर्याय के स्थान पर प्रमुख उदबोधन का -
स्थान ले लिया हो | मन्मथ राय ने वानरों को भारत के मूल निवासी'व्रात्य'माना
है (चिं.वि.वैद्य-द रिडिल आफ दि रामायण पृ.२६)|  के.एस.रामास्वामी शास्त्री ने -
वानरों को आर्य जाति माना है | जो दक्षिण में बस जाने के कारण आर्य समाज से 
दूर होकर जंगलों में सिमट गई और फिर आर्य संस्कृति के पुनः निकट आने पर 
उसी में विलीन हो गई| व्हीलर और गोरेशियो आदि अन्य विद्वान दक्षिण भारत की 
पहाड़ियों पर निवास करने वाली अनार्य जाति मानते हैं जो आर्यों के सन्निकट आ-
कर उन्हीं की संस्कृति में समाहित हो गई | यह जनजाति या जाति चाहे आर्य रही 
हो या अनार्य थी एक विकसित आर्य संस्क़ृति के निकट, ललित कलाओं के साथ
चिकित्सा,युद्ध कला,रुप परिवर्तन कला और अभियन्त्रण ( अविश्वसनीय लम्बे-
लम्बे पुल बनाने की कला सहित),गुप्तचरी और मायावी शक्तियों के प्रयोग में बहुत 
चतुर मानव जाति | कोई पशुजाति नही थी |  इसके तत्कालीन सिरमौर वीर-
वर हनुमान एक श्रेष्ठ मानव थे बन्दर नहीं |
                            धन वर्षा,हनुमान मन्दिर खटीमा-262308
                           मो०-09410718777, 08057320999 (उ०ख०) 
          
                  

शनिवार, 14 अप्रैल 2012

क्या बन्दर थे हनुमान


ग़ज़लगो-भारतेन्दु हरिश्चन्द्र


     डा.राज सक्सेना                            सम्पर्क-धनवर्षा,हनुमान मन्दिर,
(डा.राज किशोर सक्सेना)                                               खटीमा-262308 (उ.ख.)
पूर्व परियोजना निदेशक,न.वि.अभिकरण,                                फोन-05943252777
पिथौरागढ,पूर्व अधिशासी अधिकारी,मसूरी,                             मोबा.- 9410718777
पूर्व सहा.नगर आयुक्त नगर निगम देहरादून
--------------------------------------------------------------------------------------------------------------------------      

            ग़ज़लगो-भारतेन्दु हरिश्चन्द्र
                           - डा.राज सक्सेना
        यूं तो ग़ज़ल हिन्दी कवियों की अब मुख्य कविता विधा बनती जा रही है किन्तु है
यह फ़ारसी से उर्दू में आकर उर्दू की मुख्य काव्यविधा ही | अधिकांश हिन्दी समर्थकों ने इसे
अभारतीय मानते हुए इस का बहिष्कार ही किया | किन्तु अब इसकी लोकप्रियता में लगा-
तार वृद्धि हो रही है | बहुत कम लोग जानते हैं कि स्थापित ग़ज़ल विरोध परम्परा को कि-
नारे कर भारतेन्दु ने ग़ज़लें भी लिखी है किन्तु यहां भी लीक से हट कर उन्होंने ग़ज़ल के
अर्थ को ही बदल कर हिन्दी कवियों के लिये एक नया रास्ता खोल दिया | एक ऐसा रास्ता
जिससे चारों ओर राहें खुली हुईं थीं | ग़ज़ल को उन्होंने परम्परागत इश्क,जुदाई,समर्पण,
मिलन और प्रेमी(प्रेमिका के खुदा से भी बुलन्द दर्जे) को जन सामान्य की सर्वदिशामय -
कविता का रूप दे दिया | भारतेन्दु कालजयी व्यक्तित्व थे -
            वे - हम जिधर भी चल पड़ेंगे रास्ता बन जाएगा |  के प्रतीक थे |
           हिन्दी गद्य को तो उन्होंने नई दिशा दी ही कविता के भी नए प्रतिमान पैदा किये |
सम्भवतः लक्ष्मी सागर वार्ष्णेय ने इसी लिये उनके लिये कहा,"भारतेन्दु केवल अंग्रेजी ही -
नहीं,संस्कृत, अरबी,फ़ारसी के खुले खजाने से लूट मचाकर निज भाषा भण्डार भरने के -
कट्टर पक्षपाती थे | उनकी इसी सोच ने आज ग़ज़ल को हिन्दी भाषा का एक आभूषंण
बना दिया है | इस सम्बन्ध में यह भी कहना उचित होगा कि भारतेन्दु जी सामान्यतः
हिन्दी के क्लिष्ट रूप के लिये कभी आग्रही नहीं रहे | उन्होंने अधिकतर सामान्य बोल-
चाल की भाषा का ही प्रयोग किया जिसे उस समय देवनागरी लिपि में लिखी उर्दू  ही -
समझा जाता था | इसीलिये ब्रजरत्न दास ने उनके लिये कहा,"भारतेन्दु जी,उर्दू के सच्चे
शायर थे,... उन्होंने उर्दू भाषा में कविता भी काफी की है और इनकी हिन्दी कविता पर
भी इस उर्दू जानकारी का जो असर पड़ा है वह भी उल्लिखित हो चुका है |(भा.ह.च.-
ब्रज रत्न दास)| भारतेन्दु के इस समन्वयवादी दृष्ठिकोण की विशेषता के कारण ही आचार्य
राम चन्द्र शुक्ल ने उल्लेखित किया कि,"साहित्य के एक नवीन युग के आदि में प्रवर्तक
के रूप में खड़े होकर उन्होंने यह भी प्रदर्शित किया कि नये या बाहरी भावों को पचाकर -
इस प्रकार मिलाना चाहिए कि अपने ही साहित्य के विकसित अंग से लगें | प्राचीन-नवीन
के उस सन्धिकाल में जैसी शीतल कला का संचार अपेक्षित था वैसी ही शीतल कला के साथ
भारतेन्दु का उदय हुआ, इसमें संदेह नहीं |"(हि.सा.का इतिहास-आ.रा.च्.शुक्ल)|
         भारतेन्दु की इस समन्वयवादी विशेष नीति के मूल में लगता है कि वे समझ
गए थे कि हिन्दू मुस्लिम एक जुटता से ही अंगेजी और अंग्रजों का विरोध किया जा सकता
था तथा यह भी कि हिन्दी भाषा का शब्द भंडार बढाने के लिये यह भी आवश्यक था   कि
उसमें अन्य भाषाओं विशेष रूप से सदियों से साथ पल बढ रही उर्दू के सरल शब्दों को भी
लिया जाय | कुछ अरबी, फारसी के शब्द भी लिये जाएं ताकि यह एक समर्थ और सर्व-
ग्राही भाषा का रूप ले सके |
          जहां तक ग़ज़लगोई का प्रश्न है वे 'रसा' उपनाम से ग़ज़लें लिखा करते थे |
अनेक विद्वानों ने उनकी ग़ज़लों को सराहा है और वे उन्हें हिन्दी ग़ज़लगोई की एक सशक्त
कड़ी के रूप में उल्लिखित करते है | डा.रमा सिंह के अनुसार,"हिन्दी ग़ज़ल का प्रारम्भ
वैसे तो अमीर खुसरो से माना जाता है परन्तु अमीर खुसरो ने भी हिन्दी भाषा में बहुत -
ग़ज़लें नहीं कहीं |अमीर खुसरो से लेकर भारतेन्दु पूर्व तक ग़ज़लें कही तो गईं किन्तु हिन्दी
ग़ज़ल की दृष्टि से इस काल को अंधकार का काल कहा जाता है | हिन्दी साहित्य में आधु-
निक काल के जन्मदाता भारतेन्दु से ही ग़ज़ल का प्रारम्भ माना जाता है |"(हिन्दी ग़ज़ल के
विविध आयाम-सरदार मुज़ावर)| हिन्दी में ग़ज़ल की विधिवत शुरुआत डा.राम कुमार कृषक
भी भारतेन्दु से ही मानते हैं |
          परम्परागत ग़ज़ल के क्षेत्र बहुत सीमित थे | इस परम्परा में भारतेन्दु का
सबसे उल्लेखनीय योगदान परम्पराओं के संकीर्ण दायरों को तोड़ने का रहा है | शाश्वत -
विषय प्रेम के साथ नायिका ही केन्द्रबिन्दु रहती थी जिसके वियोग में नायक का हृदय हर
समय तड़पता रहता था | इश्क मिजाज़ी से निकली तो सूफ़ियों की इश्क हक़ीक़ी मे उलझ
कर रह गई | किन्तु भारतेन्दु ने सामाजिकता,दार्शनिकता और भक्तिभाव के साथ-साथ ही
पूर्व स्थापित परम्पराओं का भी कहीं-कहीं निर्वहन किया है | यही भारतेन्दु की इस संबध
मे व्यापक विशेषता रही है | इस संबध में विष्णुकांत शास्त्री जी का कथन दृष्टव्य है-
"मेरी दृष्टि में भारतेन्दु की उर्दू को सबसे बड़ी देन यह है कि उन्होंने उसमें भी भारतीय -
भावना और रीति-नीति की कविताएं लिखी हैं | परम्परागत ग़ज़लगोई का उदाहरण देखें-
         ग़ज़ब है सुरमः देकर आज वो बाहर निकलते हैं |
               अभी से कुछ दिलेमुज़्तर पर अपने तीर चलते हैं |
               ज़रा देखो तो ऐ अहले सुख़न ज़ोर-ए-सनाअत को,
         नई बंदिश है मजमूं नूर के  सांचे में   ढलते हैं |
         कृष्ण भगवान पर कही गई अपनी ग़ज़ल में भारतेन्दु सीधे ब्रह्मवाद और भक्ति-
वाद पर उतर कर उसे सूफी विचारों का जामा भी पहना देते प्रतीत होते है | यह है सच्चा
समन्वय जो भारतेन्दु जी ने ब्रह्मवाद और सूफ़ीवाद में करके दिखा दिया है |
         जहां देखो वहां मौजूद मेरा कृष्ण प्यारा है |
         उसी का सब है जलवा जो जहां में आशकारा है |
         भला मखलूक ख़ालिक की सिफ़त समझे कहां कुदरत,
     इसी से नेति-नेति ऐ यार वेदों ने पुकारा है |
         आगे वे कहते हैं-
         तेरा दम भरते हैं हिन्दू,अगर नाकूस बजता है,
         तुझे ही शेख ने प्यारे अजां देकर पुकारा है |
                जो बुत पत्थर है तो काबे में क्या जुज ख़ाको पत्थर है,
         बहुत भूला है वह इस फ़र्क में सर जिसने मारा है |
                न होते जलवःगर तुम तो,यह गिरजा कब का गिर जाता |
                निसारा को भी तो आखिर तुम्हारा ही सहारा  है |
                तुम्हारा नूर है हर शै में कह से कोह तक यारो,
         इसी से कहके हर-हर तुमको हिन्दू ने पुकारा है |
         इस ग़ज़ल के माध्यम से कवि भारतेन्दु सीधे और सरल शब्दों में पाठक या
श्रोता के दिलों   में  हिन्दू धर्म की महत्ता प्रमाणित करते हुए धर्म समन्वय के अपने
पुनीत मिशन में सफल हुए हैं | जब मनुष्य मृत्यु के सन्निकट होता है तब उसे सांसा-
रिक निस्सारता,नश्वरता और अनावश्यकता का आभास होता है | वे कहते हैं-
                  आ गई सर पर क़ज़ा लो सारा सामां रह गया |
          ऐ फ़लक़ क्या-क्या हमारे दिल में अरमां रह गया |
                      *
          ऐ अज़ल जल्दी रिहाई दे,न बस ताख़ीर कर,        
          ख़ान-ऐ-तन भी मुझे अब क़ैदख़ाना हो गया |    
          ख़्वाबेग़फ़लत से ज़रा देखो तो कब चौंके हैं हम,
          क़ाफ़िला मुल्के अदम को जब रवाना हो गया |  
          या फिर-
          रिहा करता नहीं सय्याद हम को मौसिम-ऐ-गुल में,
          कफ़स में दम जो घबराता है सर दे दे पटकते हैं |
          हिन्दी के पहले ग़ज़लगो के रूप में भारतेन्दु ने हिन्दी ग़ज़ल को उर्दू ग़ज़ल
की परम्परागत छवि के साथ एक नया रूप दिया है | बिना हिन्दी शब्दों के प्रति आग्रह -
पाले उन्होंने उर्दू और फ़ारसी शब्दों का भरपूर प्रयोग किया है | भारतेन्दु की ग़ज़ले दो -
प्राचीन संस्कृतियों के बीच समन्वय स्थापित करती हैं,सौहार्द उत्पन्न करती और अलिखित
तारतम्य भी बनाए रखती हैं | यही भारतेन्दु की ग़ज़लगोई की विशेषता है |
         ग़ज़ल के क्षेत्र में भारतेन्दु ने चहुंमुखी पैंतरेबाजी की तो वे ग़ज़ल की हास्य-
व्यंग्य विधा को कैसे छोड़ देते यह तो बहुत कम लोगों को ही मालूम है | उनकी हास्य की
ग़ज़लें कम हैं मगर है | जिनका प्रयोग अपवाद स्वरूप उन्होंने अपने गद्य व्यंग्य के साथ
भी किया है | उनके व्यंग्य आलेख 'मुशायरा' में उनकी इस कला के भी साक्षात दर्शन -
होते हैं | उनका काल्पनिक कवि क्या कहता है-
         फिर उन्हें हैज़ा हुआ फिर सब बदन नीला हुआ |
                फिर न आने का मेरे घर में नया  हीला  हुआ |
                क़हरे हक नाज़िल हुआ पत्थर पड़े वे मर गये ,
         अब्र का टुकड़ा उन्हें तबरम  अबा-बीला  हुआ |
                फिर उन्हें आया पसीना सब बदन  ठंडा  हुआ ,
         मुफ़लिसी में फिलमसल आंटा अजी गीला हुआ |
                नाम सुनते ही टिकस का आह करके मर गए,
         जान ली कानून ने, बस मौत का हीला  हुआ |
               आप शेखी पर चढे थे मसले अफगानाने बद्,
         ख़ूब शुद गदक़ों के मारे सब बदन ढीला  हुआ |
                क़ैसरे हिन्दोस्तां अब जान इनकी बख्श   दो,
         देख लो रंज़िश से सब,इनका बदन पीला हुआ |
          और अब देखिए कम पढे लिखे किसी शोहदे की भाषा और उसी के भावों को
भारतेन्दु जी की व्यंग्य ग़ज़ल में-
          सान सौकत तेरे आसिक की मेरी जान जे है |
                 होंगे  सुलफा  इसी दरवाजे पे अरमान जे है |
                 कहीं सुह्दे भी पिचकते हैं  भला   झांपों के,
          आ तो डंट जा अभी खम ठोक के मैदान जे है |
                 गैर के कहने पै हजरत को न मुतलक हो ख्याल,
          बंचो एक एक को बहकाता है सैतान   जे है |
                 आके हम लोगों से मांगे न टिकस  मोटे मल,
          रख दूं धुनके उन्हें बनियों प फकत सान जे है |
                  आज  मामूर  है  आलम  के  नमूदारों  में,
          लुत्फ अल्लाह का सर पर तेरे  खाकान जे है |
   
           


          दुबारा जागि गा हमर भारत 
                            - अंजू भट्ट (04-02-1968)
भारत दुनि    में दुबारा     जाग गा यई शंखनाद करै हिन्दी |
दुनियांक सौ करोड़ लोगों कै मिल्यूणक बोलि वण गे हिन्दी |
संसारक भाषाओं पदों कि   ताकतवर       समाधान छ हिन्दी,
संसारक गुरू छी,ताकतवर बणल,विश्वभाषा वण जलि हिन्दी(1)|

भारतक संस्कृति मैंसोंक धर्म कि परिभाषा वण ग्ये हिन्दी |
मन,वचन,कर्मक  कि लगातार  सेवा  का     फल छ हिन्दी |
भारतक संस्कृति दुशमणों ल कभैं लै भलि नि माणि हिन्दी |
अ दिन दूर न ति जब भारतकि राष्ट्र्भाषा वणि जाल हिन्दी (2)

हिन्दी    जानकारों      तपस्याक    ख्वरैकि  बिन्दी छ हिन्दी |
भाषाक   उन्नति  और  स्वाभिमानक    लड़ाई फल छ हिन्दी |
भारताकरितिरिवाज कि इज्जतलिजि घरघर चिट्ठी भेजैं हिन्दी |
भल   आदमीयों    कि भलि बातों कि गीता वण ग्यै हिन्दी (3)

दयानद हिन्दी कैं'आर्य भाषा'कौ जो ज्यानवालि वण ग्ये हिन्दी |
आपणराज म्यर जन्म    वटि हक छ कै वेर चमक गे हिन्दी |
भाषा बिना देश लाट है जाछ,तबै बापूक भरौसैकि वणी हिन्दी |
जय जवान,जय किसानैकि नाराल सबों में फैल ग्ये हिन्दी(4)|

देवनागरी लिपिक     वैज्ञानिकता   ज्ञानल पक्की है ग्ये हिन्दी |
क्रियापद       और       कारकों लें       सदा भलि है गे हिन्दी |
सब        व्याकरणों      लै     तीर्थ     जसि      है ग्ये हिन्दी |
मंत्रो,वर्णों सबों मिबेरि    गंगापाणि जसि साफ है गे हिन्दी |(5)

विदेश   रणियांक   लिजि    पेट    पावणक    साधन छ हिन्दी |
मातृभूमि वै दूर हैवेर भौते दुःख झेल बेर लै नि छोड़ हिन्दी |
संसार     में       भौतै      प्रेमकि     पछाण    वण गे हिन्दी |
संसार में    फैलि   बेर   सबों कि    भाषा   वण गे हिन्दी |(6)

सब जाग ज्ञान   फैलावो    अमृत जस वाणिल रि जो हिन्दी |
संसार मा शान्ति ल्यो और   गुस्स झगड़ों कै दूर करो हिन्दी |
सारै     संसार    हमर परिवार    छः यई संदेश देते रौ हिन्दी |
माफि      दीणि    वणो,सब    भाषाओं में एघिन र वो हिन्दी (7)

सबै    राग    द्वेष    मिटै    बेर   सबों   में प्रेम कराओ हिन्दी |
हमर    देशकि    पन्यार हो हमरि देशकि भाषा वणि रो हिन्दी |
आदमियों, देशक विकास हुनै र वो जातपाताल दूर हो हिन्दी |
संसार में सूरजकि किरणों जसि चमक बेर फैलते र वो हिन्दी(8)|
                           शिक्षिका,श्राफ पब्लिक स्कूल,
                         लोहिया हैड रोड खटीमा-262308(उ०ख्०)

            दुबार जागौ छू हमार भारत 
                             - के.सी.जोशी  (02-05-1948)
संसार म दुबार जागौ भारत हमार,यो शंखे क नाद करे हिन्दी |
आज संसार म सवा सौ करोड लोगन की पहचान बनगे हिन्दी |
संसार म आज भाषाक मजबूती,निर्विकल्प समाधान छू हिन्दी |
संसारकगुरू छी संसारकशक्ति बनोला,संसारक भाषा बनगे हिन्दी (१)

भारतकिसंस्कृति,मानवताकधर्म की रोजै,परिभाषा रई छू हिन्दी |
मन-वचन कर्म से मातृभाषाक सत्सेवाक परिणाम छू हिन्दी |
भारतीय संस्कृतिक दुश्मनों कें कभै नी भाती हमार  हिन्दी |
उ दिन दूर नै छू जब भारताक भाषा बनल गौरवमयी हिन्दी (२)

हिन्दीक ठुलठुल लोगन तपस्याक,माथे की भल बिन्दी छू हिन्दी |
भाषाकप्रगति और अपुमें गुमान हेतु,संघर्षक अभिनन्दन छू हिन्दी |
भारतीय संस्कृति की इज्जत कि पाती,कूढी कूढी भेज रयू छू हिन्दी |
धर्मपरायण मानवता के भल कामों की,एकमात्र प्रज्ञ गीता छू हिन्दी (३)

दयानन्दल हिन्दी को कौ,  आर्यभाषा प्राणों हेले प्यार हेगे हिन्दी |
स्वराज मेरो जन्म सिद्ध अधिकार छू,ऐल क्रान्तिमय हे गे हिन्दी | 
राष्ट्रभाषाक बिण देश गूंग छू,      बापू क विश्वास  बण गे हिन्दी |
जय जवान, जय किसानक उदघोषैल,लोगन में फैल गे हिन्दी (४)

देवनागरी   लिपिक   व   ज्ञानल,   परिपुष्ट व अमर हे गे हिन्दी |
क्रियापदों   व   कारकों   की उत्कंठा में सदा फलफूल गे हिन्दी |
मात्रा, अव्यय, प्रत्यय  के  तीर्थों में,  सुगढ व पवित्र हेगे हिन्दी |
मंत्रपूत,आचरणोंक वर्णक व स्वच्छअर्थल गंगाजल बनगे हिन्दी(5)

प्रवासीभारतीयोंक,हिन्दी प्रेमक,जिजिविषा व प्राण हे गे हिन्दी |
मातृभूमि बैटि बिछुड़ी घोर यातनाएं झेलीं,फिर ले नी छोड़ि हिन्दी |
संसारक  मातृभाषा  अनुरागकि, बेजोड़  प्रतीक बन गे हिन्दी |
प्रतीक बन सबै जाग फैल गे, तभै संसारक भाषा बन गे हिन्दी (६)

ज्ञानक प्रसार सब जाग करें,अमृतवाणीक कथनलि भरि र हिन्दी |
सुख शान्ति की संवाहिका हो,काम-क्रोध कटुता  से दूर र हिन्दी |
विश्वबन्धुत्व,वसुधैव कुटुम्बकम यो प्रज्ञासंदेश सदा देते रहे हिन्दी |
क्षमा-शील बनके ही सब  भाषाओं में सिरमौर सदा  रहे हिन्दी (७)

कटुताक हर तिमिर मिटाबेर लोगन में प्रेम भाव भरती रये हिन्दी |
भारतकि राष्ट्रीय एकता कि पहचान छू, हमार राष्ट्र्भाषा रये हिन्दी |
मानवता व राष्ट्र हो प्रगतिशील, पर जातिवर्गभेद म दूर रये हिन्दी | 
संसार में सूर्यरश्मियों जसि हो आलोकित,आभाषित बनि रये हिन्दी (८)

                                   वार्ड नं० ९,खटीमा (उ०ख०)
                                    मो०- ०९४११७६०३६७

शुक्रवार, 13 अप्रैल 2012



            ग़ज़लगो-भारतेन्दु हरिश्चन्द्र 
                           - डा.राज सक्सेना
        यूं तो ग़ज़ल हिन्दी कवियों की अब मुख्य कविता विधा बनती जा रही है किन्तु है
यह फ़ारसी से उर्दू में आकर उर्दू की मुख्य काव्यविधा ही | अधिकांश हिन्दी समर्थकों ने इसे 
अभारतीय मानते हुए इस का बहिष्कार ही किया | किन्तु अब इसकी लोकप्रियता में लगा-
तार वृद्धि हो रही है | बहुत कम लोग जानते हैं कि स्थापित ग़ज़ल विरोध परम्परा को कि-
नारे कर भारतेन्दु ने ग़ज़लें भी लिखी है किन्तु यहां भी लीक से हट कर उन्होंने ग़ज़ल के 
अर्थ को ही बदल कर हिन्दी कवियों के लिये एक नया रास्ता खोल दिया | एक ऐसा रास्ता
जिससे चारों ओर राहें खुली हुईं थीं | ग़ज़ल को उन्होंने परम्परागत इश्क,जुदाई,समर्पण,
मिलन और प्रेमी(प्रेमिका के खुदा से भी बुलन्द दर्जे) को जन सामान्य की सर्वदिशामय -
कविता का रूप दे दिया | भारतेन्दु कालजयी व्यक्तित्व थे -
            वे - हम जिधर भी चल पड़ेंगे रास्ता बन जाएगा |  के प्रतीक थे |
           हिन्दी गद्य को तो उन्होंने नई दिशा दी ही कविता के भी नए प्रतिमान पैदा किये |
सम्भवतः लक्ष्मी सागर वार्ष्णेय ने इसी लिये उनके लिये कहा,"भारतेन्दु केवल अंग्रेजी ही -
नहीं,संस्कृत, अरबी,फ़ारसी के खुले खजाने से लूट मचाकर निज भाषा भण्डार भरने के -
कट्टर पक्षपाती थे | उनकी इसी सोच ने आज ग़ज़ल को हिन्दी भाषा का एक आभूषंण
बना दिया है | इस सम्बन्ध में यह भी कहना उचित होगा कि भारतेन्दु जी सामान्यतः 
हिन्दी के क्लिष्ट रूप के लिये कभी आग्रही नहीं रहे | उन्होंने अधिकतर सामान्य बोल-
चाल की भाषा का ही प्रयोग किया जिसे उस समय देवनागरी लिपि में लिखी उर्दू  ही -
समझा जाता था | इसीलिये ब्रजरत्न दास ने उनके लिये कहा,"भारतेन्दु जी,उर्दू के सच्चे
शायर थे,... उन्होंने उर्दू भाषा में कविता भी काफी की है और इनकी हिन्दी कविता पर 
भी इस उर्दू जानकारी का जो असर पड़ा है वह भी उल्लिखित हो चुका है |(भा.ह.च.-
ब्रज रत्न दास)| भारतेन्दु के इस समन्वयवादी दृष्ठिकोण की विशेषता के कारण ही आचार्य
राम चन्द्र शुक्ल ने उल्लेखित किया कि,"साहित्य के एक नवीन युग के आदि में प्रवर्तक 
के रूप में खड़े होकर उन्होंने यह भी प्रदर्शित किया कि नये या बाहरी भावों को पचाकर -
इस प्रकार मिलाना चाहिए कि अपने ही साहित्य के विकसित अंग से लगें | प्राचीन-नवीन
के उस सन्धिकाल में जैसी शीतल कला का संचार अपेक्षित था वैसी ही शीतल कला के साथ 
भारतेन्दु का उदय हुआ, इसमें संदेह नहीं |"(हि.सा.का इतिहास-आ.रा.च्.शुक्ल)|
         भारतेन्दु की इस समन्वयवादी विशेष नीति के मूल में लगता है कि वे समझ 
गए थे कि हिन्दू मुस्लिम एक जुटता से ही अंगेजी और अंग्रजों का विरोध किया जा सकता 
था तथा यह भी कि हिन्दी भाषा का शब्द भंडार बढाने के लिये यह भी आवश्यक था   कि
उसमें अन्य भाषाओं विशेष रूप से सदियों से साथ पल बढ रही उर्दू के सरल शब्दों को भी 
लिया जाय | कुछ अरबी, फारसी के शब्द भी लिये जाएं ताकि यह एक समर्थ और सर्व-
ग्राही भाषा का रूप ले सके |
          जहां तक ग़ज़लगोई का प्रश्न है वे 'रसा' उपनाम से ग़ज़लें लिखा करते थे |
अनेक विद्वानों ने उनकी ग़ज़लों को सराहा है और वे उन्हें हिन्दी ग़ज़लगोई की एक सशक्त 
कड़ी के रूप में उल्लिखित करते है | डा.रमा सिंह के अनुसार,"हिन्दी ग़ज़ल का प्रारम्भ 
वैसे तो अमीर खुसरो से माना जाता है परन्तु अमीर खुसरो ने भी हिन्दी भाषा में बहुत -
ग़ज़लें नहीं कहीं |अमीर खुसरो से लेकर भारतेन्दु पूर्व तक ग़ज़लें कही तो गईं किन्तु हिन्दी 
ग़ज़ल की दृष्टि से इस काल को अंधकार का काल कहा जाता है | हिन्दी साहित्य में आधु-
निक काल के जन्मदाता भारतेन्दु से ही ग़ज़ल का प्रारम्भ माना जाता है |"(हिन्दी ग़ज़ल के
विविध आयाम-सरदार मुज़ावर)| हिन्दी में ग़ज़ल की विधिवत शुरुआत डा.राम कुमार कृषक
भी भारतेन्दु से ही मानते हैं | 
          परम्परागत ग़ज़ल के क्षेत्र बहुत सीमित थे | इस परम्परा में भारतेन्दु का
सबसे उल्लेखनीय योगदान परम्पराओं के संकीर्ण दायरों को तोड़ने का रहा है | शाश्वत -
विषय प्रेम के साथ नायिका ही केन्द्रबिन्दु रहती थी जिसके वियोग में नायक का हृदय हर 
समय तड़पता रहता था | इश्क मिजाज़ी से निकली तो सूफ़ियों की इश्क हक़ीक़ी मे उलझ 
कर रह गई | किन्तु भारतेन्दु ने सामाजिकता,दार्शनिकता और भक्तिभाव के साथ-साथ ही 
पूर्व स्थापित परम्पराओं का भी कहीं-कहीं निर्वहन किया है | यही भारतेन्दु की इस संबध 
मे व्यापक विशेषता रही है | इस संबध में विष्णुकांत शास्त्री जी का कथन दृष्टव्य है-
"मेरी दृष्टि में भारतेन्दु की उर्दू को सबसे बड़ी देन यह है कि उन्होंने उसमें भी भारतीय -
भावना और रीति-नीति की कविताएं लिखी हैं | परम्परागत ग़ज़लगोई का उदाहरण देखें-
         ग़ज़ब है सुरमः देकर आज वो बाहर निकलते हैं |
               अभी से कुछ दिलेमुज़्तर पर अपने तीर चलते हैं |
               ज़रा देखो तो ऐ अहले सुख़न ज़ोर-ए-सनाअत को,
         नई बंदिश है मजमूं नूर के  सांचे में   ढलते हैं |  
         कृष्ण भगवान पर कही गई अपनी ग़ज़ल में भारतेन्दु सीधे ब्रह्मवाद और भक्ति-
वाद पर उतर कर उसे सूफी विचारों का जामा भी पहना देते प्रतीत होते है | यह है सच्चा
समन्वय जो भारतेन्दु जी ने ब्रह्मवाद और सूफ़ीवाद में करके दिखा दिया है |
         जहां देखो वहां मौजूद मेरा कृष्ण प्यारा है |
         उसी का सब है जलवा जो जहां में आशकारा है |
         भला मखलूक ख़ालिक की सिफ़त समझे कहां कुदरत,
     इसी से नेति-नेति ऐ यार वेदों ने पुकारा है |
         आगे वे कहते हैं-
         तेरा दम भरते हैं हिन्दू,अगर नाकूस बजता है,
         तुझे ही शेख ने प्यारे अजां देकर पुकारा है |
                जो बुत पत्थर है तो काबे में क्या जुज ख़ाको पत्थर है,
         बहुत भूला है वह इस फ़र्क में सर जिसने मारा है |
                न होते जलवःगर तुम तो,यह गिरजा कब का गिर जाता |
                निसारा को भी तो आखिर तुम्हारा ही सहारा  है |
                तुम्हारा नूर है हर शै में कह से कोह तक यारो,
         इसी से कहके हर-हर तुमको हिन्दू ने पुकारा है |
         इस ग़ज़ल के माध्यम से कवि भारतेन्दु सीधे और सरल शब्दों में पाठक या 
श्रोता के दिलों   में  हिन्दू धर्म की महत्ता प्रमाणित करते हुए धर्म समन्वय के अपने 
पुनीत मिशन में सफल हुए हैं | जब मनुष्य मृत्यु के सन्निकट होता है तब उसे सांसा-
रिक निस्सारता,नश्वरता और अनावश्यकता का आभास होता है | वे कहते हैं-
                  आ गई सर पर क़ज़ा लो सारा सामां रह गया |
          ऐ फ़लक़ क्या-क्या हमारे दिल में अरमां रह गया |
                      *
          ऐ अज़ल जल्दी रिहाई दे,न बस ताख़ीर कर,         
          ख़ान-ऐ-तन भी मुझे अब क़ैदख़ाना हो गया |      
          ख़्वाबेग़फ़लत से ज़रा देखो तो कब चौंके हैं हम,
          क़ाफ़िला मुल्के अदम को जब रवाना हो गया |   
          या फिर-
          रिहा करता नहीं सय्याद हम को मौसिम-ऐ-गुल में,
          कफ़स में दम जो घबराता है सर दे दे पटकते हैं |
          हिन्दी के पहले ग़ज़लगो के रूप में भारतेन्दु ने हिन्दी ग़ज़ल को उर्दू ग़ज़ल 
की परम्परागत छवि के साथ एक नया रूप दिया है | बिना हिन्दी शब्दों के प्रति आग्रह -
पाले उन्होंने उर्दू और फ़ारसी शब्दों का भरपूर प्रयोग किया है | भारतेन्दु की ग़ज़ले दो -
प्राचीन संस्कृतियों के बीच समन्वय स्थापित करती हैं,सौहार्द उत्पन्न करती और अलिखित 
तारतम्य भी बनाए रखती हैं | यही भारतेन्दु की ग़ज़लगोई की विशेषता है | 
         ग़ज़ल के क्षेत्र में भारतेन्दु ने चहुंमुखी पैंतरेबाजी की तो वे ग़ज़ल की हास्य-
व्यंग्य विधा को कैसे छोड़ देते यह तो बहुत कम लोगों को ही मालूम है | उनकी हास्य की 
ग़ज़लें कम हैं मगर है | जिनका प्रयोग अपवाद स्वरूप उन्होंने अपने गद्य व्यंग्य के साथ 
भी किया है | उनके व्यंग्य आलेख 'मुशायरा' में उनकी इस कला के भी साक्षात दर्शन -
होते हैं | उनका काल्पनिक कवि क्या कहता है-
         फिर उन्हें हैज़ा हुआ फिर सब बदन नीला हुआ |
                फिर न आने का मेरे घर में नया  हीला  हुआ |
                क़हरे हक नाज़िल हुआ पत्थर पड़े वे मर गये ,
         अब्र का टुकड़ा उन्हें तबरम  अबा-बीला  हुआ |
                फिर उन्हें आया पसीना सब बदन  ठंडा  हुआ ,
         मुफ़लिसी में फिलमसल आंटा अजी गीला हुआ |
                नाम सुनते ही टिकस का आह करके मर गए,
         जान ली कानून ने, बस मौत का हीला  हुआ |
               आप शेखी पर चढे थे मसले अफगानाने बद्,  
         ख़ूब शुद गदक़ों के मारे सब बदन ढीला  हुआ |
                क़ैसरे हिन्दोस्तां अब जान इनकी बख्श   दो,
         देख लो रंज़िश से सब,इनका बदन पीला हुआ |
          और अब देखिए कम पढे लिखे किसी शोहदे की भाषा और उसी के भावों को
भारतेन्दु जी की व्यंग्य ग़ज़ल में-
          सान सौकत तेरे आसिक की मेरी जान जे है |
                 होंगे  सुलफा  इसी दरवाजे पे अरमान जे है |
                 कहीं सुह्दे भी पिचकते हैं  भला   झांपों के,
          आ तो डंट जा अभी खम ठोक के मैदान जे है |
                 गैर के कहने पै हजरत को न मुतलक हो ख्याल,
          बंचो एक एक को बहकाता है सैतान   जे है |
                 आके हम लोगों से मांगे न टिकस  मोटे मल,
          रख दूं धुनके उन्हें बनियों प फकत सान जे है |
                  आज  मामूर  है  आलम  के  नमूदारों  में,
          लुत्फ अल्लाह का सर पर तेरे  खाकान जे है |
     
            

शनिवार, 7 अप्रैल 2012

भारतीय संस्कृति की अवधारणाएं


  डा.राज सक्सेना                            सम्पर्क-धनवर्षा,हनुमान मन्दिर,
 (डा.राज किशोर सक्सेना)                                               खटीमा-262308 (उ.ख.)
पूर्व जिला परियोजना निदेशक,न.वि.अभिकरण, पिथौरागढ,              फोन-05943252777
पूर्व अधिशासी अधिकारी,मसूरी,                                         मोबा.- 9410718777
पूर्व सहा.नगर आयुक्त नगर निगम देहरादून                                                          -8057320999
________________________________________________________________________________


          भारतीय संस्कृति की अवधारणाएं
                                                           - डा.राज सक्सेना                          
        समाज में सामान्य रूप से 'संस्कृति' शब्द को,सुरुचि और शिष्ट व्यवहार के
रुप में लिया जाता है | विस्तृत अर्थों में संस्कृति की परिभाषा इस प्रकार दी जा सकती
है-"संस्कृति किसी एक समाज में पाई जाने वाली उच्चतम मूल्यों की वह चेतना है,जो
सामाजिक प्रथाओं,व्यक्तियों की चित्तवृतियों, भावनाओं,मनोवृतियो,आचरण के साथ-साथ
उसके द्वारा भौतिक पदार्थों को विशिष्ट स्वरूप दिये जाने में अभिव्यक्त होती है |"
       संस्कृति शब्द का दूसरे अर्थों में सभ्यता के परिप्रेक्ष्य में भी प्रयोग किया जाता
है | किन्तु अधिकतर संस्कृति के ऊंचे स्वरूप के अर्थों में | यथार्थ में-"सभ्यता,मानव
के सांस्कृतिक विकास  की वह स्थिति है,जिसमें नगर कहे जाने वाले जनसंख्या के क्षेत्रों
में जब वे रहना प्रारम्भ कर देते हैं और उच्च श्रेणी के भौतिक जीवन या उच्च जीवन -
स्तर के प्रतीक हो जाते हैं | किन्तु उच्च स्तर के भौतिक जीवन में संस्कृति का अंश
तब ही आता है जब वह उसमें संश्लिष्ट हो या उच्च नैतिक मूल्यों को प्राप्त करने का कोई
माध्यम बने | जब ऐसा जीवन नैतिक मूल्यों में से किसी एक के प्रतिकूल होता है या
ऐसे किसी नैतिक मूल्य से दूर रहता है तब वह सांस्कृतिक विकास का अवरोधक बन -
जाता है | ऐसे अवरोधक कभी-कभी लहलहाती संस्कृतियों के समूल नष्टीकरण के कारक
बन जाते है |" इतिहास ऐसे उदाहरणों से भरा पड़ा है |
                   आलेख में हम संस्कृति के इसी पक्ष का भारतीय परिप्रेक्ष्य में उपलब्ध
साक्ष्यों के आधार पर मूल्यांकन करने का प्रयास करते हैं |
       जनविज्ञानियों ने संसार की समस्त जातियों को मुख्य्तः तीन नस्लों में -
बांटा है | प्रथम को जन विज्ञान में काकेशियन कहा जाता है यह गोरे लोगों की नस्ल
है | दूसरी नस्ल मंगोलायड कहलाती है जिसका रंग पीला होता है और तीसरी नस्ल
इथोपियन परिवार कही जाती है जिनका रंग काला होता है | इस प्रकार दुनिया   में
गोरे,पीले और काले तीन प्रकार के लोग मुख्यतः पाये जाते हैं या फिर किसी एक -
रंग की प्रधानता लिये इनमें से किन्ही दो या अधिक का सम्मिश्रण |
       भारतीय उप महाद्वीप में इन तीनों नस्लों के लोग तो हैं ही इनके सम्मि-
श्रित लोग भी बहुतायत में पाये जाते है | इस दृष्टि से भी भारतीय परिवेश संसार
में एक विशिष्ट स्थान रखता है | इससे थोड़ा हट कर जनविज्ञान की दूसरी दृष्टि से
विचार करें तो भारत वर्ष में चार प्रकार के लोग मिलते हैं | पहले वे जिनका कद
छोटा,रंग काला,बाल घुंघराले और नाक चौड़ी होती है | इस तरह के लोग मुख्यतः
जंगलों में आदिम जनजातियों के रूप में पाये जाले हैं | दूसरी तरह के वे लोग हैं
जिनका रंग काला,मस्तक लम्बा,बाल घने और काले,नाक खड़ी मगर चौड़ी होती है,
ये द्रविड़ जाति के लोग हैं जो विन्ध्याचल से दक्षिण में पाए जाते हैं | अगर आर्य
भारत में बाहर से आये मान लिये जायें जैसा कि कई विद्वानों का विश्वास है तो ये
लोग आर्यों से भी पहले भारत आये होंगे और इन्होंने ही भारत में व्यवस्थित नगर
नगर व्यवस्था की नींव डाली होगी ऐसा विश्वास किया जाता है | मोहन जोदड़ो और्
हड़्प्पा प्रमाण हैं | तीसरी जाति के लोगों का कद लम्बा,रंग गोरा या गेहुंआ,दाढी
व मूंछ घनी,मस्तक लम्बा तथा नाक पतली तथा नुकीली होती है | ये आर्य जाति
के लोग कहे जाते हैं | अन्य जातियों से वैवाहिक सम्बन्धों के कारण उत्पन्न इनकी
संतानों का रंग गेहुंआ अथवा हल्का गोरा हो रहा है | चौथे प्रकार के लोग जो असम,
भूटान,सिक्किम,पूर्वोत्तर राज्यों और उत्तर प्रदेश,उत्तराखण्ड,हिमाचल,पंजाब,उत्तरी -
बंगाल,कश्मीर के उत्तरी किनारे के कुछ हिस्सों में बहुतायद से पाए जाते हैं | इनका
रंग पीला,कद छोटा, नाक चपटी-चौड़ी और रोम विहीन चेहरा होता है | सदियों -
पहले आर्यो के आगमन के उपरान्त ये मंगोल नस्ल के लोग चीन और तिब्बत  से
पलायन कर हिमालय के निचले हिस्से या तराई में बस गए | इन तथ्यों के आधार
पर भारतीय समाज आर्य,द्रविड़,मंगोल और आदिवासी लोगों का समाज है | आज
हम जिन्हें आदिवासी मानते हैं उनमें से कुछ को छोड़ कर अधिकांश नीग्रो और -
औष्ट्रिक जातियों से मिलकर बने लोग हैं | जो अंण्डमान नीकोबार,मध्य भारत और
देश के अगम क्षेत्रों में पाए जाते हैं | इसी प्रकार मंगोल नस्ल के लोगों का पौरा-
णिक नाम किरात माना जाता है |
        भाषा की दृष्टि से विवेचना में हम पाते हैं कि भारत में 76.4  प्रतिशत
आर्य भाषी,20.6 प्रतिशत द्रविड़ भाषी और 03 प्रतिशत शबर-किरात भाषी लोग -
निवास करते हैं | मंगोल नस्ल के लोगों की मूल भाषा तिब्बती या चीनी मूल की
है | जहां तक द्रविड़ भाषा का प्रश्न है,विन्ध्याचल से उत्तर में इससे मिलती जुलती
दो भाषायें एक बलूचिस्तान में ब्रहुई और दूसरी बिहार के ओरांव जनजाति के लोगों
की भाषा मुण्डा द्रविड़ परिवार की भाषायें लगती हैं | यह सिद्ध करता है कि  पूरे
भारत में द्रविड़ संस्कृति का प्रभाव अवश्य था | समाज विज्ञानियों और मानव -
विज्ञानियों ने भी इस तथ्य को स्वीकार किया है | यदि आर्य भाषा संस्कृत का -
साक्ष्य स्वीकार करें तो उसमे किरातों का उल्लेख यह सिद्ध करता है कि आर्यों के
आने से पूर्व किरात भारत आ चुके थे | किन्तु अगर यह मानलें कि आर्य भारत
से ही अन्य देशों में फैले तो सारी समस्याओं का निदान स्वंय हो जाता है | हिन्द
जर्मन परिवार की भाषाओं में जो अद्भुत साम्य है वह भी यह सिद्ध करता है कि -
ये एक मूल की भाषायें हैं | भारतीय आर्यों का ऋगवेद दुनिया की सबसे प्राचीन
पुस्तक होने का गौरव प्राप्त कर चुका है | संस्कृत को सभी आर्यवंशियों की  मूल
भाषा सिद्ध करते हुए सुप्रसिद्ध विद्वान मैक्समूलर ने लिखा है-"संसार भर की सब
आर्य भाषाओं में जितने शब्द हैं, वे संस्कृत की सिर्फ पांच सौ धातुओं से निकले-
हैं |" भी यह सिद्ध करने में योगदान करता है कि आर्य मूल रूप से भारत के ही
निवासी थे और यहीं से दुनिया भर में फैले |
       आर्य संस्कृति एक उदार संस्कृति के रूप में सामने आती है | आर्यों ने
समय-समय पर भारत में किसी भी रूप में आईं जातियों और संस्कृतियों को समा-
हित करने में जो बुद्धिमानी और महानता का परिचय दिया है वह कहीं  और  नहीं
मिलता है | इस विषय में जय चन्द्र विद्यालंकार के कथन का उल्लेख आवश्यक हो
जाता है | उन्होंने कहा-"भारत वर्ष की जनता,मुख्यतः आर्य और द्रविड़ नस्लों की
बनी हुई है और उसमें थोड़ी सी छौंक शबर और किरात (मुण्ड और तिब्ब्त-बर्मी)-
की है |" यह वास्तविकता भी है कि रक्त,भाषा और संस्कृति,सभी दृष्टियों से भारत
की  जनता अनेक विभिन्नताओं के रहते हुए भी सम्मिश्रित है |
        भारत के बारे में अटकलों का बाजार बहुत गर्म रहा है | एक अटकल के
अनुसार भारत में सबसे पहले बरास्ता ईरान अफ्रीका से नीग्रो आये | यह भी माना
गया कि जब आर्य इस देश में आए उस समय तक नीग्रो जाति समाप्त हो चुकी थी |
नीग्रो जाति का कार्यकाल अब से सात हजार से दस हजार वर्ष पूर्व माना गया | -
अगर बाहर से आने की थ्योरी को मान लिया जाय तो नीग्रो के बाद आग्नेय (आ-
स्ट्रिक) इनके बाद द्रविड़ और फिर आर्य आए | आर्यों के आने के बाद ही भारत में
समन्वय की थ्योरी पर कार्य प्रारम्भ हुआ | एक मिश्रित संस्कृति का जन्म हुआ,
जिसमे देश में उपलब्ध समस्त संस्कृतियों को उचित और सम्मानपूर्ण स्थान प्राप्त -
हुआ और वे भारत में रच-बस गईं |
       अगर हम किसी अटकल,अनुमान या कथन से परे एक निष्पक्ष दृष्टि -
इतिहास और धटनाओं के तारतम्य पर डालें तो हम पाते हैं कि आर्य और द्रविड़्
नाम से अभिहित किये गये भारत वासियों का धर्म एक है,भाव और सोच एक है,
संस्कार भी एक ही हैं यहां तक कि जीवनशैली और उसके प्रति उनका दृष्टिकोण भी
समान है | गहनता से पर्यावलोकन करें तो वैष्णव,शैव-शाक्त,बौद्ध और जैन ये
आर्य भी थे और द्रविड़ भी | इनके धार्मिक विश्वासों के अतिरिक्त इनकी साहित्यिक
गतिविधियां रचनाधर्मिता,भाव और शैली में समानता | प्राचीन मन्दिरों का शिल्प,
मूर्तियों की समरूपता जीवन की आवश्यक और मनोरंजन साधनों और वाद्य यन्त्रों
में थोड़े विभेद के अतिरिक्त गहरी समानता मिलती है | कुछ स्थानीय परिस्थितियों
के वशीभूत मामूली अन्तर तो लगता है किन्तु जाति या संस्कारगत भेद बिल्कुल
नहीं हैं |
        यदि इस प्रश्न पर विचार करें कि आर्यों के साहित्य में धर्म का जो स्व-
रूप वर्णित है,संस्कृति की जो व्याख्या आर्यग्रन्थों में दी गई है उसका वास्तविक
स्वरूप कहां है तो उसका सर्वश्रेष्ठ स्वरूप दक्षिण में द्रविड़ों में ही उपलब्ध होता  है |
इस तथ्य के अधीन क्या यह अनुमान पुष्ट नहीं होता कि यदि द्रविड़ आर्यों से पूर्व
के निवासी हैं तो फिर हिन्दू संस्कृति भी आर्यों से पूर्व की है,या आर्यों की संस्कृति
को द्रविड़ों ने इसप्रकार समाहित कर लिया कि शिष्य गुरू से आगे निकल गया,या
फिर कोई कहीं से नही आया इसी देश की मिट्टी में वातावरण,प्रकृति और परि-
स्थिति के अधीन शारिरिक रूप से थोड़ी भिन्नता लिये दो प्रजातियों का उदय हुआ
और वे पली बढीं समान मान्यताओं और विश्वासों की एक छतरी के नीचे,एक -
संस्कृति के अधीन |
        आर्य कहां से आए, द्रविड़ कौन थे इस सम्बन्ध में कोई प्रमाण प्राप्त
नहीं है मात्र अनुमान और अटकलों से इस गंभीर प्रश्न को जब हल करना है तो
फिर यह मानने में क्या हर्ज है कि न द्रविड़ बाहर से आए न आर्य | ये यहीं
पैदा हुए और इन्होंने मिलकर एक साझा संस्कृति को जन्म दिया जो मनोवैज्ञानिक्
परिवेश में तर्क और विज्ञान के आधार पर विश्वासों की एक-एक ईंट जमा कर
खड़ी की गई थी ,जो हजारों साल से मात्र मामूली परिवर्तनों के साथ आज भी -
जिन्दा है और सर्वश्रेष्ठ मानी जाती है |जबकि इसके साथ फली फूली या इसके बाद
अस्तित्व में आई सभ्यताएं आज कहां हैं कोई नहीं जानता ?
       

गुरुवार, 5 अप्रैल 2012


बन गये अमर
दिनकर हिन्दी के अस्तहीन,
'कमलाप्रसाद'तुम भाषा के |
सतरंग छटा के इन्द्र-धनुष,
तुम शीर्षशिखर परिभाषा के |

तुमने शोभा को दुगना कर,
हिन्दी को गौरववान किया |
दूरस्थ 'फिजी' से   देशों में,
हिन्दी को शत-सम्मान दिया |

तुम बढे,बढी हिन्दी  आगे,
बन गई नियति आगे बढना |
हिन्दी को गरिमा प्राप्त हुई,
शत-श्रेष्ठ बना हिन्दी पढना |

बन चुके अमर जीवित रहते,
हिन्दी की सतत कहानी में |
पन्नों में तुम,गीतों में तुम,
जीवित हम सबकी वाणी में |
        - 0 -
        अभिनन्दन है
कविकुन्दन,कविवर'कमलाप्रसाद',
कविताकिसलय,कवि कोविद तुम |
सृज कर कविताएं, दस हजार ,-
बन गये सृजक,जन-सेवक  तुम |
             ले जन्म 'विशेषी' में फिजि के,
             मथुरा   -  वृंदावन   शिक्षा      ली |
             कर सतत साधना हिन्दी की,
             'आयुर्वेद - शिरोमणि'  भी  ले  ली |
             शुक,व्यास सरीखे फिजि के तुम,
             शेखर , भगत , अशफाक   बने |
             लगन, परिश्रम, विद्वता बल पर ,
             तुम राष्ट्र -  कवि, निर्विवाद   बने |
हे महा-प्राण शत-शत प्रणाम,
कर बद्ध  हृदय से  वन्दन है |
हिन्दी प्रति त्याग तपस्या  का,
इस धरती पर अभिनन्दन है |


बुधवार, 4 अप्रैल 2012

' नथ'


     डा.राज सक्सेना                            सम्पर्क-धनवर्षा,हनुमान मन्दिर,
 (डा.राज किशोर सक्सेना)                                               खटीमा-262308 (उ.ख.)
पूर्व जिला परियोजना निदेशक,न.वि.अभिकरण, पिथौरागढ,              फोन-05943252777
पूर्व अधिशासी अधिकारी,मसूरी,                                         मोबा.- 9410718777
पूर्व सहा.नगर आयुक्त नगर निगम देहरादून                                                          -8057320999
________________________________________________________________________________
                     


            पति की मंगलकामना प्रतीक ' नथ'
                                            - डा.राज सक्सेना
      भारत के हिन्दी भाषी और उससे संलग्न हिन्दी समझने वाले क्षेत्रों में
'नथनिया ने हाय राम बड़ा दुख दीना' लोकगीत का, सदियों से पसंदीदा
लोकगीत की श्रेणी में बना रहना, भारतीयजनमानस के आभूषणप्रेमी समाज के -
नाक में पहने जाने वाले आभूषण 'नथ' के प्रति विशेष लगाव का प्रदर्शन -
करता है | यूं तो नथ सम्पूर्ण भारत मे सुहाग और सौभाग्य का प्रतीक मानी
जाती है किन्तु उत्तर भारत के पर्वतीय क्षेत्रों तथा उसमें भी उत्तराखण्ड के गढ-
वाल और कुमाऊं सम्भाग में इसे आभूषणों में विशेष महत्ता प्राप्त है |
     वैसे तो भारतीय परिप्रेक्ष्य में नारी स्वंय बहू के रूप में परिवार का
गहना है, पर गहनों से लदी बहू तो परिवार की समृद्धि का साक्षात प्रदर्शन ही
है | क्षेत्रो के अनुसार शरीर के विभिन्न भागों में पहने जाने वाले विशेष -
गहनों का अपना महत्व है किन्तु उत्तराखण्ड के आभूषण-फ्रेम में जो सर्वो-
परि स्थान नथ को प्राप्त है वह किसी अन्य आभूषण को प्राप्त नहीं है |
     वस्तुतः उत्तर भारत के उत्तराखण्ड के कुमांऊं और गढ्वाल दोनो -
खण्डों में थोड़ी सांस्कृतिक विभिन्नता होने पर भी कुछ और समानताओं
के साथ नथ का महत्व भी समान ही है | जैसे सुन्दर बहू परिवार की नाक
है वैसे ही सुन्दर बहू की नाक में पड़ी नथ की विशालता परिवार की ऊंची -
नाक का प्रतीक मानी जाती है | परम्परागत विश्वास के अनुसार उत्तराखण्ड
में 'नथ'  सुहाग,सौभाग्य और समृद्धि की प्रतीक है, किन्तु इन दोनो प्रखण्डों
में परिवार की समृद्धि के खुले प्रदर्शन के रूप में इसकी विशालता और भार
ने परिवार की बहुओं पर जो जुल्म विगत काल में किये हैं उनका साक्षात
वर्णन महान कहानीकार शिवानी की कई कहानियों में मिलता है |
       'भूषण बिन न बिराजई कविता,बनिता,भित्ति'
             जहां एक ओर साहित्यिक सौन्दर्यवृद्धि के लिये आभूषण को आव-
श्यक बताता है वहीं नारी सौन्दर्य के लिये भी उतना ही जरूरी समझता है |
उचित मात्रा और आकार जहां सौन्दर्य द्विगुणित करते हैं वही मात्रा और आकार
का आधिक्य विषमता का प्रतीक हो जाता है | भारत के विभिन्न अंचलों में
स्त्रियों की सौन्दर्य अभिवृद्धि के साथ गहनों को पति की  मंगलकामना का
प्रतीक भी माना गया है |पंजाब में सिर पर चौक और कानों के पास फूल -
नामक दो छोटे आभूषण, राजस्थान में लाख का चूड़ा और हाथीदांत की चूड़ियां
और बालों में मांग के आगे'पोड़',दक्षिण भारत,महाराष्ट्र,गुजरात में काले -
मोतियों से बनी दो लड़ी माला'मगल सूत्र',बगांल मे लोहे का कड़ा और शंख
की चूड़ी, बिहार व उत्तर प्रदेश में पांव के बिछुए और कश्मीर में डिजारू या
डिजहरू नामक कान में पहनने वाला विशेष बुन्दा सौभाग्यवती स्त्रियों और -
सुहाग की निशानी माना जाता है | इसी प्रकार सम्पूर्ण उत्तराखण्ड मे 'नथ'
को सौभाग्यवती स्त्रियों के सुहाग का प्रतीक माना जाता है |उल्लेखनीय है कि
कुमाऊं और गढवाल में माथे पर बिंदी,मांग में सिन्दूर के साथ नाक मे -
हैसियत के अनुसार नथ धारण करना सौभाग्य चिन्ह का प्रतीक है | अब से
कुछ वर्ष पूर्व तक उत्तराखण्ड में विवाह के समय वर पक्ष की ओर से वधु को
पहनाई जाने वाली नथ सुहाग का पवित्रतम आभूषण माना जाता था और -
नथ का भार और उसका घेरा वर पक्ष की आर्थिक स्थिति का परिचायक होता
था |
               कुमाऊं में नथ के वर्चस्व को अत्यन्त लोकप्रिय गीत की इन
पंक्तियों से समझा जा सकता है-
       हाय तेरि रुमाला,गुलाबी मुखड़ी,
       के भलि सजी रे,नाक कि नथुली |
             नावै गलोबन्द,हात कि धगुली,
       तेरी चमचम चम्की रै,माथे की बिंदुली |
                यहीं साथ में तराई-भाबर की गर्मी से त्रस्त पर्वत की बेटी अपने
पिता से प्रार्थना करती है कि मेरा विवाह बिलौरी (तराई) में मत करना वहां
बहुत घाम(धूप) लगती है -
          छान्ना बिलौरी जन दिया बाज्यु,
          लागला   बिलौरी  का   घाम |
                 लागला बिलौरी का घाम ओ बाज्यू,
          लागला   बिलौरी  का   घाम |
                  नाक का नथुली नाक में रौली,
          लागला   बिलौरी  का   घाम |
                 छान्ना बिलौरी जन दिया बाज्यु,
          लागला   बिलौरी  का   घाम |
           लोक गीतों में जीजा साली की नोंक झोंक का नथ से सीधा
सम्बन्ध जोड़ कर रखा गया है | साली अपने जीजा (भीना) की प्रशंसा में
गाती है-
           नाक में नथुली कान में बाली छन,
           हाथों चुड़ी बाजली ,   खना-खन |
                   लमकना दाढी,चमकना जूंगा छन,
           मेरा भीना लाखों में   एक  छन |
                   मैं उनूकी साली उन मेरा भीना छन |

       कुमाऊं के क्षेत्र में नाक में पहने जाने वाले आभूषणों में फुल्ली-
( इसे फूली,लौंग, लौंगफली अथवा कील भी कहा जाता है) यह ऊपर से
फूल जड़ित एक सोने या चांदी की कील होती है जो महिलाये अपने
बाएं नासापुट में किये गये छेद में पहनती हैं | दूसरा आभूषण नाक-
बाली कहलाता है| एक सोने का छोटा सा रिंग जिसे बिना झुलनी या
छोटी सी झुलनी के साथ जो अधर के ऊपरी भाग पर झूलता रहता है
पहना जाता है| तीसरा आभूषण बुलांकी या बुलांक़ कहलाता है| यह्
नासाग्र विभाजक अस्थि के मध्य में लटकता रहता है इसमें भी लट-
कन हो सकती है जो अधरों पर झूलती रहती है| चौथा आभूषण नथ-
निया है जो नथ का छोटा और नाक बाली का बड़ा रूप होता है| अब
आते हैं पांचवें अन्तिम आभूषण पर , और यह है हमारे आलेख का
मुख्य बिन्दु 'नथ' | जहां नथनिया एक तोला तक की हो सकती  है,
वहीं नथ पर भार या आकार की गोलाई का कोई प्रतिबंध नहीं है |
यह परिवार की आर्थिक हैसियत के अनुरूप किसी भी भार की और
किसी भी विशाल गोलाई की हो सकती है| उत्तराखण्ड में तो यह -
कहावत आम है कि बहू को सौ तोले की नथ न दी तो क्या
दिया|
          उत्तराखण्ड में सौभाग्य आभूषणों में सोने की काले मोतियो से बनी
माला(मंगलसूत्र) पहनने का प्रचलन आज भी जारी है |बहुत समय पूर्व मूंगे की
माला पहनना सौभाग्य का प्रतीक था | गले में गुलोबन्द,हंसुली,हाथों में धगुले-
(चूड़े) भी अत्यन्त प्रचलित थे | माथे पर मांग से लटका सोने या चांदी का -
टीका भी सौभाग्य का प्रतीक चिन्ह रहा है | आज समय-समय पर हुए सामा-
जिक परिवर्तनों के चलते सभी अन्य गहनों का प्रचलन कम हुआ है किन्तु नथ
अपना स्थान आज भी अक्षणु रखे है | हर समय तो नहीं मगर त्योहारों अथव
सामाजिक समारोहो आदि में मांग में टीका,नाक में नथ और गले में मंगलसूत्र
पहनना आज तक सुहागिनों के लिये अनिवार्य हैं |गढवाल के सन्दर्भ में सुप्र-
सिद्ध साहित्यकार डा.शिवानन्द नौटियाल ने अपने ग्रन्थ गढवाल की झलकियां
एक लेख में नथ को सामाजिक और आर्थिक हैसियत के रूप में प्राप्त महत्ता के
सन्दर्भ में लिखा है -"मैंने स्वंय ऐसी कई महिलाओं को देखा है,जिनकी पहले
पांच तोले की नथ थी जो बढते-बढते एक किलो वजन तक के रूप में परिवर्तित
हो गई है | ऐसी सौभाग्यवती महिलाओं की नाक का मांस चाहे कट कर भले
ही नीचे आ जाय,परन्तु सौभाग्य और समृद्धि की प्रतीक नथ के वजन को कम
नहीं किया जा सकता,क्योंकि ऐसा करना उस समृद्धिशाली परिवार के लिये 'नाक-
का सवाल' हो जाता है |"
           सौभाग्य और सामाजिक हैसियत के साथ नथ को सौन्दर्य में
भी प्रधान महत्ता प्राप्त है -  
           चन्द्र मुख पर तलवार की धार समान नाक में पड़ी सोने की
नथ में जड़े बहुमूल्य नगों की झलक जब सुन्दरी के बुरांस के समान गुलाबी
लाल गालों पर पड़ती है तो बरबस यह लोकगीत सामने आ जाता है-
           तड़तड़ी सी नाकुड़ी वींकी,खांडा धार सी पैंडी,
           नथुली पंवोर वींकी,झलकद जनी पूनो की जून | और -
           नथुली का भारन नाकडांडी लांदी झोल,
           ओंठड़ी देखेली तैंकी दाड़िमा को सी फूल,
           नथुली झलकेली तैंकी ओंठणियों का मूल |
           केवल नथ ही नहीं गढवाली लोकगीतों में नथ धारक सुन्दरी
की सुन्दरता का भी खूब चित्रण मिलता है - नथ पहनने से चन्द्रमुखी  के
गुलाबी गालों पर सोने का कस (मैल)लग जाने के कारण बदरंगी छाप पड़
जाती है जिससे उसका सौन्दर्य मद्धम पड़ जाता है -
           रोटि को कतर्- अ
             नथुलि को कस लगे,गल्वाड़ियों पर
             मधूली रूमाझु मधुली |
           गढवाली लोकगीतों में बहुतायत से नथ के माध्यम से प्रणय
निवेदन की परम्परा रही है,यथा- प्रिये तुम्हारी सुन्दरता वृद्दि के लिये एक
सौ तोले की नथ,तेरी पहाड़ सी ऊंची नाक की श्री वृद्दि के लिय अर्पण करूंगा
पर तू मेरी हो जा |
           इसी प्रकार - फौंकी जन हलकणी,इनी च नथुली झलकणी |
नायक को पेड़ की शाखा समान नाक में नथ का झूलना अतीव सुन्दर प्रतीत
होता है |यही नहीं उसे-
           हुंगारा लगौंद भग्यानी,नाक की नथुली | अर्थात-
नायिका की नाक में हिलती झलकती नथ बार-बार नायिका के मन की बात
बताने के लिये ही उसको चुनौती देती प्रतीत होती है |
           यूं तो अब तक उत्तराखण्ड की प्राण रेखा गंगा में बहुत पानी बह
चुका है | पुराने रीति रिवाज और पुरानी सोच तथा मान्यताओं के साथ-साथ -
सौन्दर्य और आभूषणों के मानकों में क्रान्तिकारी परिवर्तन आ चुके हैं | सुन्दरता
के प्रतिमान कुछ के कुछ हो चुके हैं | संसार और देश के साथ उत्तराखण्ड भी
बदल रहा है | इस परिवर्तन के परिप्रेक्ष्य में कुमांऊ और गढवाल के निवासियों
की सोच भी परिवर्तित हुई है | मगर सुहाग और सौभाग्य की पर्याय नथ के
प्रति अभी भी उत्तराखण्ड की नारी का आकर्षण और समर्पण कम नही हुआ है |
आज भी सामाजिक सरोकारों विशेष रूप से धार्मिक और सामाजिक सुकृत्यों में
उत्तराखण्ड की पर्वतीय वनितायें नथ के साथ लहंगा,ओढनी और मंगल सूत्र तो
अवश्य पहनती हैं | अपने आप को अधुनातन सिद्ध करने की होड़ में कुछ -
जीन्स टाप धारी महिलाएं इनसे परहेज करें यह अपवाद है | मगर अन्दर से
उनके अन्दर की पर्वतपुत्री थोड़े से आग्रह पर नथ,लंहगा और मंगलसूत्र धारण
कर फोटो खिंचा कर अपनी सहेलियों और मित्रगणों को दिखाती फिरे यह अलग
बात है और यही बात उसे अनन्यता प्रदान करती है | यही तो उत्तराखण्ड की
विशेषता है | साथ ही पर्वतीय नथ की सार्वभौमिकता भी |

मंगलवार, 3 अप्रैल 2012

बन गये अमर


    डा.राज सक्सेना                            सम्पर्क-धनवर्षा,हनुमान मन्दिर,
 (डा.राज किशोर सक्सेना)                                               खटीमा-262308 (उ.ख.)
पूर्व जिला परियोजना निदेशक,न.वि.अभिकरण, पिथौरागढ,              फोन-05943252777
पूर्व अधिशासी अधिकारी,मसूरी,                                         मोबा.- 9410718777
पूर्व सहा.नगर आयुक्त नगर निगम देहरादून                                                          -8057320999
________________________________________________________________________________

बन गये अमर
दिनकर हिन्दी के अस्तहीन,
'कमलाप्रसाद'तुम भाषा के |
सतरंग छटा के इन्द्र-धनुष,
तुम शीर्षशिखर परिभाषा के |

तुमने शोभा को दुगना कर,
हिन्दी को गौरववान किया |
दूरस्थ 'फिजी' से   देशों में,
हिन्दी को शत-सम्मान दिया |

हर विधा  तुम्हारी  थी   दासी,
जो लिखा एक प्रतिमान बना |
अनवरत तपस्यारत हिन्दी का,
हो गया सतत सम्मान घना |

तुम बढे,बढी हिन्दी  आगे,
बन गई नियति बढना-बढना |
हिन्दी को गरिमा प्राप्त हुई,
शत-श्रेष्ठ बना हिन्दी पढना |

बन चुके अमर जीवित रहते,
हिन्दी की सतत कहानी में |
पन्नों में तुम,गीतों में तुम,
जीवित हम सबकी वाणी में |
        - 0 -








         अभिनन्दन है
कविकुन्दन,कविवर'कमलाप्रसाद',
कविताकिसलय,कवि कोविद तुम |
सृज कर कविताएं, दस हजार ,-
बन गये सृजक,जन-सेवक  तुम |
             ले जन्म 'विशेषी' में फिजि के,
             मथुरा   -  वृंदावन   शिक्षा      ली |
             कर सतत साधना हिन्दी की,
             'आयुर्वेद - शिरोमणि'  भी  ले  ली |
शस्य  फिजी , तब  लौट   गये,
जाकर हिन्दी , जय-कार  किया |
कविता का माध्यम मात्र रखा,
गुप-चुप, अंग्रेजी     संहार किया |
             शुक,व्यास सरीखे फिजि के तुम,
             शेखर , भगत , अशफाक   बने |
             लगन, परिश्रम, विद्वता बल पर ,
             तुम राष्ट्र -  कवि, निर्विवाद   बने |
हे महा-प्राण शत-शत प्रणाम,
शत-आयु बनें यह वन्दन है |
हिन्दी  - सेवक , पदपंकज का,
इस धरती पर अभिनन्दन है |