सोमवार, 5 मार्च 2012

हिन्दी मनन हितसार दे |


 हिन्दी मनन हितसार दे |
                 -डा.राज सक्सेना

लेखनी को शारदे मां , नित  नवल   विस्तार दे |
शस्य-श्यामल सौम्यता, हिन्दी -  मनन हितसार दे |
      घर  बने  श्रुति  ज्ञान मन्दिर,वेदिका आंगन   बने |
      उठ जाय दृग जिस ओर भी,नवसृष्टि का सावन बने |
शुभ्र-सम्मत,शीर्षमय शत - श्रेष्ठ सम्भव  धार  दे |
शस्य-श्यामल सौम्यता, हिन्दी - मनन हितसार दे |
      दूरगामी , दृष्टिमय - चिन्तन-, सभी   को ज्ञात हो |
      एक  अविरल और  अनुपम , सर्जना - संज्ञात हो |
सूर्य़-कोटि  सम्प्रभः  सम , शब्दशः  सम्भार  दे |
शस्य-श्यामल  सौम्यता, हिन्दी - मनन हितसार दे |
      ज्ञान-गंगा  हम  सभी के , मन - हृदय  बहती  रहे |
      यदि  कभी भटके ,  सतत -सद्-मार्ग  को कहती रहे |
नित्य निर्मल नव-सृजित , हिन्दी - प्रबल संसार दे |
शस्य-श्यामल सौम्यता, हिन्दी -  मनन हितसार दे |

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