शुक्रवार, 2 मार्च 2012

विस्तार दे


 विस्तार दे
                 -डा.राज सक्सेना

लेखनी को शारदे मां ,    नित    नवल       विस्तार दे |
शस्य-श्यामल सौम्यता,शुचिमय परम  - हितसार दे |
      घर  बने  श्रुति  ज्ञान मन्दिर,  वेदिका आंगन   बने |
      उठ जाय दृग जिस ओर भी,नवसृष्टि का सावन बने |
शुभ्र-सम्मत,शीर्षमय  शत - श्रेष्ठ- सम्भव   धार  दे |
शस्य-श्यामल सौम्यता,शुचिमय परम- हितसार दे |
      दूरगामी , दृष्टिमय - चिन्तन-, सभी   को ज्ञात हो |
      एक  अविरल और  अनुपम , सर्जना - संज्ञात हो |
सूर्य़-कोटि  सम्प्रभः    सम ,   शब्दशः     सम्भार  दे |
शस्य-श्यामल  सौम्यता,शुचिमय परम- हितसार दे |
      ज्ञान-गंगा  हम  सभी के , मन - हृदय  बहती  रहे |
      यदि  कभी भटके ,सतत-सद्-मार्ग  को कहती रहे |
नित्य निर्मल नव - सृजित ,    नैवेद्य  का   उपहार दे |
शस्य-श्यामल सौम्यता, शुचिमय परम- हितसार दे |

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