सोमवार, 13 फ़रवरी 2012

चक्रव्यूह में फंसी बाल पत्रिकाये और बाल साहित्य


                    चक्रव्यूह में फंसी बाल पत्रिकायें
                और बाल साहित्य
                           -डा.राज सक्सेना
         बाल वाटिका मासिक वर्तमान में हिन्दी भाषा की शीर्ष बाल पत्रिकाओं में
से एक है| इस बाल मासिक का यह इतिहास रहा है कि यह नये हस्ताक्षरों को यथा-
शक्ति संभावनाएं पाकर प्रोत्साहित करती है| इसके विद्वान सम्पादक कुछ समय  से
लीक से हट कर कुछ नया करने का प्रयास कर रहे हैं| पत्रिका को एक नया और -
अनूठा रुप दिया गया है| घिसी-पिटी मान्यताओं को दर किनार कर अभिनव पाठ्य-
सामग्री लिखने के लिये लेखकों और कवियों को प्रेरित कर उनसे कुछ नया लिख-
वाया गया है| पत्रिका को वर्षो से बने जर्जर मकड़जाल से बाहर निकाल कर उसे-
समाज के हित और सार्थक स्वरूप में सजा कर देश के भावी कर्णाधार किशोरों के
लिये किशोरों की मनपसन्द और नई जान कारियों से परिपूरित कर उनके समक्ष -
परोसने का भगीरथ प्रयत्न प्रारम्भ किया गया है|
         एक दो माह के हाड़तोड़ परिश्रम के पश्चात जैसा किशोरों की साहित्यक
पत्रिका बनाने का सपना उनके मस्तिष्क में रहा होगा बाल वाटिका को वह स्वरूप
वे सम्भवतः फरवरी 2012  अंक में दे पाये हैं| इसे 'देर आयद,दुरुस्त आयद 'कहें
या मकड़जाल से सफलतापूर्वक रिहाई,जो भी हो बाल साहित्य के क्षेत्र में एक अभि-
नव प्रयोग तो है ही और मेरे जैसे बालमन के हजारों पाठकों की इच्छापूर्ति भी जो
कुछ देर से ही सही पूर्ण तो हुई|
        इस प्रसंग को आगे बढाने से पूर्व हमे बाल पाठकों के बाल पत्रिकाओं-
के पठन सम्बन्धी मिथक को समझना होगा जो बड़ी खूबसूरती के साथ मकड़ी के
जाले की तरह कस दिया गया था | कुछ पुरोधाओं द्वारा अपनी बुद्धि और विवेक के
अनुसार कुछ मानक,कुछ पैमाने और कुछ हाशिये निर्धारित कर दिये गये यह भूल
कर कि हर नई पीढी की अपनी कुछ वांछनायें होती हैं, अपने कुछ सपने होते हैं-
और कुछ स्थापित आदर्श भी होते हैं जिनके प्रति वह कुछ हद तक आग्रही भी -
होता है जिनके न मिलने से उसे उस पत्रिका, पुस्तक या पाठ्यसामग्री से अरुचि
हो जाती है और वह उसकी शक्ल भी नहीं देखना पसन्द करता | फलस्वरूप -
धीरे-धीरे स्थापित मानदण्डों के अधीन निकल रहीं बाल पत्रिका का अघोषित बहि-
कार बाल पाठकों ने करना प्रारम्भ कर दिया और आज यह स्थिति है कि कहने
को तो बाल पत्रिकायें निकल रही हैं किन्तु उनके पाठक सम्भवतः बालक हैं ही-
नहीं वास्तविकता तो यह है कि इन पत्रिकाओं के पाठक और खरीदार या तो
नये बाल रचनाकार हैं या फिर केन्द्र या राज्य सरकारें और कहीं कहीं कुछ स्वंय-
सेवी संस्थायें अथवा सुसंगठित संस्थायें |
                   यहां यह भी उल्लेखनीय है कि हमारी पीढी के कुछ ज्यादा उम्र के
बाल साहित्यकार जो बाल साहित्य की इमारत की नींव के एक-एक पत्थर की
की तरह हैं आज भी बच्चे को तीसवें या चालीसवें दशक का बच्चा समझ कर
एक अंधेरी सुरंग में रोशनी के कुछ झरोखों के समान गठित प्रतिमानों के अनु-
रूप तैयार किया गया बालसाहित्य परोसने के पक्षधर बने घूमते हैं यह भूलकर
कि आज का बच्चा सोडियम और हेलोजन लाईटों में आंखे खोलता है',इले-
क्ट्रानिक खिलोनों से खेलता है | टी.वी. की दुनिया की सैर करता है |मोबा-
इल का संचालन स्वंय करता है | कम्प्यूटर की बारीकियां हमसे ज्यादा सम्-
झता है  और सबसे बड़ी बात यह कि हिन्दी में अनुपलब्ध, विश्व स्तरीय बाल
साहित्य के अभाव में अंग्रेजी में पूरे विश्व का उपलब्ध बाल साहित्य पढता है |
वैश्विक घटनाओं पर आधिकारिक रूपसे बहस करता है |कोई कोई तो विश्व की
कई भाषाओं का ज्ञान ही नहीं रखते धाराप्रवाह बोलने की क्षमता रखते हैं, वे
हमसे अधिक नहीं तो कम भी नहीं, सामान्य ज्ञान रखते हैं | हमारे आलेखों
पर अपनी टिप्पणी और राय देते हैं | हमसे अधिक शुद्ध अंग्रेजी बोलते हैं तो
फिर उन्हें हिन्दी के प्रारम्भिक शब्दों और प्रारम्भिक ज्ञान के मकड़जाल में ही
उलझाये रखने के दिवा स्वपन से निकल कर उन्हें शुद्ध हिन्दी और कठिन -
हिन्दी शब्दों का संज्ञान क्यों न दिया जाय ?
       वास्तविकता तो यह है कि हमें बच्चे की पूर्व निर्धारित मानसिकता
का कोहरा अपने चारों ओर से हटा कर हिन्दी का एक नया सूरज और प्रखर
तेजोमय वातावरण स्थापित करना होगा तभी भारत का हिन्दी भाषी बालक -
बाल पत्रिकाओं की ओर आकर्षित होगा और बाल साहित्य की सीढी लगा कर
साहित्य के क्षेत्र में कुछ करने का प्रयास करेगा |
       जहां तक मेरा अनुमान है बाल वाटिका के विद्वान सम्पादक श्री -
भैरूं लाल जी गर्ग ने इस तथ्य को भली प्रकार समझ कर बालक की वर्तमान
आवश्यकता और बालहित के साथ हिन्दी हित का भी संज्ञान लेकर 'बाल-
वाटिका को नया कलेवर और साहित्यिक स्वरूप प्रदान कर पाठकों के सम्मुख
प्रस्तुत किया है |
        बाल वाटिका का यह स्वरूप और स्तर तथा साहित्यक श्रेणी की
भरपूर सामग्री बाल साहित्य में एक मील का पत्थर साबित होगी ऐसा मेरा
विश्वास है | सफलता क़ी राह में कुछ अवरोध और विषमतायें तो आती ही
हैं उन्हें दर किनार करके आगे और आगे ही बढते जाना ही सम्पूर्ण सफलता
की गारन्टी होता है | यह सूत्र वाक्य याद रख कर हम आगे बढेंगे तभी -
आलोचनाओं और आलोचकों के मुख बन्द होंगे |


                                                                                               धनवर्षा,हनुमानमन्दिर,
                                                                                               खटीमा-262308(उ०ख०)
                                                                                               मो-09410718777

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