मंगलवार, 14 फ़रवरी 2012

      मनमोहक है
                 डा.राज सक्सेना
अभिशाप बुढापा कभी न था,यह तो गरिमा का पोषक है |
आनन्द इसी में जीने का,यह शिखर  रूप  का द्योतक है |
           क्यों रखें अपेक्षा औरों से,
           अब तक भी तो हम जीते थे |
           हम कुंआ खोदते थे अपना,
           तब उसका पानी पीते थे |
खर्चों को करके अल्प सभी,  जीवन   जीना   सम्मोहक है |
आनन्द इसी में जीने का,यह शिखर  रूप  का द्योतक है |
           अब तक देते थे हम सबको,
           क्यों हाथ पसारें हम अपना |
           क्यों हम सोचें सब ध्यान रखें,
           है समय आज किस पर इतना |
सोचो समाज को क्या दें हम,बस यह विचार उन्मोदक है |
आनन्द इसी में जीने का,यह शिखर  रूप  का द्योतक है |
           ये सब स्तर में छोटे हैं,
           हम क्यों मांगे अब इनसे कुछ |
           हम ने पाला और बड़ा किया,
           इनको दे डाला है सब कुछ |
हम दाता ये अब भी याचक,  यह भाव रखो,मनमोहक है |
आनन्द इसी में जीने का,यह शिखर  रूप  का द्योतक है |

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