बुधवार, 1 फ़रवरी 2012

मेरे बाबू जी

                मेरे बाबू जी
                    - डा.राज सक्सेना

घर के बाहर ओसारे पर, अटके रहते  बाबू जी |
सूनी आंखों रस्ता  सबका,तकते रहते बाबू जी |
कोई आकर बात करे कुछ उनसे इस चौबारे में,
वरना खुद ही खुद से बातें,करते रहते बाबू जी |
पाला जिनको खून पिलाकर,उन्हें छोड़कर जीना क्या ?
यही सोचकर मन ही मन में,कुढते रहते बाबू जी|
रानी जैसा रखा जिसे वह,  अम्मा खटती सेवा में,
उनको खटता देख स्वंय भी,  घुटते रहते बाबू जी |
रोज शाम को छ्तपर चढकर सूनी-सूनी नजर उठा,
अस्तांचल को जाता सूरज , तकते रहते बाबू जी |
खांसी का दौरा पड़ जाए,जाग न जाएं अम्मा जी,
डाल रजाई मुख पर अन्दर ,घुटते रहते  बाबू जी |
बात बिगड़जाये परिजनकी,नहीं संवरती कभी-कभी,
अपनी हिकमतसे हल सबका ,करते रहते बाबू जी |
खानदान में 'राज' किसी की, उठती चादर थोड़ी सी,
इज्जत न मैली हो जाए , ढकते रहते बाबू जी |

धनवर्षा,हनुमानमन्दिर,
खटीमा-262308(उ०ख०)
 मो-09410718777



मौलिक एंव अप्रकाशित बाल रचना-

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