गुरुवार, 22 सितंबर 2011

       चन्द रुबाइयां
चली आई बड़े तड़के,   मेरे घर  पर लिए डोली |
हमारे कान में'अब उठ'किरण कुछ् इस तरह बोली |
मिलन की रात बीती है,मिलन क्षण शेष हैं मन में,
अभी क्यों दे रही दस्तक,अभी आराम  कर भोली |
             -०-
तुम्हारी रेशमी आहट, मेरे  जब   पास आती है |
मिलन की कामनाओं का,मधुर अहसास लाती है |
मुझे अमराइयों के झुटपुटे क्षण याद  आते   हैं,
सितारों से भरा आंगन,मिलन की आस लाती है |
             -०-
तुम्हारी देह    का दर्पण , मेरा  श्रंगार  करता है |
छिपी मन में    अगर पीड़ा,त्वरित संहार करता है |
मिलन सौ    बार होता है,अगर तुमसे अकेले में,
मिलें कुछ और क्षण मुझको,हृदय हर बार करता है |
             -०-
मिलन की प्यास बुझ जाये, कहें ये देह के धागे |
यही  क्षण चक्षु ने चाहा,  यही मन गेह ने चाहे |
रहो सानिध्य में हरदम , यही है कामना प्रियतम,
तुम्हारे साथ क्यों बांधे,  ये हमने स्नेह के धागे |
             -०-
झिड़क सब कामनाओं को,तुम्हारी देह से बाहर निकलता हूं |
मलय  सा   हो गया हल्का, क्षितिज के पार चलता   हूं |
सृजन नव कर दिया हमने , नये संसार  का   प्रियतम ,
धरोहर प्यार की अर्पण ,  तुम्हें  हर  बार   करता   हूं  |
              -०- 

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