शुक्रवार, 12 अगस्त 2011


     
       आनन देखा है
               -डा.राज सक्सेना
हे प्रियतम तुमने बसंत में,क्या अपना आनन देखा है |
सत्य कहो इस आनन जैसा,क्या मह्का मधुवन देखा है |
हूक उठीहै कभी हृदयमें,एक अजब सी प्यास जगी क्या,
इस बसंत की किसी रात में,निज मन का नर्तन देखा है |
रिमझिम वर्षा इन्द्र्धनुष से, एकनई अनुभूति जगाकर,
काजल सी घनघोर घटा में,सन्-सन् करता तन देखा है |
रस बरसाते पूर्ण चन्द्र ने, कभी नहीं क्या मधु बरसाया,
उस मधु से सिंचित परियों सा,क्या अपना यौवन देखा है |
आह् शिशिरके हिमपातोंने,असर नहीं क्या तुमपर डाला,
सर-सर चलती शीतपवन में,क्या जलता तनमन देखा है |
"राज"तृषित नयनोंसे अपलक,तुमको अविरल देख रहा है,
करुणकथा सा कुसुमित् उसका,क्षुधित हृदयक्रंदन देखा है |
      धनवर्षा,हनुमानमन्दिर,खटीमा-२६२३०८(उख०)
         मोबा- ०९४१०७१८७७७

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