शुक्रवार, 26 अगस्त 2011

अनुवादक


       अनुवादक
             -डा.राज सक्सेना
 अनुवाद-विधा उपवन में जब,
 अनुवादक विचरण करता  है |
 कुछ श्रेष्ठपुष्प वह चुन-चुन कर,
 जन-जन के सम्मुख रखता है |

 अनुवाद कला में     पारंगत ,
 जो लोग जगत  में  होते  हैं |
 वे मूल कथन के भिन्न भाव ,
 अक्षरशः  सभी   पिरोते   हैं |

 जो कहा गया  उससे हट कर ,
 कहना  आवश्यक  होता  है |
 बस तभी सफल अनुवादक भी,
 कुछ बहुत जरूरी   कहता है |

 कविता में कवि का मूल भाव,
 कविता में चांद   लगाता  है |
 पाठक भी भाव-विभोर   बने,
 जब मूल-भाव  पढ़ पाता  है |

 हो कथ्य कथा का भाव सहित,
 जब मूल कथा  के अनुकूलित |
 तब वह पाठक के दिल तक भी,
 जाकर    करता है   उद्वेलित |

 है मर्म  यही अनुवादन    का,
 विद्व्द्जन  यही   बताते   हैं |
 अनुपालन करते अनुवादक  जो,
 धन,कीर्ति,सुयश  पा  जाते हैं |

  अनुवाद - विधा
          -डा.राज सक्सेना
 अनुवाद विधा है,श्रेष्ठ - विधा ,
 साहित्य जगत की थाती   है |
 साहित्य इतर जो अन्यों  का,
 उससे परिचय  कर वाती  है |

       परिचय का माध्यम और साध्य,
       जन-जन का परिचय देती   है |
       यह समय और धन खर्च बिना,
       कण-कण सम्मुख रख देती  है |


 जो  कठिन  परिश्रम  से  पाया,
 अन्यों की तिल-तिल मेहनत से |
 कुछ क्षण मे यह अनुवाद-विधा ,
 जग भर में रखती अनुमति  से |

        श्रमशील साध अनुवादक   की,
        जो भाव सहित  अनुवाद  करे |
        यदि अन्तरतम से लिखा गया,
        सम-रूप वही  सम्वाद   करे |

 है कठिन मगर मन-रंजक   है,
 अनुवाद विधा  का    अपनाना |
 लेखक सा मन-मस्तक  लेकर,
 पाठक-श्रोता  तक    पहुंचाना |

         यह कठिन और श्रमसाध्य कर्म,
         जो विद्वत्जन    अपनाते   हैं |
         वे विश्व धरोहर     रचनाएं -,
         जन-गण-मन तक ले आते हैं |

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