शनिवार, 27 अगस्त 2011

मधुमास की तरह

      मधुमास की तरह 
               -डा.राज सक्सेना 
हर पल बना है इन दिनों,मधुमास की तरह |
लगने लगे हैं वो मुझे , अब खास की तरह |
इतने हसीन थे वो  मुझे  ये  पता  न  था,
उतरे दिलो-दिमाग में , अहसास  की तरह |
आंखें चकोर बन के, उन्हें   ढ़ूंढ़्ती  हैं बस,
यूं बन रही है ये कथा,  इतिहास  की तरह |
दो पल को दूर कया हुए, लगने लगा  मुझे,
दो युग बिता के आये है,बनवास  की तरह |
उन से बिछड़ के किस तरह रह पाएगा ये दिल,
कांटा सा चुभ रहा है, इक संत्रास  की तरह |
रहने लगे हैं दूर्   हमसे'राज'  आज कल,
क्या हो रहा था खेल ये, परिहास की तरह |

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