गुरुवार, 25 अगस्त 2011

अश्क-ए-जिगर्-अशआर


    अश्क-ए-जिगर्-अशआर
                 -डा.राज सक्सेना
इन्तहा करदी जहां वालों ने,अपने प्यार की तुझ पर |
तभी तो ले गये तुझ को , उठा कर आस्मां  वाले |
               -०-
तुम क्या गये कि साथ सब,खुशियां चली गयीं |
तुम सो गये तो साथ हर,लज़्ज़त भी सो गयी |
               -०-
अभी से आंख में आंसू, ये कैसा ज़र्फ है साक़ी |
अभी तो दास्ताने ग़म, शुरू भी की नहीं हमने |
              -०-
बहारों में  हमें  भी याद कर लेना चमन वालो,
बहुत सींचा पसीने से,चमन हमने भी ये बरसों |
              -०-
तरतीब से ख्वाबों की, ये  ज़ीस्त  बनी है,
ये ख्वाब बिखर जाएं तो,फिर मौत भली है |
              -०-
कुछ लोग तो पल भर में,जीते हैं ज़ीस्त पूरी,
कुछ लोग सौ बरस में,पल भर भी नहीं जीते |
             -०-
क्या बात है चमन में, फीका  है  रंग सबका,
ग़ुलचीं को कुछ हुआ क्या,सिसके है गुंचा-गुंचा |
              -०-
हो शाख  से अलग तो,रोता है शजर बरसों,
जिस ग़ुल को बहारों में, नाज़ों से संवारा हो |
             -०-

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