सोमवार, 22 अगस्त 2011

कुछ सख्त-सख्त


      कुछ सख्त-सख्त
              -डा.राज सक्सेना

तू श्वानों की तरह से भोंकता और वार करता है |
वतन को बेच खाने के नियम तैयार  करता  है |
विदेशी बैंक में जाकर तू रखता है कमाई   को,
लड़ा कर धर्म-जाति पर,वतन बरबाद करता  है |
          -०-
अरे शिशुपाल सा बरताब करना छोड़ दे अब तो |
बिदकना,भोंकना,बकवास करना छोड़ दे अब तो |
तुझे हम माफ कर देंगे,अगर सत्ता की खातिर तू,
वतन का बेचना,व्यापार करना छोड़ दे अब  तो |
         -०-
ये श्वानों सा रुदन तू झींक कर हर बार करता है |
हमारी राष्ट्र्-भक्ति पर,तू हरदम   वार करता  है |
अरे सत्ताके भंवरे सुन, न  आतंकी  हमें   कहना,
यहां का मूल हर ब्च्चा,वतन को प्यार करता है |
              -०-
उलझना मत कभी हमसे,अगर ली हमने अंगड़ाई |
वहीं पर ड़ाल देंगे हम ,  जहां बिकती है चतुराई |
हम आंधी हैं तेरी कीलों से हम रुक नहीं सकते ,
जो दृष्टि वक्र की हमने, न मिल पायेगी परछांई |
               -०-
बड़प्पन है हमारा ये,कि हम चुपचाप रहते  हैं  |
तू हमको गालियां देता है,हम सन्ताप सहते हैं  |
मगर सत्ता के लोलुप सुन,अति का अंत होता है,
सहेंगे अब नहीं कुछ भी, ये तुझसे साफ कह्ते है |

    धनवर्षा,हनुमानमन्दिर्,खटीमा-२६२३०८
          मो- ९४१०७१८७७७

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