शनिवार, 13 अगस्त 2011

चन्द कतात


      चन्द कतात
            -डा.राज सक्सेना
यूं तो कहने को वतन में,अब सवेरा हो गया |
नफरतों का हरतरफ, लेकिन अंधेरा हो गया |
देश के रक्षक का हमने,जिसको बख्शा था खिताब,
बदनसीबी"राज"अपनी,  वो लुटेरा हो गया |
       -०-
उन्नत ललाट पर चमक रही,भारत माता की बिन्दी है |
है ब्रह्मपुत्र सम हिमनद यह,सतलुज,सरयू,कालिन्दी है |
जो आकर मिला पवित्र हुआ,है पतित-पावनी मां जैसी,
वर्तनी सरल,भाषा सीधी,निर्मल गंगा सम हिन्दी है |
      -०-
अब नही आतंक से डर,शेष तक ना वेदना है |
चक्षु लाखों अब सजग हैं, वार तेरा देखना है |
देश में ही रह रहे,  विश्वासघाती  वार कर -,
जाग कर बैठा है हिन्दू,मुस्लिमों में चेतना है |
      -०-
निकले थे हम कहां के लिये आ गये कहां |
हर ओर लाश खून है,उजड़ा  है हर  मकां |
किसने लगादी आग फिर, अम्नोअमान को,
फिर दिख रहा है हर तरफ,उठता हुआ धुआं |
     -०-
रिश्तों के तार तोड़कर,बैठे हुये हैं कयों |
हम नफरतों के दौर,समेटे हुये हैं क्यों |
सांझी विरासतों का, इतिहास भूलकर ,
बारूद के एक ढेर पर बैठे हुये हैं क्यॉ |
     -०-
तन बिक गया बाजार में,थोड़े से धान् में |
बिखरी पड़ी है लाज एक्,सूने मकान  में |
सपना यही था क्या मेरे,आज़ादहिन्द का,
जन्ता का ये भविष्य है,भारत महान में |
     -०-

कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें