गुरुवार, 11 अगस्त 2011

आनन देखा है


       आनन देखा है
               -डा.राज सक्सेना
हे प्रियतम तुमने बसंत में,क्या अपना आनन देखा है |
सत्य कहो क्या इससे पहले,दह्का चन्दन्-वन देखा है |
हूक उठीहै कभी हृदयमें,एक अजब सी प्यास जगी क्या,
इस बसंत की किसी रात्रि में,मन करता नर्तन देखा है |
रिमझिम वर्षा इन्द्र्धनुष से, एकनई अनुभूति जगाकर,
काजल सी घनघोर घटा में,थर-थर करता तन देखा है |
रस बरसाता पूर्ण चन्द्रमा, कभी नहीं क्या तृषा जगाता,
स्वप्नों में क्या खुद का तुमने,परियों सा यौवन देखा है |
अरी!शिशिरके हिमपातोंने,असर नहीं क्या तुझपर डाला,
सर-सर चलती शीतपवन में,जलता सा तनमन देखा है |
क्यों चकोर सा"राज"ताकता,कब से सूनी आंख लिये,
दीप-शिखा सा जलता उसका,क्षुधित हृदयमंथन देखा है |
      धनवर्षा,हनुमानमन्दिर,खटीमा-२६२३०८(उख०)

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