बुधवार, 10 अगस्त 2011


            डा.राज सकसेना

घिनौनी अब सियासत हो रही है |
गरीबों पर सलावत  हो  रही है |
हमें कातिल बता कर हर जगह पर,
यूं कातिल की हिफाज़त हो रही है |
थमा कर हाथ में दोनों के खंज़र ,
अजब सी यह सखावत हो रही है |
गैर को मां का आंचल ही थमाकर्,
दलाली में महारत हो रही है |
हिली थोड़ी चेयर तो चीखते हैं,
विपक्षी दल से शरारत हो रही है |
हमें ही मानते हैं कारण गरीबी ,
टैक्सचोरों पर इनायत हो रही  है |
हजामत हो रही है"राज्"जमकर ,
नहीं  फिर भी,बगावत हो रही है |
 धनवर्षा,हनुमान मन्दिर खटीमा-२६२३०८

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