रविवार, 7 अगस्त 2011

भारत-वासी


      भारत-वासी
            -डा.राज सक्सेना

हजारों कष्ट सहते हैं,  जिगर को थाम लेते हैं |
मिले तकलीफ कितनी भी,सब्र से काम लेते हैं |
बहा देंगे पसीने में,हम अपनी मुश्किलें जो हों,
सतत कांटों पे चलकर हम,मंजिलें थाम लेते हैं |
पले हैं कष्ट सह-सह कर,हजारों साल से हम सब,
न हो बिस्तर तो धरती से,पलंग का काम लेते हैं |
बदन फौलाद का पाया,मगर दिल मोम का अपना,
अगर इज्जत पे बन जाए,गिरेबां थाम लेते हैं |
नहीं तोला है रिश्तों को,कभी ज़र की तराज़ू में,
कि खाकर घास की रोटी,विजय परिणाम देते हैं |
रहे सदियों से कष्टों में,मगर गर्दन न झुकने दी,
जिओ और"राज"जीने दो,कथन अंजाम देते हैं |

    घनवर्षा,हनुमान मन्दिर,खटीमा-२६२३०८(उ०ख०)

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