शनिवार, 27 अगस्त 2011

खुशनुमा ख्वाब


      खुशनुमा ख्वाब
              -डा.राज सक्सेना
खुशनुमा से ख्वाब पलकों पर सजा कर जायेगा |
ढ़ेर से गम चन्द खुशियों में मिला कर जायेगा |
एक लम्हा वस्ल का,जिसको संजोया आजतक,
ये धरोहर क्या मेरी,दुनिया जला कर  जायेगा |
इश्क क्या एक फलसफा है,जो उलझता ही गया,
अब तलक समझा नहीं,कोई बता कर जायेगा |
हसरतें बैठी हैं दिल में,ये समझती क्यों  नहीं,
एक दिन,ये दिलजिगर,सबकुछ दग़ा कर जायेगा |
प्यार का है ज़ख़्म ये,इसकी दवा कितनी भी हो,
याद से अपनी वो ज़ालिम,फिर हरा कर जायेगा |
'राज'लम्बी है जुदाई,डूबता   जाता  है  दिल,
इन्तज़ार-ए-वस्ल क्या,हमको मिटा कर जायेगा |

मधुमास की तरह

      मधुमास की तरह 
               -डा.राज सक्सेना 
हर पल बना है इन दिनों,मधुमास की तरह |
लगने लगे हैं वो मुझे , अब खास की तरह |
इतने हसीन थे वो  मुझे  ये  पता  न  था,
उतरे दिलो-दिमाग में , अहसास  की तरह |
आंखें चकोर बन के, उन्हें   ढ़ूंढ़्ती  हैं बस,
यूं बन रही है ये कथा,  इतिहास  की तरह |
दो पल को दूर कया हुए, लगने लगा  मुझे,
दो युग बिता के आये है,बनवास  की तरह |
उन से बिछड़ के किस तरह रह पाएगा ये दिल,
कांटा सा चुभ रहा है, इक संत्रास  की तरह |
रहने लगे हैं दूर्   हमसे'राज'  आज कल,
क्या हो रहा था खेल ये, परिहास की तरह |

शुक्रवार, 26 अगस्त 2011

अनुवादक


       अनुवादक
             -डा.राज सक्सेना
 अनुवाद-विधा उपवन में जब,
 अनुवादक विचरण करता  है |
 कुछ श्रेष्ठपुष्प वह चुन-चुन कर,
 जन-जन के सम्मुख रखता है |

 अनुवाद कला में     पारंगत ,
 जो लोग जगत  में  होते  हैं |
 वे मूल कथन के भिन्न भाव ,
 अक्षरशः  सभी   पिरोते   हैं |

 जो कहा गया  उससे हट कर ,
 कहना  आवश्यक  होता  है |
 बस तभी सफल अनुवादक भी,
 कुछ बहुत जरूरी   कहता है |

 कविता में कवि का मूल भाव,
 कविता में चांद   लगाता  है |
 पाठक भी भाव-विभोर   बने,
 जब मूल-भाव  पढ़ पाता  है |

 हो कथ्य कथा का भाव सहित,
 जब मूल कथा  के अनुकूलित |
 तब वह पाठक के दिल तक भी,
 जाकर    करता है   उद्वेलित |

 है मर्म  यही अनुवादन    का,
 विद्व्द्जन  यही   बताते   हैं |
 अनुपालन करते अनुवादक  जो,
 धन,कीर्ति,सुयश  पा  जाते हैं |

  अनुवाद - विधा
          -डा.राज सक्सेना
 अनुवाद विधा है,श्रेष्ठ - विधा ,
 साहित्य जगत की थाती   है |
 साहित्य इतर जो अन्यों  का,
 उससे परिचय  कर वाती  है |

       परिचय का माध्यम और साध्य,
       जन-जन का परिचय देती   है |
       यह समय और धन खर्च बिना,
       कण-कण सम्मुख रख देती  है |


 जो  कठिन  परिश्रम  से  पाया,
 अन्यों की तिल-तिल मेहनत से |
 कुछ क्षण मे यह अनुवाद-विधा ,
 जग भर में रखती अनुमति  से |

        श्रमशील साध अनुवादक   की,
        जो भाव सहित  अनुवाद  करे |
        यदि अन्तरतम से लिखा गया,
        सम-रूप वही  सम्वाद   करे |

 है कठिन मगर मन-रंजक   है,
 अनुवाद विधा  का    अपनाना |
 लेखक सा मन-मस्तक  लेकर,
 पाठक-श्रोता  तक    पहुंचाना |

         यह कठिन और श्रमसाध्य कर्म,
         जो विद्वत्जन    अपनाते   हैं |
         वे विश्व धरोहर     रचनाएं -,
         जन-गण-मन तक ले आते हैं |

गुरुवार, 25 अगस्त 2011

अश्क-ए-जिगर्-अशआर


    अश्क-ए-जिगर्-अशआर
                 -डा.राज सक्सेना
इन्तहा करदी जहां वालों ने,अपने प्यार की तुझ पर |
तभी तो ले गये तुझ को , उठा कर आस्मां  वाले |
               -०-
तुम क्या गये कि साथ सब,खुशियां चली गयीं |
तुम सो गये तो साथ हर,लज़्ज़त भी सो गयी |
               -०-
अभी से आंख में आंसू, ये कैसा ज़र्फ है साक़ी |
अभी तो दास्ताने ग़म, शुरू भी की नहीं हमने |
              -०-
बहारों में  हमें  भी याद कर लेना चमन वालो,
बहुत सींचा पसीने से,चमन हमने भी ये बरसों |
              -०-
तरतीब से ख्वाबों की, ये  ज़ीस्त  बनी है,
ये ख्वाब बिखर जाएं तो,फिर मौत भली है |
              -०-
कुछ लोग तो पल भर में,जीते हैं ज़ीस्त पूरी,
कुछ लोग सौ बरस में,पल भर भी नहीं जीते |
             -०-
क्या बात है चमन में, फीका  है  रंग सबका,
ग़ुलचीं को कुछ हुआ क्या,सिसके है गुंचा-गुंचा |
              -०-
हो शाख  से अलग तो,रोता है शजर बरसों,
जिस ग़ुल को बहारों में, नाज़ों से संवारा हो |
             -०-

सोमवार, 22 अगस्त 2011

मैं हिन्दी हूं


      मैं हिन्दी हूं
             -डा.राज सक्सेना

मैं हिन्दी हूं,मैं हिन्दी था,रहूंगा मैं सदा हिन्दी |
है हिन्दी ही कथा मेरी,रही हमदम सदा हिन्दी |
नहीं हूं वर्णसंकर मैं, जो बोलूंगा मैं  अंग्रेजी ,
मैं भारत मां का बेटा हूं,मैं बोलूगा सदा हिन्दी |
          -०-
करेगी देश  को  जगमग,मुझे   विश्वास हिन्दी का |
है उत्सव के लिये निश्चित,सितम्बर मास हिन्दी का |
हर एक चौदह सितम्बर को,मनाते हैं हम 'हिन्दी डे',
इसी दिन हम किया करते हैं,तर्पण खास हिन्दी का |
         -०-
मनाते इस तरह से हम, अजब त्योहार हिन्दी का |
इकट्ठे हो लिये, मातम  मना,हर बार हिन्दी का |
बना कर एक खबर भेजी,जहां छपता  है रोजाना ,
फिर अगले दिन पढ़ा करते हैं हम अख्बार हिन्दी का |
        -०-

गवइये सुर लगाते हैं


       गवइये सुर लगाते हैं
                   -डा.राज सक्सेना

गवइयों की सजी महफिल,गवइये सुर लगाते हैं |
कुछ अपने खूबसूरत मुख,अदाएं कर दिखाते  हैं |
हमारे पास क्या,सूखे शजर में फूल खिलते क्या ?,
लो हम भी आपके सम्मुख,मटककर हिनहिनाते हैं |
          -०-
कवि को धैर्य से सुनना, अजब है  बेबसी यारो |
यहां हमको बुलाया है, ये इनकी  बेबसी  यारो |
चलो इस हाथ खुशियां लें,तुम्हें देते हैं गम भारी,
सुनो इतने तो हमको भी,समझलो बेबसी  यारो |
          -०-

कुछ सख्त-सख्त


      कुछ सख्त-सख्त
              -डा.राज सक्सेना

तू श्वानों की तरह से भोंकता और वार करता है |
वतन को बेच खाने के नियम तैयार  करता  है |
विदेशी बैंक में जाकर तू रखता है कमाई   को,
लड़ा कर धर्म-जाति पर,वतन बरबाद करता  है |
          -०-
अरे शिशुपाल सा बरताब करना छोड़ दे अब तो |
बिदकना,भोंकना,बकवास करना छोड़ दे अब तो |
तुझे हम माफ कर देंगे,अगर सत्ता की खातिर तू,
वतन का बेचना,व्यापार करना छोड़ दे अब  तो |
         -०-
ये श्वानों सा रुदन तू झींक कर हर बार करता है |
हमारी राष्ट्र्-भक्ति पर,तू हरदम   वार करता  है |
अरे सत्ताके भंवरे सुन, न  आतंकी  हमें   कहना,
यहां का मूल हर ब्च्चा,वतन को प्यार करता है |
              -०-
उलझना मत कभी हमसे,अगर ली हमने अंगड़ाई |
वहीं पर ड़ाल देंगे हम ,  जहां बिकती है चतुराई |
हम आंधी हैं तेरी कीलों से हम रुक नहीं सकते ,
जो दृष्टि वक्र की हमने, न मिल पायेगी परछांई |
               -०-
बड़प्पन है हमारा ये,कि हम चुपचाप रहते  हैं  |
तू हमको गालियां देता है,हम सन्ताप सहते हैं  |
मगर सत्ता के लोलुप सुन,अति का अंत होता है,
सहेंगे अब नहीं कुछ भी, ये तुझसे साफ कह्ते है |

    धनवर्षा,हनुमानमन्दिर्,खटीमा-२६२३०८
          मो- ९४१०७१८७७७

शनिवार, 20 अगस्त 2011

संस्था-गीत माडर्नयूटोपियन्स


      संस्था-गीत माडर्नयूटोपियन्स
                      -डा.राज सक्सेना

अटल  इरादे  हिम्-पर्वत  के,शिखर -सरीखे ठान कर |
जन-गण के उत्थान लक्ष्य को,निकले मन में मान कर |

अविचल रह कर प्रेमभाव पर,नहीं बैर का नाम सुनेंगे ,
पड़ जाएं मन बीज फूट के, नहीं  सहेंगे-नष्ट  करेंगे  |
एकनिष्ठ हो कर्म समर्पण,  एक राय  सम्मान   कर्,
जन-गण के उत्थान लक्ष्य को,निकले मन में मान कर |

शिवा सरीखा करें नाम हम,भगत सिंह सा काम करेंगे ,
राणा जैसे कष्ट मिलें पर,  कर्तव्यों से  नहीं   हटेंगे |
करें निछावर प्राण देश पर,लक्ष्य हृदय  में  ठान कर |
जन-गण के उत्थान लक्ष्य को,निकले मन में मान कर |

लोककला सर्वोच्च बनाकर , ललितकलाओं को महकाएं,
प्राण फूंक साहित्य विधा में,साहित्यिक सहचर बनजाएं |
हिन्दी संग गढ़वाल-कुमैय्या, भाषा का उत्थान   कर ,
जन-गण के उत्थान लक्ष्य को,निकले मन में मान कर |

  धनवर्षा,हनुमानमन्दिर,खटीमा-२६२३०८ (उ०ख०)
          मो०- ०९४१०७१८७७७

मंगलवार, 16 अगस्त 2011

निभाता कौन है |


      निभाता कौन है |
            -डा.राज सक्सेना
कब किसी के भी दुखों में,काम आता कौन है |
दो कदम भी साथ दे, जहमत उठाता कौन है |
सर्द हैं चेहरे सभी के, संवेदनायें मिट चुकी हैं,
गीत खुशियों के कभी भी,गुनगुनाता कौन है |
कारोबारी हो गए,इंसानियत   मन से  गयी,
घर पड़ोसी के भी मय्यत,हो तो जाता कौन है |
दूर तक फैला हुआ है,शून्य सा एक आजकल,
एक बच्चे की तरह अब ,खिलखिलाता कौन है |
आज बच्चा भी तरसता,मां से मिलने के लिये,
लोरियां लाड़ों भरी,  उसको  सुनाता कौन है |
ताबूत में सब बन्द जैसे,आज कब्रिस्तान में,
रस्में दुनिया"राज्"है पर,ये निभाता कौन है |

 धनवर्षा,हनुमानमन्दिर,खटीमा-२६२३०८(उ०ख०)
      मो- ०९४१०७१८७७७

शनिवार, 13 अगस्त 2011

चन्द कतात


      चन्द कतात
            -डा.राज सक्सेना
यूं तो कहने को वतन में,अब सवेरा हो गया |
नफरतों का हरतरफ, लेकिन अंधेरा हो गया |
देश के रक्षक का हमने,जिसको बख्शा था खिताब,
बदनसीबी"राज"अपनी,  वो लुटेरा हो गया |
       -०-
उन्नत ललाट पर चमक रही,भारत माता की बिन्दी है |
है ब्रह्मपुत्र सम हिमनद यह,सतलुज,सरयू,कालिन्दी है |
जो आकर मिला पवित्र हुआ,है पतित-पावनी मां जैसी,
वर्तनी सरल,भाषा सीधी,निर्मल गंगा सम हिन्दी है |
      -०-
अब नही आतंक से डर,शेष तक ना वेदना है |
चक्षु लाखों अब सजग हैं, वार तेरा देखना है |
देश में ही रह रहे,  विश्वासघाती  वार कर -,
जाग कर बैठा है हिन्दू,मुस्लिमों में चेतना है |
      -०-
निकले थे हम कहां के लिये आ गये कहां |
हर ओर लाश खून है,उजड़ा  है हर  मकां |
किसने लगादी आग फिर, अम्नोअमान को,
फिर दिख रहा है हर तरफ,उठता हुआ धुआं |
     -०-
रिश्तों के तार तोड़कर,बैठे हुये हैं कयों |
हम नफरतों के दौर,समेटे हुये हैं क्यों |
सांझी विरासतों का, इतिहास भूलकर ,
बारूद के एक ढेर पर बैठे हुये हैं क्यॉ |
     -०-
तन बिक गया बाजार में,थोड़े से धान् में |
बिखरी पड़ी है लाज एक्,सूने मकान  में |
सपना यही था क्या मेरे,आज़ादहिन्द का,
जन्ता का ये भविष्य है,भारत महान में |
     -०-

शुक्रवार, 12 अगस्त 2011


     
       आनन देखा है
               -डा.राज सक्सेना
हे प्रियतम तुमने बसंत में,क्या अपना आनन देखा है |
सत्य कहो इस आनन जैसा,क्या मह्का मधुवन देखा है |
हूक उठीहै कभी हृदयमें,एक अजब सी प्यास जगी क्या,
इस बसंत की किसी रात में,निज मन का नर्तन देखा है |
रिमझिम वर्षा इन्द्र्धनुष से, एकनई अनुभूति जगाकर,
काजल सी घनघोर घटा में,सन्-सन् करता तन देखा है |
रस बरसाते पूर्ण चन्द्र ने, कभी नहीं क्या मधु बरसाया,
उस मधु से सिंचित परियों सा,क्या अपना यौवन देखा है |
आह् शिशिरके हिमपातोंने,असर नहीं क्या तुमपर डाला,
सर-सर चलती शीतपवन में,क्या जलता तनमन देखा है |
"राज"तृषित नयनोंसे अपलक,तुमको अविरल देख रहा है,
करुणकथा सा कुसुमित् उसका,क्षुधित हृदयक्रंदन देखा है |
      धनवर्षा,हनुमानमन्दिर,खटीमा-२६२३०८(उख०)
         मोबा- ०९४१०७१८७७७

गुरुवार, 11 अगस्त 2011

अपना यार करता है


       अपना यार करता है
                -डा.राज सक्सेना

नहीं करता जो  दुश्मन  भी,वो मेरा यार करता है |
झुका कर शोख नज़्ररों को,वो दिल पर वार करता है |
मुझे मालूम है ये सब,मगर ये बात दिल की है,
अजब शै है ये मेरा दिल, उसी से प्यार करता है |
हमेशा की तरह् वादा , न आएगा वो शबभर फिर,
जगा कर रात भर हमको, हमें  बेदार  करता है |
खता हमसे हुई कैसी,लगा बैठे हैं दिल उससे,
जो इज़हारे मुहब्बत से,सदा इन्कार करता है |
मैं जब-जब फूल चुनता हूं,चढ़ाने के लिये उसपर,
चुभोने को वो कांटों की,  फसल तैय्यार करता है |
ये कैसा प्यार है हरदम,मचलता है सताने को,
फसाने को मुहब्बत के, सदा मिस्मार करता है |
अकीदा किस कदर मुझको,मुहब्बत पर मेरे दिल की,
जो इतनी ठोकरें खाकर, यकीं हर बार करता है |
मुझे मालूम है यह भी,करूं क्या"राज"इस दिल का,
जो महरूम्-इ-वफा उससे,वफा दरकार करता है |
   धनवर्षा,हनुमानमन्दिर,खटीमा-२६२३०८(उ०ख०)

आनन देखा है


       आनन देखा है
               -डा.राज सक्सेना
हे प्रियतम तुमने बसंत में,क्या अपना आनन देखा है |
सत्य कहो क्या इससे पहले,दह्का चन्दन्-वन देखा है |
हूक उठीहै कभी हृदयमें,एक अजब सी प्यास जगी क्या,
इस बसंत की किसी रात्रि में,मन करता नर्तन देखा है |
रिमझिम वर्षा इन्द्र्धनुष से, एकनई अनुभूति जगाकर,
काजल सी घनघोर घटा में,थर-थर करता तन देखा है |
रस बरसाता पूर्ण चन्द्रमा, कभी नहीं क्या तृषा जगाता,
स्वप्नों में क्या खुद का तुमने,परियों सा यौवन देखा है |
अरी!शिशिरके हिमपातोंने,असर नहीं क्या तुझपर डाला,
सर-सर चलती शीतपवन में,जलता सा तनमन देखा है |
क्यों चकोर सा"राज"ताकता,कब से सूनी आंख लिये,
दीप-शिखा सा जलता उसका,क्षुधित हृदयमंथन देखा है |
      धनवर्षा,हनुमानमन्दिर,खटीमा-२६२३०८(उख०)

बुधवार, 10 अगस्त 2011


            डा.राज सकसेना

घिनौनी अब सियासत हो रही है |
गरीबों पर सलावत  हो  रही है |
हमें कातिल बता कर हर जगह पर,
यूं कातिल की हिफाज़त हो रही है |
थमा कर हाथ में दोनों के खंज़र ,
अजब सी यह सखावत हो रही है |
गैर को मां का आंचल ही थमाकर्,
दलाली में महारत हो रही है |
हिली थोड़ी चेयर तो चीखते हैं,
विपक्षी दल से शरारत हो रही है |
हमें ही मानते हैं कारण गरीबी ,
टैक्सचोरों पर इनायत हो रही  है |
हजामत हो रही है"राज्"जमकर ,
नहीं  फिर भी,बगावत हो रही है |
 धनवर्षा,हनुमान मन्दिर खटीमा-२६२३०८

मंगलवार, 9 अगस्त 2011

कथा शहीद उधमसिंह्


    कथा शहीद उधमसिंह्  
              -डा.राज सक्सेना
इकत्तीस जुलाई प्रतिवर्ष,
हम को कुछ याद दिलाती है |
एक अमरकथा बलिदानी की,
आ नयनों में बस जाती है |

पंजाब प्रांत का सुनाम ग्राम,
हो गया धन्य कृत्कृत्य हुआ |
नारायणकौर सुमाता ने,
जब शेरसिंह को जन्म दिया |

था दिवस दिसम्बर का छब्विस,
निन्नानबे अट्ठारह सौ सन था |
पिता टहलसिहं उछल पड़े,
जब पुत्र जन्म संदेश सुना |

अल्पायु में माता खोकर,
परवरिश अनाथों में पाई |
जब अमृतपान छका उसने,
तब नाम उधम पाया भाई |

बचपन में जलियां बाग हुआ,
अंग्रेजों से नफरत मानी थी  |
डायर से बद्ला लेने की,
मन में उसने  निज ठानी थी  |

इंग्लैण्ड गये  और घात लगा,
ओ डायर का बध कर डाला |
एक कील ठोक कर शासन में,
साम्राज्य ब्रिटिश को मथ डाला |

चढ़ गये खुशी से फांसी पर,
जय भारत मां की बोली थी |
अपने ही बल से  सिंह्पुरूष,
राह्-ए-आजादी खोली थी |

"काम्बोज रत्न, हे उधमसिंह्",
तुम भारत के जन-नायक हो |
तुम सिंह्-प्रसूता भारत-मां के ,
हो गये अमर,वह शावक हो |
 धनवर्षा,हनुमानमन्दिर, खटीमा

रविवार, 7 अगस्त 2011

उन्नत,उज्ज्वल,उत्तराखण्ड

     उन्नत,उज्ज्वल,उत्तराखण्ड
                   -राज सक्सेना

भरत-भूमि,भव-भूति प्रखण्ड |
उन्नत, उज्ज्वल, उत्तराखण्ड |

सकल-समन्वित,श्रमशुचिताम |
शीर्ष-सुशोभित,  श्रंग-शताम |
विरल-वनस्पति, विश्रुतवैभव,
पावन,पुण्य-प्रसून,  शिवाम |

हरित-हिमालय,हिमनदखण्ड |
उन्नत, उज्ज्वल, उत्तराखण्ड |

नन्दा, नयना,  पंच-प्रयाग |
भक्ति-भरित,भव-भूमिप्रभाग |
अन्न-रत्न आपूरित   आंगन,
तरल-तराई,    तुष्ट्-तड़ाग |

तपोनिष्ठ ,तपभूमि , प्रचण्ड |
उन्नत, उज्ज्वल, उत्तराखण्ड |


गिरिजाघर, श्रुत-श्रेष्ठ  विहार |
कलियर, हेमकुण्ड,  हरिद्वार |
परम-प्रतिष्ठित,चतुष्धाम-मय,
पावन-गंगा,   पुलक-प्रसार |

धीर, धवल-ध्वज,धराप्रखण्ड |
उन्नत, उज्ज्वल, उत्तराखण्ड |


शौर्य, सत्य, शुचिता-संवास |
सर्वधर्म,   समुदाय  समास |
पावन-प्रेम, परस्पर- पूरित,-
मूल सहित, श्रमशील प्रवास |

भ्रातृभाव, भवभक्ति  अखण्ड |
उन्नत, उज्ज्वल, उत्तराखण्ड |

धनवर्षा,हनुमानमन्दिर,खटीमा-२६२३०८  

सूरज तुम क्यों रोज निकलते


       सूरज तुम क्यों रोज निकलते
                      डा.राज सक्सेना
सूरज तुम क्यों रोज निकलते,छुट्टी कभी नहीं क्यों जाते |
सातों दिन छुट्टी पर रह कर,नियमों की क्यों ह्सीं उड़ाते |
भोर हुई मां चिल्ला उठती ,उठ बेटा सूरज उग आया-,
आंखें खोलो झप्-झप जातीं,सिकुड़ सिमट अलसाती काया |
सिर्फ तुम्ही हो जिसके कारण,नींद नहीं पूरी हो पाती,
क्लास रूम में बैठे-बैठे , अनचाहे झपकी आ जाती |
सूरज तुम स्वामी हो सबके, नियमों का कुछ पालन करलो |
एक दिवस बस सोमवार को,छुट्टी तुम निर्धारित करलो |
नहीं उगे तो छुट्टी अपनी, सण्डे संग मण्डे की होगी,
जीभर सो ले दो दिन तक तो, फिक्र नहीं डण्डे की होगी |

संभव ना हो किसी तरह ये, इतना तो तुम कल से करना,
थोडा सो लें अधिक देर हम, कल से तुम नौ बजे निकलना |
   धन वर्षा,हनुमान मन्दिर, खटीमा-२६२३०८ (उ०ख०)
    मोबा०- ०९४१०७१८७७७

bhasha computer ki


    भाषा कम्प्यूटर की
भाषा कम्प्यूटर की हिन्दी है,
यह स्वयं  सिद्ध हो जाता है|
हिन्दी प्रयोग से संचालन -,
जब स्वंय सरल हो जाता है|

य़ूं तो भाषा कम्पयूटर  की,
कोई भी नहीं बिशेष बनी|
पर हिन्दी ही वह भाषा है ,
जो क्म्प्यूटर को श्रेष्ट मिली|

कम्प्यूटर के डाटासंग्रह में,
जितना भी डाटा अंकित है|
वह दो अंकों का खेलमात्र ,
वह दो अंकों से निर्मित है|

लगभग मिलताजुलता है यह्,
वैदिक -गणना के रंगों  से|
हो जाता सार्थक वेद-गणित ,
कम्प्यूटर की सभी तरंगों से|

यह सिद्ध हो गया है भाषा,-
कम्प्यूटर -मानक हिन्दी है|
हिन्दी ही विश्वसमन्वय की,
प्रोद्योगिक भाषा हिन्दी है|

भारत-वासी


      भारत-वासी
            -डा.राज सक्सेना

हजारों कष्ट सहते हैं,  जिगर को थाम लेते हैं |
मिले तकलीफ कितनी भी,सब्र से काम लेते हैं |
बहा देंगे पसीने में,हम अपनी मुश्किलें जो हों,
सतत कांटों पे चलकर हम,मंजिलें थाम लेते हैं |
पले हैं कष्ट सह-सह कर,हजारों साल से हम सब,
न हो बिस्तर तो धरती से,पलंग का काम लेते हैं |
बदन फौलाद का पाया,मगर दिल मोम का अपना,
अगर इज्जत पे बन जाए,गिरेबां थाम लेते हैं |
नहीं तोला है रिश्तों को,कभी ज़र की तराज़ू में,
कि खाकर घास की रोटी,विजय परिणाम देते हैं |
रहे सदियों से कष्टों में,मगर गर्दन न झुकने दी,
जिओ और"राज"जीने दो,कथन अंजाम देते हैं |

    घनवर्षा,हनुमान मन्दिर,खटीमा-२६२३०८(उ०ख०)