शुक्रवार, 22 जुलाई 2011


       लम्बी है स्याह रातें
                 - डा० राज सक्सेना
लम्बी हैं स्याह रातें, घनघोर सवेरे हैं |
मुद्दत से ये लगता है, हर ओर अन्धेरे हैं |
हो आम-ओ-खास जो भी,जीता है अन्धेरों में,
अन्जाम ये उन सबके, करतब जो उकेरे हैं |
कुछ पाप जमाने से, पाये हैं विरासत मैं,
जो हमने चुने सबही, लगता है लुटेरे हैं |
मछली सा हमें अबतक,समझा है जमाने ने,
जालों को लिये दुबके,हर ओर मछेरे हैं |
कितना भी छटपटायें,सम्भव नहीं निकलना,
मजबूत दिवारों से, हमसब को यूं घेरे हैं |
 हुस्न क़ी मलिका से,कहदो कि नहीं निकले,
हाथों में लिये बीनें, हर ओर सपेरे हैं |
ढॉचा हुआ है जर्जर, अब लाइलाज हैं सब,
दीमक चटी दिवारें, घुन खाए मुंडेरे हैं |
हो "राज्" अब बगावत, बदलेगी चाल वरना,
देने को नस्ले-नौ को, अब सिर्फ अन्धेरे हैं |

  धनवर्षा,हनुमान मन्दिर खटीमा-२६२३०८
   उत्तराखण्ड    मो०- ०९४१०७१८७७७

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